Salman Rushdie Attacked: कट्टरपंथियों ने इन्हें भी बनाया अपना निशाना, तसलीमा नसरीन तो अब तक छुपकर रह रहीं
कट्टरपंथियों की ओर से रुश्दी पर हमले का यह पहला मामला नहीं है। कई और लोग इसी तरह के हमले झेल चुके हैं। इस्लाम की कथित आलोचना को लेकर अब भी कई लोग सुरक्षा के घेरे में हैं।
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बुकर पुरस्कार विजेता और द सैटेनिक वर्सेज के लेखक सलमान रुश्दी पर अमेरिका के न्यूयॉर्क में हमला हुआ है। सलमान रुश्दी कई सालों से जान से मारने की धमकियों का सामना कर रहे थे। हमला उस समय हुआ जब वह चौटाउक्वा संस्थान के एक कार्यक्रम में भाषण दे रहे थे। जब उनका परिचय कराया जा रहा था तो एक आदमी मंच की तफ दौड़ा और रुश्दी की गर्दन पर चाकू से वार कर दिया। कट्टरपंथियों की ओर से रुश्दी पर हमले का यह पहला मामला नहीं है। कई और लोग इसी तरह के हमले झेल चुके हैं। इस्लाम की कथित आलोचना को लेकर अब भी कई लोग सुरक्षा के घेरे में हैं और सार्वजनिक रूप से कम ही दिखाई देते हैं।
शार्ली एब्दो हत्याकांड
आज से सात साल पहले फ्रांस की पत्रिका शार्ली एब्दो पर आतंकियों ने हमला किया था। इस पत्रिका ने पैगंबर मोहम्मद का कार्टून छापा था, जिसके बाद आतंकियों ने उसके दफ्तर में घुसकर अचानक हमला कर दिया और 12 लोगों की जान ले ली थी और 11 घायल हुए थे। पत्रिका ने पैगंबर के कार्टून छापने को अभिव्यक्ति की आजादी से जोड़ा, जबकि कट्टरपंथियों ने इसका जमकर विरोध किया। 7 जनवरी 2015 की सुबह शार्ली एब्दो के दफ्तर में आम दिनों की तरह ही काम चल रहा था। सुबह 11:30 बजे के हमलावरों ने इमारत में प्रवेश किया और पत्रिका के दफ्तर में घुसकर अंधाधुंध फायरिंग करने लगे। इन्होंने पत्रिका के एडिटर स्टीफन चार्बोनियर, चार कार्टूनिस्ट, दो स्तंभकार, एक कॉपी एडिटर, एक केयरटेकर, एडिटर के अंगरक्षक, एक पुलिस अधिकारी और एक मेहमान की हत्या कर दी। इस घटना के बाद फ्रांस में कई दिनों तक लोग आतंक के खौफ में रहे थे।
तसलीमा नसरीन की जान को खतरा
बांग्लादेश की लेखिका तसलीमा नसरीन भी इन्हीं में से एक हैं। 1990 के दशक की शुरुआत में तसलीमा अपने निबंधों और उपन्यासों के कारण विश्व का ध्यान अपनी ओर खींचा। अयोध्या बाबरी विध्वंस के बाद तसलीमा को 1993 में उनके चर्चित उपन्यास ‘लज्जा’ के प्रकाशन के बाद बांग्लादेश से निष्कासित कर दिया गया था। इसकी कहानी एक हिंदू परिवार पर केंद्रित थी जो कट्टरपंथी हिंसा के बाद देश छोड़ने को मजबूर हो गया था। उनके कई और उपन्यास भी प्रकाशित हुए जिसमें उन्होंने इस्लाम को लेकर अपना नजरिया सामने रखा। लेकिन उनके लेखन ने एक वर्ग को नाराज कर दिया। उनके खिलाफ भी बांग्लादेश में फतवा जारी कर दिया गया। वह तब के भारत के कोलकाता में निर्वासित जीवन बिता रही हैं। उनपर भी हमले का प्रयास हो चुका है, हालांकि यह गंभीर हमला नहीं था। वह अब भी ट्विटर के जरिए अपना नजरिया सामने रखती हैं। रूश्दी पर हमले के बाद उन्होंने प्रतिक्रिया जताते हुए इसे बेहद भयावह करार दिया है।
नुपुर शर्मा को मौत की धमकियां
इसी तरह का मामला हालिया दिनों में भारत में भी सामने आया है जब भाजपा की पूर्व प्रवक्ता नुपुर शर्मा की एक टिप्पणी ने विवाद पैदा कर दिया। पैगंबर पर उनकी टिप्पणी ने देश के कई हिस्सों में उबाल ला दिया और लोग हिंसा पर उतर आए। नुपुर शर्मा को जान से मारने की धमकियां मिलने लगीं। इसके बाद उन्हें पुलिस सुरक्षा देनी पड़ी और वह किसी अज्ञात जगह में रह रही हैं। उनकी गिरफ्तारी की लगातार मांग उठती रही और कई राज्यों में उनके खिलाफ मामला दर्ज किया गया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की शरण ली और फिलहाल उन्हें गिरफ्तारी से राहत मिली हुई है। उनकी जान पर खतरा लगातार बना हुआ है। पाकिस्तान स्थित आतंकी गुट भी उन्हें मारने की योजनाएं बना रहे हैं। कुछ समय पहले ही पाकिस्तान से आए एक युवक को राजस्थान पुलिस ने गिरफ्तार किया, उसका मंसूबा नुपुर पर हमला करने का था। ऐसा ही खुलासा आज (12 अगस्त) भी हुआ जब एटीएस ने सहारनपुर से एक युवक नदीम को गिरफ्तार किया जो नुपुर पर हमले की योजना बना रहा था। नदीम का संबंध जैश-ए-मुहम्मद और तहरीक-ए-तालिबान से होने की जानकारी मिली है। बताया जा रहा है कि नदीम आतंकियों के संपर्क में था।
फ्रांस में शिक्षक की गला रेतकर हत्या
दो साल पहले फ्रांस में एक हमलावर ने हिस्ट्री टीचर की गला रेतकर हत्या कर दी थी। इतिहास शिक्षक पैटी पर आरोप था कि उसने कुछ दिन पहले क्लास में पैगंबर से जुड़ी कोई फोटो दिखाई थी। बताया जाता है कि हमलावर इसी बात से नाराज था। हमलावर ने काफी दूर तक टीचर का पीछा किया था। घटना पेरिस के पास कॉन्फ्लांस सेन्ट होनोरिन इलाके में हुई थी। यहां एक सेकंडरी स्कूल में कुछ दिन पहले इस टीचर ने इस्लाम से जुड़ा कोई चित्र दिखाया था। टीचर जब स्कूल से निकला तो आरोपी ने उसका पीछा किया। बाद में मौका पाकर उसका गला काट दिया। हमलावर 17 साल का युवक था जो मूल रूप से चेचन्या का रहने वाला था। पुलिस ने पीछा करते समय इसे गोली मार दी थी। मारे गए शिक्षक के मामले में देशभर के हजारों लोग सड़कों पर उतर आए थे और उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए विरोध प्रदर्शन किया। ऐसे ही एक प्रदर्शन में फ्रांस के प्रधानमंत्री मैक्रों भी शामिल हुए थे। इस हमले को लेकर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी फ्रांस को संदेश भेजकर एकजुटता दिखाई थी।
नौ अक्टूबर 2012 को पाकिस्तान में 15 साल की किशोरी मलाला यूसुफजई पर जानलेवा हमला हुआ था। तालिबान ने इस बेरहम हमले को अंजाम दिया था। पाकिस्तान में लड़कियों की शिक्षा की हिमायत करने वाली मलाला यूसुफजई पर तालिबान ने हमला किया और सिर में गोली मारकर उनकी जान लेने की कोशिश की। स्कूल से घर लौट रही मलाला पर हुआ यह हमला घातक था, लेकिन उनकी हिम्मत ने मौत को भी हरा दिया। ब्रिटेन में लंबे इलाज के बाद वह ठीक हुईं और एक बार फिर अपने अभियान में जुट गईं। इसी हौसले की वजह से सबसे कम उम्र में शांति का नोबेल पुरस्कार मिला। मलाला आतंकवादियों के बच्चों को भी शिक्षा देने की पक्षधर हैं ताकि वह शिक्षा और शांति का महत्व समझें। उत्तर-पश्चिमी पाकिस्तान की स्वात घाटी की रहने वाली मलाला ने 11 साल की उम्र में गुल मकाई नाम से बीबीसी उर्दू के लिए डायरी लिखना शुरू किया था। साल 2009 में डायरी लिखने की शुरुआत करने वाली मलाला स्वात इलाके में रह रहे बच्चों की मुश्किलें सामने लाती थीं। इसी बात से तालिबान उनसे खफा था। उस समय स्वात इलाके में तालिबान का खतरा बहुत ज्यादा था। 9 अक्तूबर को तालिबान ने मलाला पर हमला किया। हालत बिगड़ने पर इलाज के लिए ब्रिटेन में बर्मिंघम ले जाया गया। हमले के करीब छह साल बाद 31 मार्च 2018 को पहली बार पाकिस्तान में स्वात घाटी में अपने घर लौटीं।