फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   Sanjiva Reddy wanted to be the President at the age of 54

54 साल में ही क्यों राष्ट्रपति बनना चाहते थे नीलम संजीव रेड्डी?

Sun, 20 Nov 2016 05:57 PM IST
शशिधर पाठक/नई दिल्ली
शशिधर पाठक/नई दिल्ली Updated Sun, 20 Nov 2016 05:57 PM IST
विज्ञापन
Sanjiva Reddy wanted to be the President at the age of 54

राष्ट्रपति प्रणब राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने संजीव रेड्डी के 54 वर्ष की उम्र में ही राष्ट्रपति बनने की मंशा पर सवाल उठाया है। ने संजीव रेड्डी के 54 वर्ष की उम्र में ही राष्ट्रपति बनने की मंशा पर सवाल उठाया है। महामहिम के अनुसार नीलम संजीव रेड्डी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का अधिकार कम करने के लिए 1969 में इस पद के उम्मीदवार बन गए थे और इंदिरा गांधी इस षडयंत्र को बखूबी समझ रही थी। दरअसल, यह वह दौर था जब केंद्र में नाम मात्र का ही विपक्ष था। ऐसे में संजीव रेड्डी का राष्ट्रपति पद के लिए नामांकन प्रधानमंत्री पद की शक्तियों को कम करने का प्रयास था।

विज्ञापन


प्रणब मुखर्जी कहते हैं कि इससे पहले 1967 में राष्ट्रपति पद का चुनाव नाटकीय था। इसके बाद 1969 में डा. जाकिर हुसैन की मृत्यु के कारण फिर राष्ट्रपति पद का चुनाव हुआ और इसमें संजीव रेड्डी प्रत्याशी बनने के लिए आगे आ गए। इंदिरा जी को संजीव रेड्डी के बहाने चल रहे इस पूरे खेल का एहसास था।
विज्ञापन


वह शायद इस पूरे खेल को समझ रही थी। इंदिरा जी के 100 वें जन्मदिन पर अपने व्याख्यान में प्रणब दा ने कहा कि इंदिरा जी नहीं चाहती थी कि प्रधानमंत्री की शक्ति हो और राष्ट्रपति की भूमिका बढ़े। उनका गहराई से मानना था कि भारत जैसे संसदीय लोकतंत्र में प्रधानमंत्री की भूमिका सर्वोच्च होनी चाहिए।

विज्ञापन
विज्ञापन

नाटकीय था राष्ट्रपति चुनाव

Sanjiva Reddy wanted to be the President at the age of 54

राष्ट्रपति ने इतिहासकारों से इस घटनाक्रम का बारीकी से अध्ययन करने की अपील की है।  प्रणब दा ने कहा कि इसको लेकर दो विचारणीय प्रश्न हैं। पहला यक्ष प्रश्न यह है कि क्यों न्यायपालिका से एक भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश के. सुब्बाराव अभूतपूर्व और अप्रत्याशित ढंग से 1967 के राष्ट्रपति चुनाव में कूद गए और विपक्ष के उम्मीदवार बन गए थे?

जस्टिस सुब्बाराव की अध्यक्षता में एक खंडपीठ ने 27 फरवरी 1967 को गोलकनाथ निर्णय दिया था। निर्णय में व्याख्या की गई थी कि संविधान के अंतर्गत, संसद को मौलिक अधिकार में संशोधन करने की शक्ति नहीं प्रदान की गई है। इस निर्णय का दूरगामी परिणाम आया और विवाद का विषय बन गया।

दूसरे प्रश्न पर उन्हें भी हैरानी होती है कि आखिर क्यों इतनी कम उम्र(54) में संजीव रेड्डी राष्ट्रपति बनना चाहते थे? वह अपेक्षाकृत युवा, इंदिरा जी से उम्र में चार साल छोटे थे। दो बार एक राज्य के मुख्यमंत्री, कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष, केंद्र सरकार में मंत्री रह चुके थे और बिना किसी कार्यकारी शक्ति के राष्ट्रपति पद को चुनने का निर्णय किया? इंदिरा जी के प्रतिद्वंदी राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच टकराव पैदा करने के लिए संवैधानिक राष्ट्रपति पद का प्रयोग करना चाहते थे?

इंदिरा गूंगी गुडिया नहीं

Sanjiva Reddy wanted to be the President at the age of 54

डा. जाकिर हुसैन की मृत्यु के बाद 1969 में राष्ट्रपति पद का चुनाव हुआ। तब इंदिरा गांधी देश की तीन साल प्रधानमंत्री रह चुकी थी। प्रणब दा के अनुसार तबतक पार्टी के दिग्गज नेता के कामराज, एस के पाटिल, अतुल्य घोष, एस निजलिंगप्पा और सभा के नेता के रूप में चर्चित नीलम संजीव रेड्डी के बीच झगड़े की जड़ बन गया।

इंदिरा जी ने कांग्रेस संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष पद के लिए बाबू जगजीवन राम का नाम प्रस्तावित किया तो सभा के नेताओं ने नीलम संजीव रेड्डी का नाम प्रस्तावित किया। इसमें 10 में से छह सदस्यों का मत पाकर संजीव रेड्डी पार्टी के राष्ट्रपति पद के अधिकृत उम्मीदवार हो गए। तब इंदिरा जी ने कांग्रेस संसदीय पार्टी के नेता के रूप में नीलम संजीव रेड्डी का नामांकन पत्र जमा कराया।

इंदिरा ने चली चाल

Sanjiva Reddy wanted to be the President at the age of 54
राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के अनुसार संजीव रेड्डी का नामांकन होने के बाद उपराष्ट्रपति और पूर्व श्रम नेता वीवी गिरी, जिन्हें कांग्रेस पार्टी द्वारा राष्ट्रपति पद के लिए नामित किए जाने की संभावना थी (पिछले दो उपराष्ट्रपतियों को राष्ट्रपति बनाया गया था), अपनी अनदेखी किए जाने से खिन्न हो गए।

उन्होंने निर्दल राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने का निर्णय लिया। सभा के साथ बढ़ते मत-भेदों के कारण इंदिरा जी ने वीवी गिरी को समर्थन देने का निर्णय लिया और निर्वाचक मंडल से विवेकपूर्ण मतदान की अपील की। नतीजा सामने आया, नीलम संजीव रेड्डी राष्ट्रपति पद का चुनाव हार गए। यह इंदिरा जी का मास्टर स्ट्रोक था।

प्रधानमंत्री को मिली शक्ति

इंदिरा जी का मानना था कि भारत जैसे संसदीय लोकतंत्र में प्रधानमंत्री की भूमिका सर्वोच्च शक्ति होनी चाहिए। इसे गहराई से वह महसूस भी करती थी। इसी विचार से 1976 में 42वां संविधान संशोधन के रूप में अनुच्छेद 74 में संशोधन पेश किया। इस संशोधन में स्पष्ट किया गया कि राष्ट्रपति अपने कामकाज के प्रयोग में मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार कार्य करने को बाध्य हैं। इस तरह से राष्ट्रपति के विवेकानुसार कार्य की गुंजाइश समाप्त हो गई।
 
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed