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Supreme Court: क्या अदालतें मध्यस्थ फैसलों में बदलाव कर सकती हैं या नहीं? सुप्रीम कोर्ट कल सुनाएगा फैसला

Tue, 29 Apr 2025 09:44 PM IST
निर्मल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: निर्मल कांत Updated Tue, 29 Apr 2025 09:44 PM IST
सार

Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ बुधवार को यह तय करेगी कि क्या अदालतें मध्यस्थ फैसलों में बदलाव कर सकती हैं। यह फैसला 1996 के मध्यस्थता कानून की व्याख्या पर आधारित होगा और इसका असर घरेलू व अंतरराष्ट्रीय विवादों के निपटान पर पड़ेगा।

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SC to deliver verdict on Wednesday on whether courts could modify arbitral awards
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : पीटीआई

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ यह तय करने के लिए बुधवार को फैसला सुनाएगी कि क्या अदालतें 1996 के मध्यस्थता और सुलह कानून के तहत मध्यस्थ फैसलों में संशोधन कर सकती हैं या नहीं। इस पीठ में मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति बी.आर. गवई, न्यायमूर्ति संजय कुमार, न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह शामिल हैं। 

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पीठ ने 19 फरवरी को इस पर अपना फैसला सुरक्षित रखा था। इस फैसले का असर घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थ फैसलों पर पड़ सकता है। 13 फरवरी को अंतिम सुनवाई शुरू हुई थी, जिसे इससे पहले 23 जनवरी को तीन जजों की पीठ ने बड़ी पीठ को भेजा था। सॉलिसिटर जनरल (एसजी) तुषार मेहता के अलावा वरिष्ठ वकील अरविंद दातार, डेरियस खंबाटा, शेखर नाफड़े, रितिन राय, सौरभ कृपाल और गौरव बनर्जी ने इस मामले में पक्ष रखा।
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किस पक्ष ने क्या दलील दी
अरविंद दातार और उनकी टीम ने दलील दी कि अदालतों के पास (मध्यस्थता और सुलह अधिनियम की) धारा 34 के तहत मध्यस्थ फैसलों को रद्द करने का अधिकार है। अदालतें उन फैसलों में संशोधन भी कर सकती हैं, क्योंकि यह उनके विवेकाधिकार का हिस्सा है। वहीं दूसरे पक्ष के वकीलों ने कहा कि कानून में 'संशोधन' शब्द नहीं है, इसलिए अदालतों को ऐसा कोई अधिकार नहीं दिया जा सकता जो लिखा ही नहीं है।

सॉलिसिटर जनरल मेहता ने कहा कि 1996 का कानून एक 'पूर्ण और उद्देश्यपूर्ण' कानून है, जो मध्यस्थता से जुड़े सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर बनाया गया है। उन्होंने कहा, इस कानून में संशोधन का अधिकार न होना एक जानबूझकर लिया गया विधायी निर्णय है।  


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मध्यस्थता कानून की धारा 34 में क्या है
धारा 34 के अनुसार, मध्यस्थ फैसलों को प्रक्रिया में गड़बड़ी, सार्वजनिक नीति का उल्लंघन या अधिकार क्षेत्र की कमी जैसे कुछ सीमित कारणों के आधार पर ही रद्द किया जा सकता है। धारा 37 उन अपीलों से जुड़ी है जो मध्यस्थता से जुड़े फैसलों के खिलाफ (जैसे कि फैसला रद्द न करने पर) अदालत में की जाती हैं। इन दोनों धाराओं का उद्देश्य अदालतों की भूमिका को सीमित करना है, ताकि मध्यस्थता प्रक्रिया तेज और प्रभावी रहे।

कोर्ट ने पहले क्या कहा था?
पीठ ने कहा था, इस सवाल की जांच करते समय अदालत यह भी देखेगी कि अदालत की शक्ति की सीमाएं क्या हैं... और अगर संशोधन की शक्ति है, तो वह किन सीमाओं तक इस्तेमाल की जा सकती है। इससे पहले, फरवरी 2024 में तीन जजों की पीठ (जस्टिस दीपांकर दत्ता, के.वी. विश्वनाथन और संदीप मेहता) ने कुछ सवाल तैयार किए थे और मामले को मुख्य न्यायाधीश को विचार के लिए भेजा था। 

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