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SC: राजद्रोह कानून की सांविधानिक वैधता से जुड़ी याचिका की जांच करेगा सुप्रीम कोर्ट, केंद्र से मांगा जवाब

Fri, 08 Aug 2025 05:15 PM IST
तरुणेंद्र चतुर्वेदी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: तरुणेंद्र चतुर्वेदी Updated Fri, 08 Aug 2025 05:15 PM IST
सार

बीएनएस राजद्रोह प्रावधान की वैधता को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। अब इसकी जांच की जाएगी। इसे औपनिवेशिक काल (ब्रिटिश समय) के कानून का उत्तराधिकारी माना जा रहा है।  

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SC seeks Centre reply on PIL challenging validity of BNS sedition provision
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट भारतीय न्याय संहिता के तहत राजद्रोह कानून की सांवधानिक वैधता को चुनौती देने वाली जनहित याचिका की जांच करने के लिए सहमत हो गया। जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से जवाब मांगा है। इसे औपनिवेशिक काल (ब्रिटिश समय) के कानून का उत्तराधिकारी माना जा रहा है। 
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बीएनएस की धारा 152 (देशद्रोह) की वैधता के खिलाफ सेवानिवृत्त मेजर जनरल एस जी वोम्बटकेरे ने जनहित याचिका दायर की थी। मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई, न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन और न्यायमूर्ति एन वी अंजारिया की पीठ ने वोम्बटकेरे की जनहित याचिका पर संज्ञान लिया है। इसके बाद केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। इस मुद्दे पर कोर्ट ने इस याचिका को उस लंबित याचिका के साथ जोड़ने का भी आदेश दिया, जिसमें बीएनएस द्वारा प्रतिस्थापित पूर्व आईपीसी की धारा 124ए (देशद्रोह) को चुनौती दी गई है। बीएनएस की धारा 152 भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कृत्य से संबंधित है।
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सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर मौखिक या लिखित शब्दों, संकेतों, दृश्य चित्रण द्वारा, या अन्य तरीकों से अलगाव, सशस्त्र विद्रोह या विध्वंसक गतिविधियों को उत्तेजित करता है या उत्तेजित करने का प्रयास करता है, तो उस पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी। साथ ही अगर कोई भारत की संप्रभुता या एकता और अखंडता को खतरे में डालता है; या ऐसे किसी कृत्य में लिप्त होता है या ऐसा करता है, तो उस शख्स को आजीवन कारावास और सात वर्ष तक के कारावास से दंडित किया जाएगा। जुर्माना भी देना होगा।

जुलाई 2022 में पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने लगा दी थी रोक

दायर की गई याचिका में इस प्रावधान को राजद्रोह कानून का नया रूप बताया गया है। जिसे पहले सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई 2022 में विधायी समीक्षा के लिए स्थगित कर दिया था। जुलाई 2022 में पूर्व मुख्य न्यायाधीश एन वी रमना की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने आईपीसी के तहत राजद्रोह के प्रावधान पर रोक लगा दी थी। याचिका में कहा गया कि यह विवादित प्रावधान औपनिवेशिक राजद्रोह कानून, जिसे पहले आईपीसी, 1860 की धारा 124ए के रूप में जाना जाता था। यह प्रावधान रद्द किए जाने योग्य है, क्योंकि यह अनुच्छेद 19(2) के तहत स्पष्टता, आवश्यकता और आनुपातिकता के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है।

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