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Supreme Court: 'बांग्लादेशी अप्रवासियों को नागरिकता देने का डेटा उपलब्ध कराए केंद्र'; सुप्रीम कोर्ट का निर्देश

Thu, 07 Dec 2023 09:06 PM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिव शरण शुक्ला Updated Thu, 07 Dec 2023 09:06 PM IST
सार

शीर्ष कोर्ट की संविधान पीठ ने इन याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा कि केंद्र सरकार एक जनवरी 1966 से 25 मार्च 1971 के बीच असम में भारतीय नागरिकता पाने वाले बांग्लादेशी अप्रवासियों की संख्या का डेटा उपलब्ध कराये।अदालत ने इस संबंध में केंद्र को 11 दिसंबर तक हलफनामा दाखिल करने को कहा है।

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SC asks Centre to provide data on grant of citizenship to Bangladeshi immigrants in Assam updates news
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI

विस्तार

असम में भारतीय नागरिकता पाने वाले बांग्लादेशी अप्रवासियों के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से डेटा उपलब्ध कराने को कहा है। गुरुवार को मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने केंद्र सरकार को यह निर्देश दिया है। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने यह निर्देश असम में अवैध अप्रवासियों से संबंधित नागरिकता अधिनियम की धारा 6 ए की संवैधानिक वैधता की जांच करने के लिए 17 याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिए। 

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शीर्ष कोर्ट की संविधान पीठ ने इन याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा कि केंद्र सरकार एक जनवरी 1966 से 25 मार्च 1971 के बीच असम में भारतीय नागरिकता पाने वाले बांग्लादेशी अप्रवासियों की संख्या का डेटा उपलब्ध कराये।अदालत ने इस संबंध में केंद्र को 11 दिसंबर तक हलफनामा दाखिल करने को कहा है। इसके साथ ही अदालत ने राज्य सरकार से डेटा प्रदान करने को कहा है। बता दें संविधान पीठ में न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश, न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा भी शामिल हैं।
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इस दौरान पीठ केंद्र से देश भर में खासतौर पर उत्तर पूर्वी राज्यों में अवैध आप्रवासन से निपटने के लिए उठाए गए कदमों के बारे में उसे बताने को कहा है। पीठ ने कहा कि हमारा विचार है कि केंद्र सरकार के लिए अदालत को डेटा-आधारित खुलासे प्रदान करना आवश्यक होगा। हम निर्देश देते हैं कि सोमवार को या उससे पहले इस अदालत में इस संबंध में एक हलफनामा दायर किया जाए।
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इसके साथ ही पीठ ने केंद्र को सीमा पर बाड़ लगाने की स्थिति और इसे पूरा करने की अनुमानित समयसीमा के संबंध में विवरण पेश करने के लिए कहा है। सुनवाई के दौरान पीठ ने केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से 1971 के बाद अवैध आप्रवासन पर सरकार के पास उपलब्ध आंकड़ों के बारे में पूछा।

पश्चिम बंगाल का जिक्र करते हुए मेहता ने कहा, 'बांग्लादेश के मामले में, उनकी भाषा, उनका खान-पान, उनका पहनावा सब कुछ आसानी से मिल जाते हैं। शायद इसी वजह से कोई हंगामा नहीं होता।’ पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने यह तर्क दिया था कि असम के साथ जो किया गया वह पश्चिम बंगाल के साथ नहीं किया गया। पीठ ने पूछा, ’हम जानना चाहते हैं कि संसद द्वारा नागरिकता प्रदान करने के लिए पश्चिम बंगाल को बाहर करने का क्या कारण था। हम यह नहीं कह रहे हैं कि उन्हें इसकी अनुमति देनी चाहिए थी। यह क्यों समझा गया कि यह समस्या असम की है, बंगाल की नहीं। इसे विश्वास करने का क्या कारण है। हमने पश्चिम बंगाल को अकेला क्यों छोड़ दिया?’ पीठ ने जानना चाहा कि 1971 के बाद अवैध प्रवासन किस हद तक थी और सरकार पश्चिम बंगाल में क्या कर रही थी। जिस पर सॉलिसिटर जनरल ने इस संबंध में हलफनामा दाखिल करने की बात कही। 

पीठ ने मेहता से पूछा, ’जब पश्चिम बंगाल बांग्लादेश के साथ अपेक्षाकृत बड़ी सीमा साझा करता है तो आपने असम को क्यों अलग कर दिया और बांग्लादेश से आए प्रवासियों को पश्चिम बंगाल में नागरिकता क्यों नहीं दी गई? केवल असम के लिए इसकी अनुमति क्यों दी गई? क्या हमारे पास यह बताने के लिए कोई डेटा है कि पश्चिम बंगाल में अवैध प्रवासन न्यूनतम था इसलिए इसे छोड़ दिया गया?’ पीठ ने कहा कि भारत कोई अधिनायकवादी देश नहीं है और उसे कानून के शासन के अनुसार चलना होगा और यदि ऐसा नहीं होता है तो वास्तविक लोगों को बाहर निकाला जा सकता है।  

SC ने इंटरनेट शटडाउन पर दिशानिर्देश लागू करने की मांग वाली याचिका खारिज की
सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर द्वारा लगाए गए इंटरनेट शटडाउन पर उसके द्वारा जारी 2020 दिशानिर्देशों को लागू करने की मांग करने वाली एक अर्जी गुरुवार को खारिज कर दी है। न्यायमूर्ति बीआर गवई, न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार की पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता के पास दिशानिर्देशों को लागू करने के लिए अन्य उपाय उपलब्ध हैं।

बता दें कि 10 जनवरी, 2020 को शीर्ष अदालत ने कहा था कि बोलने की स्वतंत्रता और इंटरनेट पर व्यापार करने की स्वतंत्रता संविधान के तहत संरक्षित है, क्योंकि इसने जम्मू-कश्मीर प्रशासन को प्रतिबंध आदेशों की तुरंत समीक्षा करने का निर्देश दिया था। इसमें कहा गया था कि सीआरपीसी की धारा 144 के तहत प्रशासनिक शक्ति का इस्तेमाल राय या शिकायत की वैध अभिव्यक्ति या किसी भी लोकतांत्रिक अधिकार के प्रयोग को दबाने के लिए नहीं किया जा सकता है।

मुख्य सचिव की हरकतों से चुनी हुई सरकार पर असर नहीं पड़ना चाहिए 
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के दिल्ली के मुख्य सचिव नरेश कुमार के कार्यकाल को छह महीने तक बढ़ाने के फैसले को सही ठहराया। इस दौरान मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि मुख्य सचिव के कार्यों या निष्क्रियताओं से निर्वाचित सरकार में 'ठहराव' में नहीं आना चाहिए। शीर्ष कोर्ट ने 29 नवंबर के अपने फैसले में नरेश कुमार को छह महीने का सेवा विस्तार देने को हरी झंडी दिखाई थी। यह फैसला बाद में सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड किया गया। नरेश कुमार 30 नवंबर को सेवानिवृत होने वाले थे।

चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने 28 पेज के अपने फैसले में कहा, इस अदालत ने 2023 के संविधान पीठ के फैसले में कहा कि सरकारी सेवकों को राजनीतिक रूप से तटस्थ होना आवश्यक है। उसे सामूहिक जिम्मेदारी की त्रिस्तरीय-शृंखला में अंतर्निहित सिद्धांत को प्रभावी बनाने के लिए निर्वाचित शाखा के निर्देशों का पालन करना चाहिए। इस हिसाब से मुख्य सचिव का पद विशिष्ट है। मुख्य सचिव के कार्यों (या निष्क्रियताओं) को निर्वाचित सरकार को ठहराव में नहीं डालना चाहिए।

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