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Sabarmati Ashram redevelopment: गुजरात हाईकोर्ट ने खारिज की निवासियों की याचिका; मुआवजे को लेकर की थी यह मांग
Mon, 08 Apr 2024 05:25 PM IST
शिव शरण शुक्ला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अहमदाबाद
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अहमदाबाद
Published by: शिव शरण शुक्ला
Updated Mon, 08 Apr 2024 05:25 PM IST
सार
साबरमती आश्रम के पुनर्विकास के लिए 1,200 करोड़ रुपये की परियोजना के तहत वहां लंबे समय से रह रहे 260 निवासियों से उनकी संपत्तियों का अधिग्रहण किया जा रहा है। इस परियोजना का उद्देश्य साबरमती आश्रम के आसपास के बुनियादी ढांचे को पुनर्निमित करना और गांधी जी को समर्पित एक विश्व स्तरीय स्मारक बनाना है।
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कोर्ट।
- फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
गुजरात में साबरमती आश्रम के नवीनीकरण से जुड़े प्रोजेक्ट में मुआवजे को लेकर एक मामले में सुनवाई करते हुए गुजरात हाईकोर्ट ने उसे खारिज कर दिया। यह याचिका साबरमती आश्रम में रहने वाले दो निवासियों जयेश वाघेला और करण सोनी ने दाखिल की थी। वे आश्रम पुनर्विकास परियोजना के लिए अपना घर खाली करने के लिए दिए जाने वाले मुआवजे से नाखुश थे। मुख्य न्यायाधीश सुनीता अग्रवाल की खंडपीठ ने उनकी याचिका खारिज करते समय बताया कि पहले ही एकल न्यायाधीश की पीठ इस मामले में सुनवाई से इनकार कर चुकी है।
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अपनी याचिका में दोनों निवासियों ने दावा किया था कि घर खाली करने को लेकर अधिकारियों ने उन्हें जो एमओयू पेश किया था, उसमें उन्हें अपने परिसर को खाली करने के लिए मुआवजे के रूप में 90 लाख रुपये नकद, एक फ्लैट या एक मकान के तीन विकल्प दिए गए थे। लेकिन जो चौथा विकल्प था जिसमें जमीन के साथ 25 लाख रुपये और दो सालों तक 12,000 रुपये प्रति माह किराया था, वह एमओयू पर हस्ताक्षर किए जाने पर उन्हें नहीं बताया गया था। ऐसे में याचिकाकर्ताओं ने समान मूल्य के फ्लैट या किराये के बदले नकद मुआवजा स्वीकार करने का फैसला किया था।
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इस मामले में अदालत ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ताओं ने 4 अक्टूबर, 2021 को घर खाली करने को लेकर एमओयू पर हस्ताक्षर किए थे। जिससे यह साफ होता है कि उन्होंने जानबूझकर 90 लाख रुपये नकद का विकल्प चुना था। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा की गई दलील रिकॉर्ड पर मौजूद किसी भी सबूत से प्रमाणित नहीं होती है। इसके साथ ही याचिकाकर्ताओं ने कोई ऐसा उदाहरण भी नहीं पेश किया है जहां आश्रम के 260 निवासियों में से किसी को ऐसा विकल्प दिया गया हो या उसका प्रयोग किया हो।
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अदालत ने आगे कहा कि उसे एकल न्यायाधीश के आदेश को चुनौती देने में कोई तथ्य नहीं मिला। इसमें कहा गया है कि ऐसा प्रतीत होता है कि याचिकाकर्ताओं ने 60 लाख रुपये प्राप्त करने के बाद दोबारा विचार किया और संपत्ति खाली करने के बजाय उस पर कब्जा बरकरार रखा और 30 लाख रुपये का शेष मुआवजा लेने से इनकार कर दिया। इस मामले 2024 में याचिका दायर करना एक सोंचे समझे प्लान के अलावा और कुछ नहीं है।
बता दें कि एमओयू पर हस्ताक्षर करने के तुरंत बाद लोगों को इस शर्त पर 60 लाख रुपये का भुगतान किया गया था कि उन्हें 30 दिनों के भीतर संपत्ति खाली करनी होगी।लेकिन याचिकाकर्ताओं ने इसका पालन नहीं किया और घरों को गिराने की कार्रवाई पर रोक लगाने की मांग करते हुए याचिका दायर की। जिन्हें 29 फरवरी, 2024 को हाईकोर्ट की एकल न्यायाधीश पीठ ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि याचिकाकर्ताओं ने एमओयू पर विधिवत हस्ताक्षर किए थे।
गौरतलब है कि साबरमती आश्रम के पुनर्विकास के लिए 1,200 करोड़ रुपये की परियोजना के तहत वहां लंबे समय से रह रहे 260 निवासियों से उनकी संपत्तियों का अधिग्रहण किया जा रहा है। इसके लिए उन्हें मुआवजे के रूप में तीन विकल्प दिए गए हैं। इस परियोजना का उद्देश्य साबरमती आश्रम के आसपास के बुनियादी ढांचे को पुनर्निमित करना और गांधी जी को समर्पित एक विश्व स्तरीय स्मारक बनाने की थी।