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Supreme Court: 'आरोप पत्र-पुलिस रिपोर्ट में जांच अधिकारी को देना होगा पूरा विवरण', अदालत ने जारी किए निर्देश

Tue, 12 Mar 2024 09:07 PM IST
निर्मल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: निर्मल कांत Updated Tue, 12 Mar 2024 09:07 PM IST
सार

Supreme Court: शीर्ष अदालत ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 173 (2) के तहत पेश की गई पुलिस रिपोर्ट अभियोजन, बचाव पक्ष और अदालत के नजरिए बहुत महत्वपूर्ण दस्तावेज है।

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SC passes directions on details to be mentioned in police report
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर गौर किया कि जांच अधिकारी अक्सर आरोप पत्र या पुलिस रिपोर्ट पेश करते समय सीआरपीसी की धारा 173 (2) के प्रावधानों का पालन नहीं करते हैं। शीर्ष अदालत ने मंगलवार को अंतिम रिपोर्ट के लिए प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए निर्देश जारी किए हैं। 

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दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 173 जांच पूरी होने पर पुलिस अधिकारी की रिपोर्ट से संबंधित है। जबकि धारा 173 (2) में कहा गया है कि पुलिस रिपोर्ट पूरी होने पर थाने का प्रभारी अधिकारी उस पर अपराध का संज्ञान लेने के लिए उसे मजिस्ट्रेट को भेजगा। 
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न्यायमूर्ति बेला एम त्रिवेदी और न्यायमूर्ति पंकज मित्तल की पीठ ने कहा, "सीआरपीसी की धारा 173 (2) के तहत पेश की गई पुलिस रिपोर्ट अभियोजन, बचाव पक्ष और अदालत के नजरिए बहुत महत्वपूर्ण दस्तावेज है।"
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पीठ ने कहा, हम धारा 173 (2) को लेकर ज्यादा चिंतित हैं। हमने पाया है कि जांच अधिकारी आरोपपत्र या पुलिस रिपोर्ट दाखिल करते समय उसके प्रावधानों की जरूरतों का पालन नहीं करते हैं। शीर्ष अदालत ने कहा कि जांच अधिकारी की ओर से प्रावधानों की जरूरतों का कड़ाई से पालन करना जरूरी है। इसके प्रावधानों का पालन न करने से अदालत में कई कानूनी मुद्दे जन्म लेते हैं।

पीठ ने कहा, धारा 173 के प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए यह निर्देश दिया जाता है कि जांच पूरी होने पर पुलिस अधिकारी की रिपोर्ट में 'पार्टियों के नाम, सूचना की प्रकृति, मामले की परिस्थितियों से परिचित व्यक्तियों के नाम, क्या कोई अपराध किया गया है या नहीं, अगर हां तो किसके द्वारा किया गया' शामिल होंगे। 

अदालत ने कहा कि रिपोर्ट में यह बात भी बतानी होगी कि क्या आरोपी को गिरफ्तार किया गया है और क्या उसे मुचलके पर रिहा किया गया है। अगर रिहा किया गया है तो जमानतदारों के साथ किया गया है या उनके बिना किया गया है।अदालत ने कहा कि जहां जांच यौन उत्पीड़न के अपराधों से संबंधित है, वहां रिपोर्ट में यह जिक्र होना चाहिए कि क्या महिला की मेडिकल जांच की रिपोर्ट जोड़ी गई है या नहीं। 


शीर्ष अदालत ने कहा, अगर जांच पूरी होने पर आरोपी को मजिस्ट्रेट के पास भेजने के लिए पर्याप्त सबूत या उचित आधार नहीं मिलते हैं, तो प्रभारी पुलिस अधिकारी को सीआरपीसी की धारा 169 के अनुपालन में इस बारे में रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से बताना होगा।  
 

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