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SC: 'कानून बनाना अदालत का काम नहीं', सुप्रीम कोर्ट ने दहेज कानून को लिंग-निरपेक्ष बनाने की याचिका खारिज की
Tue, 15 Apr 2025 05:54 PM IST
शुभम कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शुभम कुमार
Updated Tue, 15 Apr 2025 05:54 PM IST
सार
दहेज उत्पीड़न और भरण-पोषण से जुड़े कानूनों को पुरुष और महिलाओं दोनों के लिए समान बनाने की मांग वाली जनहित याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को खारिज कर दिया। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि दुरुपयोग के आधार पर किसी कानून को खत्म नहीं किया जा सकता।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : PTI
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को दहेज उत्पीड़न और भरण-पोषण से जुड़े कानूनों को लिंग-निरपेक्ष यानी पुरुष और महिलाओं दोनों के लिए समान बनाने की मांग वाली जनहित याचिका को खारिज कर दिया। यह याचिका एनजीओ 'जनश्रुति' द्वारा दाखिल की गई थी, जिसमें दावा किया गया था कि इन कानूनों का अक्सर पतियों और उनके परिवारों को परेशान करने के लिए दुरुपयोग किया जाता है।
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कानून बनाना अदालत का काम नहीं- पीठ
याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने साफ कहा कि कानून बनाना अदालत का काम नहीं है, ये जिम्मेदारी संसद की है। पीठ ने आगे कहा कि हमें बताइए कौन-सा कानून है जिसका दुरुपयोग नहीं होता? क्या हर कानून को इसी आधार पर खत्म कर देना चाहिए? साथ ही कोर्ट ने ये भी कहा कि महिलाओं की सुरक्षा और सशक्तिकरण के लिए बने प्रावधानों को सिर्फ इसलिए नहीं बदला जा सकता क्योंकि कुछ मामलों में उनका दुरुपयोग हुआ हो।
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कोर्ट का सुझाव
याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने मामले में सुझाव दिया। कोर्ट ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति को इन कानूनों से परेशानी है, तो उसे सीधे व्यक्तिगत याचिका दाखिल करनी चाहिए, ना कि एनजीओ के जरिए जनहित याचिका।बता दें कि याचिका में कहा गया था कि विदेशों में पुरुष भी घरेलू हिंसा और भरण-पोषण के लिए केस दर्ज कर सकते हैं, लेकिन भारत में ऐसा नहीं है। इस पर कोर्ट ने जवाब दिया कि तो क्या हम हर बात में विदेशी कानूनों की नकल करें? भारत एक संप्रभु राष्ट्र है और अपने संविधान के अनुसार काम करेगा।
पीठ ने संविधान का जिक्र कर, वकील से पूछे तीखे सवाल
सुनवाई के दौरान पीठ ने संविधान का जिक्र करते हुए कहा कि अनुच्छेद 15 संसद को महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए विशेष कानून बनाने की अनुमति देता है। यह कहना कि कानून का दुरुपयोग हो रहा है, एक सामान्य आरोप है, जिसे हर मामले में अलग-अलग देखा जाना चाहिए। इसके साथ ही पीठ ने याचिकाकर्ता वकील से सवाल पूछे कि क्या आप कह सकते हैं कि कोई भी नवविवाहित महिला दहेज के लिए परेशान नहीं होती? क्या हम सिर कलम करने जैसे अपराधों में भी दुरुपयोग की अवधारणा लागू करें?
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यह एक प्रशासनिक मुद्दा है- अदालत
कोर्ट ने यह भी कहा कि इस तरह के मामलों में तेजी लाने के लिए अधिक अदालतें, मजिस्ट्रेट और बुनियादी ढांचे की ज़रूरत है, जो एक प्रशासनिक मुद्दा है। अंत में कोर्ट ने कहा कि याचिका में उठाए गए मुद्दे सामान्य और व्यापक हैं, जिन पर मामला-दर-मामला आधार पर ही गौर किया जा सकता है। देखा जाए तो उच्चतम न्यायालय के द्वारा इस याचिका को खारिज करने के साथ ही ये बात साफ हो गई है कि अदालत 498A और भरण-पोषण जैसे कानूनों को लिंग-निरपेक्ष बनाने की मांग पर अब सीधे हस्तक्षेप नहीं करेगी और इस दिशा में कोई भी बदलाव सिर्फ संसद ही कर सकती है।