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'नहीं चाहते एनजीओ जैसे व्यस्त संस्थान दें न्यायिक सेवा नियमों को चुनौती', जानें किस मामले में बोला सुप्रीम कोर्ट

Sun, 05 Sep 2021 04:38 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Sun, 05 Sep 2021 04:38 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि वह इन न्यायिक सेवा नियमों से प्रभावित अभ्यर्थियों की बात सुनना ज्यादा पसंद करेगी। 

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SC says don't want busy bodies NGOs challenge higher judicial service rules dismisses PIL filed by Samvidhan Bachao Trust
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : social media

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वह नहीं चाहता कि व्यस्त संस्थान 'एनजीओ' उत्तर प्रदेश के उच्च न्यायिक सेवा नियमों को चुनौती दें। दरअसल, संविधान बचाओ ट्रस्ट नाम के एक एनजीओ ने कुछ समय पहले ही सुप्रीम कोर्ट में इलाहबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ याचिका दायर की थी। इलाहबाद उच्च न्यायालय ने इसी एनजीओ की पीआईएल पर कहा था कि यूपी के उच्च न्यायिक सेवा नियम (यूपी हायर ज्यूडीशियल सर्विस रूल्स), जिनके तहत सभी वर्गों (सामान्य, ओबीसी, एससी-एसटी) के लिए एक न्यूनतम योग्यता का प्रवाधान है, उसे चुनौती नहीं दी जा सकती। 
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क्या बोला सुप्रीम कोर्ट?
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि वह इन न्यायिक सेवा नियमों से प्रभावित अभ्यर्थियों की बात सुनना ज्यादा पसंद करेगी। तीन सितंबर को पास किए गए आदेश में जस्टिस डीवाई चंद्रचूड, विक्रम नाथ और हिमा कोहली की बेंच ने कहा, "हम संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत दायर की गई स्पेशल लीव पिटीशन (एसएलपी) की सुनवाई के बिल्कुल इच्छुक नहीं हैं। इसलिए यह एसएलपी रद्द की जाती है।"
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सुनवाई के दौरान संविधान बचाओ ट्रस्ट की ओर से पेश हुए वकील अशोक कुमार शर्मा ने कहा कि यूपी उच्च न्यायिक सेवा के नियम 18 के तहत सामान्य, एससी और एसटी वर्ग के अभ्यर्थियों के लिए एक न्यूनतम योग्यता निर्धारित की गई है। ऐसे में यह आरक्षण के उद्देश्य को ही खत्म करती है। 
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इस पर बेंच ने कहा, "ये संविधान बचाओ ट्रस्ट है क्या, एक एनजीओ? हम नहीं चाहते कि कोई व्यस्त संस्थान उच्च न्यायिक सेवा नियमों को चुनौती दे। इस व्यवस्था से परेशान किसी व्यक्ति को आगे आने दें। हम उनकी सुनवाई करेंगे। हम इस मुद्दे पर पीआईएल नहीं झेल सकते।"


हालांकि, इस पर शर्मा ने कहा कि यह एक पीआईएल है, जिसमें ऐसे मुद्दे को उठाया गया है जो समाज के सभी वर्गों को प्रभावित करता है। इस पर जब बेंच ने शर्मा से पूछा कि क्या इस जनहित याचिका में कोई परेशान छात्र वादी बनाया गया है, तो इस पर शर्मा ने न में जवाब दिया। बाद में कोर्ट ने एनजीओ की याचिका को खारिज कर दिया। 
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