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SC: सुप्रीम कोर्ट ने NIC की जर्जर इमारत गिराने के फैसले में दखल से किया इनकार, पढ़ें शीर्ष अदालत की अहम खबरें

Thu, 05 Jan 2023 10:35 PM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिव शरण शुक्ला Updated Thu, 05 Jan 2023 10:35 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल इंश्योरेंस कंपनी की जर्जर इमारत गिराने के फैसले में दखल से इनकार कर दिया है। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने ग्रेटर मुंबई नगर निगम (एमसीजीएम) और उसके ठेकेदारों की ओर से वर्ली में एनी बेसेंट रोड पर इमारत के विध्वंस पर 28 नवंबर, 2022 को लगाई रोक भी हटा ली। 
 

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SC paves way for demolition of National Insurance Co building in Mumbai Supreme Court update news in hindi
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई में नेशनल इंश्योरेंस कंपनी की 50 साल से अधिक पुरानी ‘जर्जर’ इमारत को ढहाने का रास्ता साफ कर दिया है। मामले में सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने इमारत को गिराने वाले बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। इसके साथ ही एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) की पूर्व कार्यवाहक चेयरपर्सन मंजुला दास की याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया।

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जर्जर इमारत गिराने के फैसले में दखल से इनकार 
सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल इंश्योरेंस कंपनी की जर्जर इमारत गिराने के फैसले में दखल से इनकार करते हुए शीर्ष अदालत ने ग्रेटर मुंबई नगर निगम (एमसीजीएम) और उसके ठेकेदारों की ओर से वर्ली में एनी बेसेंट रोड पर इमारत के विध्वंस पर 28 नवंबर, 2022 को लगाई रोक भी हटा ली। 
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सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस पीएस नरसिम्हा की पीठ ने कहा, हमें बॉम्बे हाईकोर्ट के 15 नवंबर 2022 के आदेश में दखल देने का कोई कारण नजर नहीं आता। पीठ ने कहा, ग्रेटर मुंबई नगर पालिका के फैसले में दखल नहीं देने का बॉम्बे हाईकोर्ट का निर्णय पूरी तरह ठीक था हाईकोर्ट ने एमसीजीएम को ‘इंडिया रे हाउस’ या ‘नेशनल हाउस’ को ध्वस्त करने का निर्देश दिया था, जिसे तकनीकी सलाहकार समिति की एक रिपोर्ट के आधार पर नागरिक निकाय ने जीर्ण-शीर्ण चिह्नित किया था। सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल इंश्योरेंस को एक हफ्ते के भीतर इमारत के अंदर से उसका सामान निकालने का निर्देश दिया है।

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SC paves way for demolition of National Insurance Co building in Mumbai Supreme Court update news in hindi
सुप्रीम कोर्ट। - फोटो : ANI

अनदेखी पर दायर कैट की पूर्व कार्यवाहक चेयरपर्सन की याचिका पर सुनवाई से शीर्ष कोर्ट का इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) की पूर्व कार्यवाहक चेयरपर्सन मंजुला दास की उस याचिका पर विचार करने से इन्कार कर दिया जिसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि कैट में उनके उत्तराधिकारी की नियुक्ति में नियमों का पालन नहीं किया गया।

दास को अगस्त 2021 में कैट का कार्यवाहक चेयरपर्सन नियुक्त किया गया था और उनका कार्यकाल 29 सितंबर 2022 तक तय था। हालांकि बाद में मेघालय हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजीत वसंतराव मोरे को 30 जुलाई 2022 को कैट की प्रधान शाखा का चेयरपर्सन नियुक्त कर दिया गया। वह इस पद पर 30 जुलाई 2026 तक रहेंगे। दास की ओर से पेश वरिष्ठ वकील सीए सुंदराम ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस पीएस नरसिम्हा की पीठ के समक्ष दलील दी कि कैट के चेयरपर्सन की नियुक्ति करते समय कुछ भी ध्यान में नहीं रखा गया है और नियुक्ति को नियंत्रित करने वाले वैधानिक नियमों का पालन नहीं किया गया है। याचिका पर विचार करने की अनिच्छा जाहिर करते हुए पीठ ने कहा कि अधिकार-पृच्छा (एक न्यायिक आदेश जो किसी व्यक्ति को यह दिखाने के लिए कहता है कि कार्यालय या मताधिकार किस वारंट पर है) को ऐसे मामलों में जारी नहीं किया जा सकता है। इस पर वरिष्ठ वकील ने याचिका वापस लेने का निर्णय लिया। कैट में नियुक्ति से पहले दास एक जानी मानी वकील थीं।

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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : Social media

पैरोल अवधि को सजा में शामिल नहीं किया जा सकता- SC
 सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को कहा कि किसी कैदी की समय से पूर्व रिहाई पर विचार करते समय उसे दी गई पैरोल की अवधि को वास्तविक सजा में शामिल नहीं किया जा सकता।
जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस सीटी रविकुमार की पीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि यदि सजा में पैरोल अवधि को शामिल किया जाता है तो एक प्रभावशाली कैदी को कई बार पैरोल मिल सकती है। यह वास्तविक कारावास के मकसद के विरुद्ध होगा। पीठ ने कहा, वास्तविक सजा के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए हमारा स्पष्ट मत है कि पैराेल की अवधि को सजा से बाहर रखना चाहिए। हम हाईकोर्ट के फैसले से पूरी तरह सहमत हैं। शीर्ष अदालत आजीवन कारावास की सजा काट रहे कुछ दोषियों की ओर से दायर अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिन्हें गोवा जेल नियम, 2006 के प्रावधानों के तहत पैरोल पर रिहा किया गया था।

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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला

सुप्रीम कोर्ट ने की अहम टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को कहा कि सुविधा परिषद से पारित निर्णय या डिक्री के तहत राशि की वसूली के लिए सुरक्षित संपत्तियों के संबंध में सरफेसी अधिनियम के तहत वसूली सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास (एमएसएमईडी) अधिनियम 2006 की वसूली पर हावी होगी। शीर्ष अदालत ने कहा, सरफेसी अधिनियम 2002 को वित्तीय संपत्तियों के प्रतिभूतिकरण और पुनर्निर्माण को विनियमित करने व सुरक्षा हित लागू करने व संपत्ति के अधिकारों पर सृजित सुरक्षा हित के केंद्रीय ऋण का प्रावधान करने के लिए बनाया गया था।

जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस कृष्ण मुरारी की पीठ का फैसला उस अपील पर आया जिसमें यह सवाल उठाया गया था कि क्या एमएसएमईडी अधिनियम के तहत वसूली की कार्यवाही सरफेसी अधिनियम के प्रावधानों के तहत समान कार्यवाही पर प्रभावी होगी। सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की एक खंडपीठ के अगस्त 2017 के फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें कहा गया था कि एमएसएमईडी अधिनियम ऐसे मामलों में सरफेसी अधिनियम पर हावी रहेगा। खंडपीठ ने एकल जज के फैसले को रद्द कर दिया था जिसमें कहा गया था कि सरफेसी अधिनियम एमएसएमईडी अधिनियम की अवहेलना करता है।

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