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Supreme Court: DAMEPL-DMRC विवाद में दिल्ली हाईकोर्ट को निर्देश, तीन महीने में अपना फैसला लागू करने को कहा

Wed, 14 Dec 2022 10:36 PM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिव शरण शुक्ला Updated Wed, 14 Dec 2022 10:36 PM IST
सार

डीएएमईपीएल-डीएमआरसी के बीच 4600 करोड़ की मध्यस्थता राशि को लेकर चल रहे विवाद में शीर्ष कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट को निर्देश दिया है। शीर्ष कोर्ट ने कहा है कि इस मुद्दे के संबंध में तीन महीने के भीतर वह अपना फैसला लागू करवाए। पढ़ें सुप्रीम कोर्ट से जुड़ी खबरें...

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SC directs HC to enforce arbitration award granted to DAMEPL in 3 month Supreme Court update NEWS
सुप्रीम कोर्ट। - फोटो : ANI

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को  दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (DMRC) द्वारा भुगतान किए जाने वाले डीएएमईपीएल के पक्ष में मध्यस्थता राशि को लागू करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई की। सुनवाई के दौरान जस्टिस बी आर गवई और विक्रम नाथ की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट को निर्देश दिया कि वह वह दिल्ली एयरपोर्ट मेट्रो एक्सप्रेस प्राइवेट लिमिटेड (डीएएमईपीएल) के पक्ष में दिये गये 4,600 करोड़ रुपये के मध्यस्थता फैसले को जल्द से जल्द अमलीजामा पहनाए। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि इस मुद्दे को तीन महीने के भीतर एयरपोर्ट एक्सप्रेस मेट्रो लाइन की सुरक्षा का ध्यान रखते हुए एक तार्किक अंत तक ले जाए। 

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दरअसल, एक मध्यस्थ न्यायाधिकरण ने रिलायंस इंफ्रा के डीएएमईपीएल के पक्ष में फैसला सुनाते हुए  डीएएमईपीएल  के दावे को स्वीकार किया था कि जिस वायाडक्ट से ट्रेन गुजरेगी, उसमें संरचनात्मक दोषों के कारण लाइन पर परिचालन चलाना व्यवहारिक नहीं था। इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने इसी साल 10 मार्च को डीएमआरसी को आदेश दिया था कि मध्यस्थता अवार्ड के 4600 करोड़ रुपये डीएएमईपीएल को ब्याज समेत दो किस्तों में चुकाए। पहली किस्त 30 अप्रैल तक और दूसरी 31 मई तक देनी थी। जब डीएमआरसी ने इसका पालन नहीं किया तो डीएएमईपीएल ने सुप्रीम कोर्ट का मामला खटखटाया था। 
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सुप्रीम कोर्ट ने की यह टिप्पणी
इसी मामले में यह देखते हुए कि फैसले के निष्पादन के संबंध में कानून सरकार या उसके वैधानिक निगमों के लिए अलग नहीं है, जस्टिस बी आर गवई और विक्रम नाथ की पीठ ने कहा कि 'डीएएमईपीएल के पक्ष में मध्यस्थता का निर्णय अंतिम रूप है। पीठ ने कहा कि सामान्य परिस्थितियों में हम इस मामले पर विचार नहीं करते। याचिकाकर्ता के पक्ष में पारित मध्यस्थता निर्णय अंतिम रूप से पहुंच गया है क्योंकि प्रतिवादी द्वारा दायर अपील खारिज कर दी गई है। ऐसे में हम उच्च न्यायालय को तेजी से आगे बढ़ने और इसे तीन महीने की अवधि के भीतर तार्किक अंत तक ले जाने का निर्देश देते हैं।'
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ये है मामला
डीएएमईपीएल में 95 फीसदी हिस्सेदारी रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर की है जो अनिल अंबानी की कंपनी है। इस कंपनी पर 11 बैंकों की भारी-भरकम राशि का कर्ज है। इस कंपनी ने दिल्ली एयरपोर्ट एक्सप्रेस लाइन मेट्रो का निर्माण किया था। इसका परिचालन इसी कंपनी को करना था, लेकिन बाद में डीएमआरसी ने इसका परिचालन अपने हाथ में ले लिया था। यह लाइन 23 फरवरी 2011 से परिचालन में है।

दरअसल, वर्ष 2008 में रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर की इकाई ने 2038 तक सिटी रेल परियोजना चलाने के लिए दिल्ली मेट्रो रेल कॉपोर्रेशन के साथ एक करार किया था। 2012 में अंबानी की कंपनी ने शुल्क और संचालन को लेकर विवादों के कारण राजधानी के एयरपोर्ट मेट्रो प्रोजेक्ट का संचालन बंद कर दिया था।

कंपनी ने करार के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए डीएमआरसी के खिलाफ आर्बिट्रेशन का मामला शुरू किया और ट्रर्मिनेशन शुल्क की मांग की थी। तब कंपनी के वकीलों ने अदालत से कहा था कि रिलायंस, कर्ज दाताओं को भुगतान करने के लिए पैसे का इस्तेमाल करेगी। जिसके बाद शीर्ष अदालत ने बैंकों को कंपनी के खातों को एनपीए के रूप में चिह्नित करने से रोक दिया था।
 

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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला

अदालती कार्यवाही में बाधा डालने वालों पर होगी कड़ी कार्रवाई, SC ने दी चेतावनी
ओडिशा के संबलपुर में हाईकोर्ट की एक स्थायी खंडपीठ स्थापित करने की मांग को लेकर ओडिशा के वकीलों द्वारा किए जा रहे विरोध और प्रदर्शन पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताई है। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को इस मामले में चेतावनी देते हुए कहा कि ओडिशा के कुछ जिलों में अदालतों में तोड़फोड़ करने और कार्यवाही बाधित करने वालों के खिलाफ वह कड़ी कार्रवाई करेगा। इसमें बार के सदस्य भी शामिल हैं। इतना ही नहीं, अदालत ने राज्य पुलिस की आलोचना करते हुए कहा कि वह स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पूरी तरह से विफल" रही। 

न्यायमूर्ति एस के कौल और न्यायमूर्ति ए एस ओका की पीठ ने कहा, 'पीठ के गठन की कोई उच्च उम्मीद नहीं है। यहां तक कि अगर कुछ दूरस्थ संभावना थी, जो अब उनके आचरण के कारण खो गई है।' शीर्ष अदालत ने ओडिशा के पुलिस महानिदेशक और संबलपुर के महानिरीक्षक से कहा कि अगर राज्य पुलिस स्थिति को नियंत्रित करने में असमर्थ है, तो अदालत वहां अर्धसैनिक बलों को हालात से निपटने के लिए भेज देगी। इसके साथ ही पीठ ने कहा कि हिंसक विरोध प्रदर्शन में शामिल लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की जानी चाहिए और उन पर मुकदमा चलाया जाना चाहिए।

इस दौरान, बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) ने पीठ को सूचित किया कि उसने संबलपुर जिला बार एसोसिएशन के 43 आंदोलनकारी अधिवक्ताओं को कथित तौर पर तोड़फोड़ में शामिल होने के लिए निलंबित कर दिया है।

मतदाता प्रोफाइलिंग के आरोप पर चुनाव आयोग को नोटिस

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भारतीय निर्वाचन आयोग। - फोटो : अमर उजाला
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को मतदाता प्रोफाइलिंग के आरोप पर चुनाव आयोग के खिलाफ नोटिस जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग और अन्य से उस याचिका पर जवाब मांगा, जिसमें आरोप लगाया गया है कि आयोग ने 2015 में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में मतदाता सूची से 46 लाख नामों को स्वत: हटा दिया था। हैदराबाद के एक इंजीनियर श्रीनिवास कोडाली की ओर से दायर याचिका में आरोप लगाया गया है कि चुनाव आयोग मतदाता रिकॉर्ड को आधार से जोड़ने के लिए एक अघोषित सॉफ्टवेयर लगा कर मतदाता प्रोफाइलिंग कर रहा है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस पीएस नरसिम्हा की पीठ ने कहा कि यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। कोडाली ने पहले तेलंगाना हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जिसने उनकी जनहित याचिका खारिज कर दी थी। याचिका में कहा गया है कि चुनाव आयोग ने राज्य सरकारों को मतदाता रिकॉर्ड तक पहुंचने और प्रतियां बनाने की अनुमति दी है।
संवेदनशील सूचनाएं मतदाता जानकारी से जोड़ी गईं
याचिकाकर्ता का कहना है कि आयोग ने प्रभावी रूप से एक निगरानी तंत्र का गठन किया है। मतदाताओं के धर्म, जाति, जनजाति, जातीयता, भाषा, पात्रता के रिकॉर्ड, आय और चिकित्सा इतिहास सहित संवेदनशील सूचनाओं को अब मतदाता जानकारी से जोड़ा गया है। यह राजनेताओं के लिए लोगों को ‘हित समूहों’ में विभाजित करने की अनुमति देगा। इससे या तो उन्हें चुनावी प्रक्रिया से चुनिंदा रूप से लक्षित करेगा या उनकी उपेक्षा करेगा, जिससे चुनाव के स्वतंत्र और निष्पक्ष संचालन में हस्तक्षेप होगा।

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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला

आंध्र प्रदेश ने खटखटाया सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा
आंध्र प्रदेश सरकार ने अपने और तेलंगाना के बीच संपत्ति और देनदारियों के समान और तेजी से बंटवारे की मांग को लेकर उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। याचिका में दावा किया गया है कि संपत्ति के गैर-विभाजन से तेलंगाना को लाभ हुआ है, क्योंकि इनमें से लगभग 91 प्रतिशत हैदराबाद में स्थित हैं। याचिका में शीर्ष अदालत से 'परेंस पैट्रिए' (राष्ट्र के माता-पिता) के रूप में संपर्क किया गया है।

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ईडी - फोटो : अमर उजाला

ईडी के समन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची झारखंड सरकार
झारखंड सरकार ने केंद्रीय धन शोधन रोधी जांच एजेंसी द्वारा आपराधिक मामले की जांच करने वाले अपने पुलिस अधिकारियों को जारी समन को रद्द करने की मांग को लेकर उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। मामले को अतिरिक्त महाधिवक्ता अरुणभ चौधरी द्वारा तत्काल सूचीबद्ध करने की मांग की गई। इस पर प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा की पीठ ने झामुमो के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार की याचिका पर जनवरी में सुनवाई के लिए विचार करने पर सहमति जताई।

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