Satyapal Malik: कभी एक बड़ी संभावना थे सत्यपाल मलिक; कभी चरण सिंह के राजनीतिक वारिस के रूप में भी देखे जाते थे
मेरा सत्यपाल मलिक से रिश्ता 40 वर्षों से भी ज्यादा पुराना है। मेरे पत्रकारिता में आने से पहले भी सत्यपाल मलिक समाजवादी लोकदल धारा के छात्रों युवाओं के बीच बेहद लोकप्रिय नेता थे। 1967 में मेरठ विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे सत्यपाल मलिक समाजवादी आंदोलन का प्रमुख युवा चेहरा थे।
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पूर्व केंद्रीय मंत्री और जम्मू कश्मीर के सर्वाधिक चर्चित पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक आज इस दुनिया से चले गए। मलिक पिछले कुछ वर्षों से चर्चा और विवादों में इसलिए रहे, क्योंकि कभी मोदी सरकार के वह इतने भरोसेमंद थे कि उन्हें न सिर्फ बिहार, ओडिशा, जम्मू-कश्मीर, गोवा और मेघालय का राज्यपाल बनाया गया, बल्कि जनसंघ के जमाने से भाजपा का प्रमुख राजनीतिक वैचारिक एजेंडा रहे जम्मू-कश्मीर से संविधान के अनुच्छेद 370 को हटाने में मलिक ही वाहक बने। ये अलग बात है अपने लंबे राजनीतिक जीवन में अनुच्छेद 370 हटाने के धुर विरोधी रहे सत्यपाल मलिक बतौर जम्मू कश्मीर राज्यपाल की सिफारिश से ही उसे हटाया गया।
मेरा सत्यपाल मलिक से रिश्ता 40 वर्षों से भी ज्यादा पुराना है। मेरे पत्रकारिता में आने से पहले भी सत्यपाल मलिक समाजवादी लोकदल धारा के छात्रों युवाओं के बीच बेहद लोकप्रिय नेता थे। 1967 में मेरठ विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे सत्यपाल मलिक समाजवादी आंदोलन का प्रमुख युवा चेहरा थे। फिर वो चौधरी चरण सिंह के प्रिय शिष्य बने और 1947 में पहली बार बागपत क्षेत्र से उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए चुने गए। तब वो देश प्रदेश के सबसे युवा विधायक थे।
सत्यपाल मलिक को एक समय चरण सिंह के राजनीतिक वारिस के रूप में देखा जाता था। आपातकाल में जेल में रहने के बावजूद मलिक बाद में कांग्रेस में शामिल हो गये। 1977 में बनी जनता पार्टी के टूटने के बाद इंदिरा गांधी और चरण सिंह की राजनीतिक दोस्ती करवाने वालों में मलिक की भी प्रमुख भूमिका थी। अपने समाजवादी तेवर धर्मनिरपेक्ष विचारों और किसानपरस्ती के लिए मशहूर सत्यपाल मलिक से मेरी निकटता अस्सी के दशक में जब मैं पश्चिमी उत्तर प्रदेश की रिपोर्टिंग करता था काफी ज्यादा हो गई थी।
निस्संदेह पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मलिक की लोकप्रियता थी और इसीलिए उन्हें चरण सिंह की सियासी विरासत में चरण सिंह के बेटे अजित सिंह के प्रतिद्वंदी के तौर पर भी देखा जाता था। सत्यपाल मलिक 1990 में वीपी सिंह सरकार में मंत्री बनें। कांग्रेस में वो अरुण नेहरू के काफी करीब थे और उनके साथ ही उन्होंने कांग्रेस छोड़ी। वह देवीलाल मुलायम सिंह यादव अजित सिंह के साथ भी रहे, लेकिन बाद में भाजपा में चले गए, लेकिन वहां हमेशा असहज ही रहे। भाजपा की किसान राजनीति को लेकर हमेशा उनके मन में तीस रही, जिसे वो अक्सर व्यक्त करते रहते थे। वो किसी भी दल और पद पर रहे हों, किसानों के मुद्दों और आंदोलनों का उन्होंने हमेशा पुरजोर समर्थन किया और उनके यही तेवर भाजपा और केंद्र सरकार के साथ गंभीर मतभेद की वजह बने। किसानों के लिए मालिक ने कभी किसी की परवाह नहीं की। मेरठ सहित पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हर इलाके में सत्यपाल मलिक के युवा अनुयायियों की कोई कमी नहीं रही और वीपी सिंह की पूरी मुहिम मलिक के ही कंधों पर चली थी। उत्तर प्रदेश के अलावा हरियाणा राजस्थान पंजाब आदि राज्यों में भी उनकी लोकप्रियता थीं।
सत्यपाल मलिक का पूरा जीवन खुली किताब था। विधायक सांसद मंत्री राज्यपाल रहते हुए भी वो सबके लिए सहज सुलभ थे। अपना फोन खुद ही उठाते थे। पहली बार जब वो केंद्र में मंत्री बने तो मैं उनसे छह महीने बाद एक कार्यक्रम में मिला। जबकि इसके पहले मेरी अमूमन हर दूसरे तीसरे रोज उनसे मुलाकात होती थी। उन्होंने शिकायत की पंडित जी क्या नाराज हो कोई खोज खबर नहीं। मैंने कहा अब आप मंत्री हैं आपके पास समय कहां है। ठहाका लगा कर बोले जिस दिन ये नौबत आएगी मैं कुर्सी छोड़ दूंगा। फिर मेरे कंधे पर हाथ रख कर कहा जब भी जी चाहे आ जाया करो। मैं वही सत्यपाल मलिक हूं और वही रहूंगा। अपनी इस बात को उन्होंने हमेशा निभाया। राज्यपाल बनने के बाद जब मैंने उन्हें महामहिम कहा तो बोले सतपाल भाई कहते हो वही कहो। कई बार उन्होंने जम्मू कश्मीर गोवा मेघालय बुलाया पर मैं जा नहीं सका। बीमार होने से पहले मैंने उनका इंटरव्यू किया था। शरीर कमजोर हो गया था, पर मन वैसा ही मजबूत था। इसीलिए सीबीआई की चार्जशीट भी उन्हें अपने इरादों से डिगा नहीं सकी।
बागपत जिले में उनके गांव हिसावदा से शुरू हुई सत्यपाल मलिक की जीवन यात्रा आज नई दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में समाप्त हुई। मैं हमेशा उनसे कहता था कि आप राजनीति के जीतने अंदरूनी किस्से हमें बताते हैं, उन्हें एक किताब में सिलसिलेवार लिखिए। वो कहते थे लिखूंगा तो कई छवियां धूमिल हो जाएंगी। आज सत्यपाल भाई अपने उन किस्सों के साथ दुनिया से विदा हो गए। मेरी ये निजी क्षति है, क्योंकि मेरे लिये वो सिर्फ एक नेता ही नहीं, बड़े भाई जैसे भी थे। सत्यपाल मलिक गैर कांग्रेस, गैर भाजपा राजनीति में कभी एक बड़ी संभावना थे, लेकिन परिस्थितियों ने उन्हें वो संभावना बनने नहीं दिया। विनम्र श्रद्धांजलि।