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PM Modi Degree Row: 'आरटीआई का मकसद जिज्ञासा संतुष्ट करना नहीं', पीएम डिग्री विवाद में डीयू की कोर्ट में दलील

Tue, 14 Jan 2025 08:01 AM IST
अभिषेक दीक्षित पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली Published by: अभिषेक दीक्षित Updated Tue, 14 Jan 2025 08:01 AM IST
सार

कार्यकर्ता नीरज की आरटीआई याचिका पर केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने 21 दिसंबर, 2016 को उन सभी छात्रों के रिकॉर्ड के निरीक्षण की अनुमति दी थी, जिन्होंने 1978 में बीए परीक्षा उत्तीर्ण की थी। हालांकि, 23 जनवरी, 2017 को उच्च न्यायालय ने केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) के आदेश पर रोक लगा दी थी।

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PM Modi Degree Row RTI Purpose Not To Satisfy Curiosity Delhi University Argument in PM Degree Controversy
दिल्ली हाईकोर्ट, Delhi High Court - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिग्री के बारे में जानकारी का खुलासा करने संबंधी केंद्रीय सूचना आयोग के आदेश को चुनौती देते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) ने दिल्ली हाईकोर्ट में अहम दलीलें दीं। डीयू ने सोमवार को कोर्ट से कहा कि आरटीआई का उद्देश्य किसी तीसरे पक्ष की जिज्ञासा को संतुष्ट करना नहीं है। जस्टिस सचिन दत्ता के सामने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि छात्रों की जानकारी किसी विश्वविद्यालय की ओर से जिम्मेदारी के साथ सुरक्षित रखी जाती है। ऐसे में कानून द्वारा इसे छूट दिए जाने के कारण इसे किसी अजनबी को नहीं बताया जा सकता।

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सॉलिसिटर जनरल की दलील
उन्होंने कहा, 'धारा 6 यह आदेश देती है कि जानकारी देनी होगी, यही उद्देश्य है, लेकिन आरटीआई अधिनियम किसी की जिज्ञासा को संतुष्ट करने के उद्देश्य से नहीं है।' मेहता ने दलील दी कि सार्वजनिक प्राधिकारों के कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही से असंबद्ध जानकारी के प्रकटीकरण का निर्देश देकर सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून का दुरुपयोग नहीं किया जा सकता। 
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क्या है मामला?
इससे पहले कार्यकर्ता नीरज की आरटीआई याचिका पर केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने 21 दिसंबर, 2016 को उन सभी छात्रों के रिकॉर्ड के निरीक्षण की अनुमति दी थी, जिन्होंने 1978 में बीए परीक्षा उत्तीर्ण की थी। उसी वर्ष प्रधानमंत्री मोदी ने भी यह परीक्षा पास की थी। याचिका में 1978 में परीक्षा देने वाले छात्रों का विवरण मांगा गया था। हालांकि, 23 जनवरी, 2017 को उच्च न्यायालय ने केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) के आदेश पर रोक लगा दी थी।
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सीआईसी के आदेश को स्थापित कानून के विपरीत बताया
मेहता ने सोमवार को कहा, 'मैं जा सकता हूं और अपने विश्वविद्यालय से कह सकता हूं कि अगर नियम अनुमति देते हैं तो मुझे मेरी डिग्री या मेरी मार्कशीट या मेरे कागजात दे दें, लेकिन (धारा के तहत प्रकटीकरण से छूट) 8 (1) (ई) तीसरे पक्ष पर लागू होती है।' उन्होंने सीआईसी के आदेश को स्थापित कानून के विपरीत बताया। मेहता ने कहा, 'वह वर्ष 1978 से जुड़ी हर किसी की जानकारी चाहते हैं। कोई आकर 1979 कह सकता है; कोई 1964। इस विश्वविद्यालय की स्थापना 1922 में हुई थी।'

'सभी विश्वविद्यालयों के लिए दूरगामी प्रतिकूल परिणाम होंगे'
डीयू ने कहा था कि सीआईसी के आदेश का याचिकाकर्ता और देश के सभी विश्वविद्यालयों के लिए दूरगामी प्रतिकूल परिणाम होंगे, जिनके पास करोड़ों छात्रों की डिग्री हैं। सीआईसी के आदेश को चुनौती देते हुए डीयू ने कहा कि आरटीआई प्राधिकरण का आदेश मनमाना और कानून की दृष्टि से अस्थिर है, क्योंकि जिस जानकारी का खुलासा करने की मांग की गई वह तीसरे पक्ष की व्यक्तिगत जानकारी है।


मामले की सुनवाई बाद में होगी
यह तर्क दिया गया कि किसी भी जरूरी आवश्यकता या अत्यधिक सार्वजनिक हित में ऐसी जानकारी के प्रकटीकरण की गारंटी देने वाला कोई निष्कर्ष नहीं दिया गया। डीयू ने कहा कि प्रधानमंत्री सहित 1978 में बीए की परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले सभी छात्रों का रिकॉर्ड मांगकर आरटीआई कानून का मजाक बना दिया गया है। मामले की सुनवाई बाद में जनवरी में होगी। 

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