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SC: 'स्पीकर को 39 विधायकों की अयोग्य करने से रोका न जाता तो शिंदे नहीं बन पाते सीएम', सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

Wed, 01 Mar 2023 10:06 PM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिव शरण शुक्ला Updated Wed, 01 Mar 2023 10:06 PM IST
सार

सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने शिंदे गुट के वकील नीरज किशन कौल को बताया कि उनकी (उद्धव गुट) यह बात सही है कि एकनाथ शिंदे को राज्यपाल ने मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई थी।  

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SC said that Shinde would not have become CM if Speaker had not been prevented from disqualifying 39 MLAs
सुप्रीम कोर्ट। - फोटो : ANI

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि अगर महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष को 39 विधायकों के खिलाफ लंबित अयोग्यता याचिकाओं पर फैसला लेने से नहीं रोका जाता तो शिवसेना नेता एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री पद की शपथ नहीं ले पाते। इस पर शिंदे गुट ने शीर्ष अदालत को बताया कि अगर 39 विधायक विधानसभा से अयोग्य हो जाते, तब भी महा विकास अघाड़ी (एमवीए) सरकार गिर जाती, क्योंकि वह बहुमत खो चुकी थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने फ्लोर टेस्ट से पहले इस्तीफा भी दे दिया था।

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सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने शिंदे गुट के वकील नीरज किशन कौल को बताया कि उनकी (उद्धव गुट) यह बात सही है कि एकनाथ शिंदे को राज्यपाल ने मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई थी। वे बहुमत साबित कर पाए क्योंकि स्पीकर उनके और अन्य विधायकों के खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही को आगे बढ़ाने में सक्षम नहीं थे। इस पर कौल ने कहा कि 29 जून, 2022 के ठीक बाद, ठाकरे ने इस्तीफा दे दिया था, क्योंकि उन्हें पता था कि उनके पास बहुमत नहीं है।
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सुनवाई के दौरान कौल ने कहा कि पिछले साल चार जुलाई को शिंदे ने विधानसभा में भाजपा और निर्दलीयों के समर्थन से बहुमत साबित किया था। 288 सदस्यीय सदन में 164 विधायकों ने विश्वास प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया था, जबकि 99 ने इसके विरोध में मतदान किया था। फ्लोर टेस्ट में उद्धव गुट के गठबंधन को सिर्फ 99 वोट मिले थे, क्योंकि एमवीए के 13 विधायक मतदान से अनुपस्थित थे।
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कौल ने कहा कि 2016 के नबाम रेबिया मामले में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के तहत शिंदे और अन्य विधायकों को अयोग्य घोषित नहीं किया जा सकता था। इस आदेश में शीर्ष अदालत ने कहा था कि अध्यक्ष अयोग्यता याचिकाओं पर फैसला नहीं कर सकते, अगर उनके निष्कासन का प्रस्ताव लंबित हो तो। जब तक वह अयोग्य नहीं होता, तब तक वह सदन का सदस्य बना रहता है।

पीठ ने कौल की ओर से दिए गए शक्ति परीक्षण में मतदान के चार्ट पर विचार करने के बाद कहा, भले ही अदालत यह मानले कि 2016 का नबाम रेबिया मामले का फैसला है ही नहीं, स्पीकर उन विधायकों को अयोग्य घोषित करने के लिए आगे बढ़ते लेकिन हां उनके अयोग्य घोषित किए जाने के बाद भी उद्धव सरकार गिर जाती। इस पर कौल ने कहा, बिलकुल सही। तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने शक्ति परीक्षण से पहले ही इस्तीफा दे दिया था। ऐसे में जो गठबंधन राज्यपाल के सामने पहुंचा, उन्होंने उसे सदन के पटल पर बहुमत साबित करने के लिए कहा। आखिर इसमें गलत क्या है? राज्यपाल और क्या कर सकते थे?


कौल ने कहा, शिंदे गुट कभी उद्धव ठाकरे के खिलाफ नहीं था। उन्हें सिर्फ शिवसेना के एमवीए में बने रहने से एतराज था। यहां तक कि 21 जून, 2022 के उनके प्रस्ताव में भी कहा गया कि कार्यकर्ताओं में व्यापक असंतोष है। शिवसेना का चुनाव से पहले भाजपा के साथ गठबंधन था और चुनाव के बाद हमने एनसीपी और कांग्रेस की मदद से सरकार बनाई, जिसके खिलाफ हमने चुनाव लड़ा। कौल ने कहा, उनका (उद्धव गुट) स्पीकर के पास अयोग्यता याचिका दायर करना असल में असंतोष को दबाना था।

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