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SC: मौत की सजा पाए दोषी को सुप्रीम कोर्ट ने किया रिहा, 2014 में बेटे और दो भाइयों की हत्या के आरोप से बरी
Thu, 24 Aug 2023 05:49 PM IST
देव कश्यप
पीटीआई, नई दिल्ली।
पीटीआई, नई दिल्ली।
Published by: देव कश्यप
Updated Thu, 24 Aug 2023 05:49 PM IST
सार
शीर्ष अदालत ने पिछले आठ वर्षों से जेल में बंद दोषी इरफान को पांच-छह अगस्त, 2014 की मध्यरात्रि को उसके बेटे इस्लामुद्दीन और दो भाइयों इरशाद और नौशाद की मौत में कथित भूमिका के लिए उसकी दोषसिद्धि और मौत की सजा को रद्द करने के बाद तत्काल रिहा करने का भी आदेश दिया।
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सुप्रीम कोर्ट।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा पाए एक दोषी को बढ़ी राहत देते हुए रिहा कर दिया। साथ ही उसे 2014 में उत्तर प्रदेश के बिजनौर स्थित घर पर अपने बेटे और दो भाइयों को जलाने के आरोप से भी बरी कर दिया, जो कथित तौर पर उसकी दूसरी शादी के खिलाफ थे। शीर्ष अदालत ने कहा कि दो पीड़ितों के मृत्यु पूर्व बयान मुख्य गवाहों की गवाही के साथ मेल नहीं खाते हैं। शीर्ष अदालत ने मृत्युपूर्व बयान पर कानूनी सिद्धांत और इस धारणा की विश्वसनीयता पर भी विस्तार से चर्चा की कि मृत्यु के समय व्यक्ति झूठ नहीं बोलता है।
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न्यायमूर्ति बीआर गवई, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने अपने 36 पेज के फैसले में कहा, "मृत्यु पूर्व दिया गया बयान सच होने की परिकल्पना रखते हुए पूरी तरह विश्वसनीय और आत्मविश्वास जगाने वाला होना चाहिए। जहां इसकी सत्यता पर कोई संदेह है या रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य से पता चलता है कि मृत्यु पूर्व दिया गया बयान सही नहीं है, इसे केवल साक्ष्य के एक टुकड़े के रूप में माना जाएगा, लेकिन यह अकेले दोषसिद्धि का आधार नहीं हो सकता।"
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शीर्ष अदालत ने पिछले आठ वर्षों से जेल में बंद दोषी इरफान को पांच-छह अगस्त, 2014 की मध्यरात्रि को उसके बेटे इस्लामुद्दीन और दो भाइयों इरशाद और नौशाद की मौत में कथित भूमिका के लिए उसकी दोषसिद्धि और मौत की सजा को रद्द करने के बाद तत्काल रिहा करने का भी आदेश दिया।
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तीनों पीड़ितों ने अलग-अलग तारीखों पर दिल्ली के डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल में दम तोड़ दिया था। निचली अदालत ने इरशाद और इस्लामुद्दीन के मृत्यु पूर्व दिए गए बयानों पर भरोसा किया था, जिसमें इरफान को आग लगाने वाला व्यक्ति बताया गया था। बयानों में कोई विसंगति नहीं पाए जाने के बाद, 2018 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने फैसले और सजा को बरकरार रखा था।
इरफान की अपील को स्वीकार करते हुए शीर्ष अदालत ने परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर निर्भर मामले में मृत्यु पूर्व दिए गए बयानों की विश्वसनीयता पर कानूनी स्थिति और भारतीय और विदेशी दोनों तरह के फैसलों का उल्लेख किया। पीठ ने कहा, मृत्युपूर्व बयान की स्वीकार्यता के संबंध में न्यायिक सिद्धांत यह है कि ऐसी घोषणा अंतिम समय में की जाती है, जब पक्ष मृत्यु के कगार पर होता है और जब इस दुनिया की हर उम्मीद खत्म हो जाती है, जब झूठ बोलने का हर मकसद खामोश हो जाता है और आदमी केवल सच बोलने के सबसे शक्तिशाली विचार से प्रेरित होता है। इसके बावजूद, ऐसे मृत्युपूर्व बयानों को दिए जाने वाले महत्व पर विचार करते समय बहुत सावधानी बरती जानी चाहिए।
पीठ ने कहा, चूंकि अभियुक्त के पास जिरह करने की कोई शक्ति नहीं है, इसलिए अदालतें इस बात पर जोर देती हैं कि मृत्युपूर्व बयान इस तरह का होना चाहिए कि अदालत को उसकी सत्यता और शुद्धता पर पूरा भरोसा हो। हालांकि, अदालत को हमेशा इस बात पर गौर करने के लिए सतर्क रहना चाहिए कि मृतक का बयान या तो किसी के सिखाने या उकसाने या कल्पना का परिणाम नहीं था। शीर्ष अदालत ने कहा, प्राचीन काल से यह मानने की आम सहमति के बावजूद कि मरने से पहले दिया गया बयान सच है, ऐसे बयानों को सख्त अर्थों में स्वीकार नहीं किया जा सकता है।