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Supreme Court : 'वरिष्ठ अधिवक्ता बनाने के दिशा निर्दशों में बदलाव हो या नहीं', कोर्ट ने फैसला रखा सुरक्षित
Thu, 16 Mar 2023 06:03 PM IST
शिव शरण शुक्ला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शिव शरण शुक्ला
Updated Thu, 16 Mar 2023 06:03 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष बृहस्पतिवार को हुई सुनवाई में केंद्र की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने कहा, 2017 के फैसले पर पुनर्विचार की जरूरत है। याचिकाकर्ता वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने पीठ को बताया कि वकीलों को वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में नामित करने में सरकार की कोई भूमिका नहीं है।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : अमर उजाला, इंदौर
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को वरिष्ठ अधिवक्ता पदनाम मामले में अपना आदेश सुरक्षित रख लिया। शीर्ष कोर्ट विचार कर रही थी कि ‘वरिष्ठ अधिवक्ता’ पदनाम देने के लिए साल 2017 में उसके और उच्च न्यायालयों के लिए जो दिशानिर्देश निर्धारित किए गए थे, उन पर फिर से विचार करने की जरूरत है या नहीं। शीर्ष कोर्ट वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह की याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
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जस्टिस एसके कौल, जस्टिस ए अमानुल्लाह और जस्टिस अरविंद कुमार की पीठ के समक्ष बृहस्पतिवार को हुई सुनवाई में केंद्र की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने कहा, 2017 के फैसले पर पुनर्विचार की जरूरत है। याचिकाकर्ता वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने पीठ को बताया कि वकीलों को वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में नामित करने में सरकार की कोई भूमिका नहीं है। उसने फैसले की समीक्षा के लिए कोई याचिका दायर नहीं की है। पीठ ने कहा, तथ्य यह है कि, अटॉर्नी जनरल ने पहले अदालत की सहायता की थी (जब मामले को पहले सुना गया था)। तब ऐसा कोई मुद्दा नहीं उठाया गया कि यह उचित नहीं है। केंद्र सरकार ने कभी भी समीक्षा याचिका दायर नहीं की। पीठ ने कहा, अब उसके सामने मुद्दा यह है कि व्यवस्था को कैसे दुरुस्त किया जाए। सुनवाई के दौरान, पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह, अमन लेखी, पुनीत बाली और शीर्ष अदालत के महासचिव के लिए पेश हुए एएसजी माधवी दीवान समेत कई अन्य वकीलों की दलीलें भी सुनीं। पीठ ने कहा कि अब उसके सामने मुद्दा यह है कि व्यवस्था को कैसे दुरुस्त किया जाए।
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इससे पहले, शीर्ष अदालत ने 16 फरवरी को कहा था कि इस स्तर पर वह केवल 2017 के फैसले से उपजे मुद्दे का समाधान करेगी जिसमें अब तक के अनुभव के आधार पर दिशा-निर्देशों पर फिर से विचार करने की छूट दी गई थी। केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तब शीर्ष अदालत को बताया था कि वह अब तक के अनुभव को बताते हुए एक आवेदन भी दाखिल करेंगे। शीर्ष अदालत को बताया गया था कि अक्तूबर 2017 के फैसले में उल्लेख किया गया था कि दिशा-निर्देश संपूर्ण नहीं हो सकते हैं और समय के साथ प्राप्त होने वाले अनुभव के आधार पर इसमें पुनर्विचार की आवश्यकता हो सकती है।
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