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आरएसएस का पथ संचलन, भीड़ हिंसा पर बोले भागवत- कितना भी मतभेद हो कानून हाथ में न लें

Tue, 08 Oct 2019 08:05 AM IST
अनवर अंसारी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नागपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नागपुर Published by: अनवर अंसारी Updated Tue, 08 Oct 2019 08:05 AM IST
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संघ प्रमुख मोहन भागवत - फोटो : ANI

आज देश भर में विजयदशमी का पर्व मनाया जा रहा है। विजयदशमी के मौके पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की ओर से पथ संचलन का आयोजन किया जा रहा है। इस अवसर पर स्वयंसेवको को संबोधित करते हुए संघ प्रमुख मोहन भागवत ने मोदी सरकार की जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि यह मजबूत सरकार है जिसने कई साहसिक फैसले लिए हैं। अनुच्छेद 370 को खत्म करने के सरकार के फैसले का उन्होंने स्वागत किया। 

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आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की अगुवाई में निकलने वाली इस पथ संचलन में हिस्सा लेने के लिए केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और वीके सिंह पहुंचें। साथ ही महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी इस कार्यक्रम में हिस्सा लिया। आरएसएस द्वारा आयोजित पथ संचलन में मुख्य अतिथि के तौर पर एचसीएल के संस्थापक शिव नाडर भी पहुंचे।
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कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि भारत में प्रजातंत्र कोई विदेशों से आयातित नई बात नहीं है, बल्कि देश के जनमानस में सदियों से चलती आई परंपरा तथा स्वातंत्र्तोत्तर काल में प्राप्त हुआ अनुभव व प्रबोधन हैं। इनके परिणामस्वरूप प्रजातंत्र में रहना व प्रजातंत्र को सफलतापूर्वक चलाना यह समाज का मन बना गया है। 

संघ प्रमुख ने कहा कि नई सरकार को बढ़ी हुई संख्या में फिर से चुनकर लाकर समाज ने उनके पिछले कार्यों की सम्मति व आने वाले समय के लिए बहुत सारी अपेक्षाओं को व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि वर्तमान सरकार ने जन अपेक्षाओं को प्रत्यक्ष में साकार कर, जन भावनाओं का सम्मान करते हुए, साथ ही देशहित में उनकी इच्छाएं पूर्ण करने का साहस है। अनुच्छेद 370 को अप्रभावी बनाने के सरकार के काम से यह बात सिद्ध हुई है। 

भागवत ने अनुच्छेद 370 को लेकर कहा कि देश के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री सहित शासक दल तथा इस जन भावना का संसद में समर्थन करने वाले अन्य दल भी अभिनंदन के पात्र हैं। उन्होंने कहा कि यह कदम पूर्णता तब प्राप्त कर लेगा, जब 370 के प्रभाव में न हो सके न्याय कार्य सम्पन्न होंगे तथा उसी प्रभाव के कारण चलते आए अन्यायों की समाप्ति होगी। 

संघ प्रमुख ने देश के वैज्ञानिकों की तारीफ करते हुए कि हमारे वैज्ञानिकों ने अब तक चंद्रमा के अनछुए प्रदेश, उसेक दक्षिण धुव्र पर अपना चंद्रयान विक्रम उतारा। यद्यपि अपेक्षा के अनुरूप पूर्ण सफलता ना मिली, परंतु पहले ही प्रयास में इतना कुछ कर पाना यह भी सारी दुनिया को अबतक साध्य न हुई एक बात थी।

उन्होंने कहा कि हमारे देश की बौद्धिक प्रतिभा व वैज्ञानिकता का तथा संकल्प को परिश्रमपूर्वक पूर्ण करने की लगन का सम्मान हमारे वैज्ञानिकों के इस पराक्रम के कारण दुनिया में सर्वत्र बढ़ गया है। 

मोहन भागवत ने देश के देश को लेकर कहा कि सुखद वातावरण में अलसा कर हम अपनी सजगता व अपनी तत्परता को भुला दें। सब कुछ शासन पर छोड़ कर, निष्क्रिय होकर विलासिता व स्वार्थों में मग्न हो ऐसा समय नहीं है। जिस दिशा में हम लोगों ने चलना प्रारंभ किया है, वह अपना अंतिम लक्ष्य-परमवैभव संपन्न भारत-अभी दूर है।

उन्होंने कहा कि मार्ग के रोड़े, बाधाएं और हमें रोकने की इच्छा रखने वाली शक्तियों के कारनामे अभी समाप्त नहीं हुए हैं। हमारे सामने कुछ संकट हैं जिनका उपाय हमें करना है। कुछ प्रश्न है जिनके उत्तर हमें देने हैं, और कुछ समस्याएं हैं जिनका निदान कर हमें उन्हें सुलझाना है। 

भागवत ने देश की सुरक्षा को लेकर कहा कि सौभाग्य से हमारे देश के सुरक्षा सामर्थ्य की स्थिति, हमारे सेना की तैयारी, हमारे शासन की सुरक्षा नीति तथा हमारे अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कुशलता की स्थिति इस प्रकार की बनी है कि इस मामले में हम लोग सजग और आश्वस्त हैं। 

उन्होंने कहा कि हमारी स्थल सीमा तथा जल सीमाओं पर सुरक्षा सतर्कता पहले से अच्छी है। केवल स्थल सीमा पर रक्षक व चौकियों की संख्या व जल सीमापर (द्वीपों वाले टापुओं की) निगरानी अधिक बढ़ानी पड़ेगी। देश के अन्दर भी उग्रवादी हिंसा में कमी आई है। उग्रवादियों के आत्मसमर्पण की संख्या भी बढ़ी है।

संघ प्रमुख ने आगे कहा कि गत कुछ वर्षों में एक परिवर्तन भारत की सोच की दिशा में आया है। उसको न चाहने वाले व्यक्ति दुनिया में भी है और भारत में भी। भारत को बढ़ता हुआ देखना जिनके स्वार्थों के लिए भय पैदा करता है, ऐसी शक्तियां भी भारत को दृढ़ता व शक्ति से संपन्न होने नहीं देना चाहती।

उन्होंने कहा कि समाज के विभिन्न वर्गों को आपस में सद्भावना, संवाद तथा सहयोग बढ़ाने के प्रयास में प्रयासरत होना चाहिए। समाज के सभी वर्गों का सद्भाव, समरसता व सहयोग तथा कानून संविधान की मर्यादा में ही अपने मतों की अभिव्यक्ति यह आज की स्थिति में नितांत आवश्यक बात है।

मोहन भागवत ने कहा कि विविधता हमारे राष्ट्र की एक आंतरिक शक्ति है। लेकिन जाति, पंथ, भाषा और क्षेत्र की विविधता निहित स्वार्थों द्वारा एक दूसरे से अलग करने के लिए इस्तेमाल की जा रही है, जिससे उनमें मतभेद हो जाता है। उन्होंने कहा कि निहित स्वार्थ के भूखंडों की पहचान करने और उन्हें बौद्धिक और सामाजिक विमानों पर काउंटर करने के लिए सतर्क होना आवश्यक है। सतर्कता एक निरंतर आवश्यकता है।

भीड़ हिंसा को लेकर संघ प्रमुख ने कहा कि कानून और व्यवस्था की सीमा का उल्लंघन कर हिंसा की प्रवृत्ति समाज में परस्पर संबंधों को नष्ट कर अपना प्रताप दिखाती है। यह प्रवृत्ति हमारे देश की परंपरा नहीं है, न ही हमारे संविधान में यह बैठती है। कितना भी मतभेद हो, कानून और संविधान की मर्यादा के अंदर ही न्याय व्यवस्था में चलना पड़ेगा।

उन्होंने कहा कि समाज के विभिन्न वर्गों को आपस में सद्भावना, संवाद तथा सहयोग बढ़ाने के प्रयास में प्रयासरत होना चाहिए। समाज के सभी वर्गों का सद्भाव, समरसता व सहयोग तथा कानून संविधान की मर्यादा में ही अपने मतों की अभिव्यक्ति करनी चाहिए, यह आज की स्थिति में नितांत आवश्यक बात है।

उन्होंने भीड़ हिंसा पर आगे बोलते हुए कहा कि भीड़ हिंसा के रूप में सामाजिक हिंसा की कुछ घटनाओं की ब्रांडिंग वास्तव में हमारे देश, हिंदू समाज को बदनाम करने और कुछ समुदायों के बीच डर पैदा करने के लिए होती है। लिंचिंग भारत के लिए पराया है और वास्तव में इसके संदर्भ कहीं और हैं।

मोहन भागवत ने कहा कि कुछ बातों का निर्णय न्यायालय से ही होना पड़ता है। निर्णय कुछ भी हो आपस के सद्भाव को किसी भी बात से ठेस ना पहुंचे ऐसी वाणी और कृति सभी जिम्मेदार नागरिकों की होनी चाहिए। यह जिम्मेवारी किसी एक समूह की नहीं है ।यह सभी की जिम्मेवारी है। सभी ने उसका पालन करना चाहिए।

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