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सबरीमाला मामला: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- व्यक्तिगत मान्यताओं से ऊपर है संविधान की मर्यादा

Fri, 17 Apr 2026 10:11 PM IST
राकेश कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: राकेश कुमार Updated Fri, 17 Apr 2026 10:11 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की पीठ ने सबरीमला और अन्य धार्मिक विवादों की सुनवाई के दौरान कहा है कि धार्मिक रीति-रिवाजों की न्यायिक जांच की जा सकती है। पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि न्यायिक अधिकारियों को अपनी व्यक्तिगत आस्था से ऊपर उठकर संवैधानिक मूल्यों को प्राथमिकता देनी चाहिए।

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सुप्रीम कोर्ट (फाइल तस्वीर) - फोटो : ANI

विस्तार

देश की सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि आस्था और परंपराएं न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर नहीं हैं। सबरीमला मंदिर सहित विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश और भेदभाव से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ ने बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने कहा कि जजों को किसी भी मामले पर फैसला सुनाते समय अपनी व्यक्तिगत धार्मिक मान्यताओं को किनारे रखकर केवल 'अंतरात्मा की स्वतंत्रता' और 'सांविधानिक ढांचे' का पालन करना चाहिए।
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न्यायालय का काम समाज में विभाजन को रोकना है- राजीव धवन
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान उन बुनियादी सवालों को कुरेदा, जो धर्म और संविधान के टकराव के बीच अक्सर खड़े होते हैं। वहीं, अधिवक्ता राजीव धवन ने दलील दी कि यह लड़ाई सिर्फ एक मंदिर या एक समुदाय की नहीं है, बल्कि यह उन तमाम विश्वासों की है जो संविधानिक दायरे में आते हैं। उन्होंने कहा कि न्यायालय का काम समाज में विभाजन को रोकना और सामंजस्य स्थापित करना है, बशर्ते धर्म पर उठाए जाने वाले सवाल सम्मानजनक हों।
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सुप्रीम कोर्ट ने क्या-क्या कहा? 
सुनवाई के दौरान जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने एक गंभीर बिंदु उठाया। उन्होंने सवाल किया कि क्या एक जज के तौर पर हम धर्म और अंतरात्मा को एक ही तराजू पर तौल सकते हैं? उनका मानना था कि भले ही धर्म एक व्यक्तिगत विषय हो, लेकिन जब न्यायिक फैसले की बारी आती है, तो एक जज को उस धार्मिक चेतना से ऊपर उठकर व्यापक सांविधानिक परिप्रेक्ष्य और संतुलन पर ध्यान देना चाहिए।

वहीं, जस्टिस बीवी नागरत्ना ने 'अंतरात्मा' और 'धर्म' के अंतर्संबंधों पर अधिवक्ता से तीखे सवाल किए। जवाब में राजीव धवन ने एक व्यावहारिक पक्ष रखते हुए कहा कि यदि हर धार्मिक अनुष्ठान को तर्क की कसौटी पर परखा जाने लगा, तो धर्म का अस्तित्व ही संकट में पड़ सकता है। 


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