Samajwadi Party: क्या पार्टी मुखिया से अलग लाइन बना रहे हैं मौर्या! अखिलेश से अलग बयान देने के क्या हैं मायने?
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विस्तार
समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश में रामचरितमानस के अखंड रामायण पाठ का स्वागत करते हैं। जबकि उनकी ही पार्टी के नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने अपनी ही पार्टी के मुखिया की लाइन से अलग हटकर सरकार पर निशाना साध दिया है। गुरुवार को उन्होंने इस फैसले को महिला और शूद्र समाज को प्रताड़ित और अपमानित करने वाले लोगों को बढ़ावा देने का आरोप लगाकर निशाना साधा है। स्वामी प्रसाद मौर्या के इस बयान से एक बार फिर उत्तर प्रदेश की सियासत गरमा गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अखिलेश यादव के बयान से इतर स्वामी प्रसाद मौर्या का बयान अब तमाम तरह के सवाल खड़े कर रहा है।
कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दलों की सधी हुई टिप्पणी
उत्तर प्रदेश सरकार ने चैत्र नवरात्र की शुरुआत से प्रदेश के सभी मंदिरों में दुर्गा सप्तशती और रामनवमी पर रामचरितमानस का अखंड रामायण पाठ कराने का फैसला किया। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि रामचरितमानस और दुर्गा सप्तशती का पाठ करने वाले उत्तर प्रदेश के वोटर भाजपा के सिवाय अन्य दूसरी पार्टियों को भी वोट देते हैं। यही वजह रही कि समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव से लेकर कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दलों ने बहुत सधी हुई टिप्पणी इस पर दी। राजनीतिक जानकार हरिनंदन झा कहते हैं कि योगी सरकार के इस फैसले पर कड़ी टिप्पणी करने का मतलब एक विशेष समाज को सीधे तौर पर निशाने पर लेने जैसा है। जिसमें हर जाति समुदाय और धर्म के लोग शामिल हैं, जो रामचरितमानस और दुर्गा सप्तशती का पाठ करते आए हैं। यही वजह है कि अखिलेश यादव ने इस फैसले का स्वागत किया, लेकिन उन्होंने विरोध जताया तो उस बजट को लेकर। अखिलेश ने कहा कि इसका बजट इतना किया जाना चाहिए कि सभी धर्मों के लोगों के धार्मिक आयोजन भी हो सकें।
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अखिलेश यादव के बयान के बाद समाजवादी पार्टी के नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने एक बार फिर रामचरितमानस और उसकी चौपाई पर निशाना साध लिया। मौर्य ने ट्वीट करते हुए सुंदरकांड की उस चौपाई का जिक्र किया, जिसमें 'ढोल, गवार शुद्र पशु नारी' का जिक्र है। मौर्य ने इस चौपाई का उल्लेख करते हुए कहा कि यह उसी सुंदरकांड का हिस्सा है, जिसका सरकार ने पाठ कराने का निर्णय लिया है। उन्होंने ट्वीट के माध्यम से सरकार पर हमला बोला कि सरकार ने यह निर्णय महिलाओं को और शूद्र समाज को प्रताड़ित व अपमानित करने वाले तीन फीसदी लोगों को बढ़ावा देने और 97 फीसदी हिंदू समाज के भावनाओं को आहत करने जैसा बताया। स्वामी प्रसाद मौर्या के इस बयान के बाद अब सियासी गलियारों में चर्चा शुरू हो गई है कि क्या स्वामी प्रसाद अब अखिलेश यादव के बयान से अपना अलग रुख रखते हैं या उन्होंने पार्टी की लाइन को ही दरकिनार कर दिया है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अखिलेश यादव के बयान के बाद स्वामी प्रसाद मौर्या का यह बयान आना निश्चित तौर पर कई तरह के सवाल उठाता है।
यादव समाज करता है रामचरितमानस और दुर्गा सप्तशती का पाठ
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक स्वामी प्रसाद मौर्य ने अपनी उसी लाइन को एक बार फिर से आगे किया है, जिसे लेकर कुछ समय से वह विवादों में चल रहे हैं। उनका कहना है कि समाजवादी पार्टी को रामचरितमानस के विवादित बयान पर बहुत ज्यादा सियासी माइलेज मिलता हुआ नहीं दिख रहा था। यही वजह है कि पार्टी के कई बड़े नेताओं को स्वामी प्रसाद मौर्या का विवादित बयान सियासी तौर पर मुफीद नहीं लगा और अपनी आपत्तियां भी दर्ज की थीं। समाजवादी पार्टी से जुड़े एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि स्वामी प्रसाद मौर्य की ओर से रामचरितमानस पर दिए गए विवादित बयान पर उन्होंने पहले भी आपत्ति दर्ज की थी और गुरुवार को आए बयान से भी उन्हें आपत्ति है। उनका कहना है कि यादव समाज जिसकी अगुवाई अखिलेश यादव करते हैं, वह लगातार रामचरितमानस और दुर्गा सप्तशती का पाठ करता आया है। ऐसे में उनका तर्क है कि बसपा और भाजपा में सफर करके समाजवादी पार्टी में पहुंचे स्वामी प्रसाद मौर्य के इस विवादित बयान से उनकी पार्टी को भी नुकसान हो सकता है। समाजवादी पार्टी के उक्त नेता का कहना है कि बार-बार स्वामी प्रसाद मौर्य की ओर से रामचरितमानस पर विवादित बयान देने को लेकर पार्टी को अपना खुलकर स्टैंड क्लियर करना होगा।
सपा वोट बैंक में सियासी हलचल
वहीं समाजवादी पार्टी के नेताओं की ओर से दिए जाने वाले ऐसे बयानों के बाद रामचरितमानस और दुर्गा सप्तशती के पाठ को हर मंदिर में कराने का आदेश देकर भाजपा ने अपना स्पष्ट संदेश दिया है। बीते कुछ समय से उत्तर प्रदेश की राजनीति में रामचरितमानस और सुंदर कांड की चौपाईयों के साथ जातिगत समीकरणों को साधते हुए समाजवादी पार्टी के नेता बयानबाजी कर ही रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक जीडी शुक्ला कहते हैं कि शुरुआत में तो ऐसा लग रहा था कि समाजवादी पार्टी की इस लाइन से जातिगत समीकरणों को साधते हुए उसके वोट बैंक में कुछ सियासी हलचल हो सकती है। लेकिन जब समाजवादी पार्टी के ही नेताओं ने विरोध करना शुरू कर दिया, तो रामचरितमानस को लेकर शुरू हुए बड़े विवादों पर कुछ हद तक विराम लगना शुरू हो गया।
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उनका कहना है कि दरअसल समाजवादी पार्टी भी उन लोगों की राजनीति करती है, जिस तबके में रामचरितमानस की पूजा होती है। ऐसे में खुलकर विरोध करना पार्टी के लिए सियासी तौर पर मुश्किल हो सकता है। लेकिन फिर भी जिस तरीके से स्वामी प्रसाद मौर्य ने लगातार रामचरितमानस और उसकी चौपाइयों पर विरोध किया बल्कि उसे प्रतिबंधित करने की मांग की। संभव है कि पार्टी के एक तबके को कुछ सियासी माइलेज मिलने का अनुमान लग रहा होगा। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि मौर्य का गुरुवार को दिया गया बयान अखिलेश यादव के स्वागत वाले बयान के बाद आया है। इसलिए सियासी गलियारों में चर्चा इस बात की और बढ़ गई है कि कहीं ऐसा तो नहीं है स्वामी प्रसाद मौर्या समाजवादी पार्टी में अपनी अलग लाइन बनाकर आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हों।