मोहन भागवत ने 'समाज के स्वभाव' पर आधारित कानून प्रणाली की वकालत की
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कानून में सुधार की जोरदार वकालत करते हुए कहा कि समाज के स्वभाव पर आधारित कानून प्रणाली विकसित किए जाने की आवश्यकता है।
हैदराबाद में रविवार को अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद के रजत जयंती समारोह के समापन अवसर पर बोलते हुए मोहन भागवत ने कहा, ‘हालांकि नया संविधान आजादी के बाद बनाया गया लेकिन इसमें विदेशी स्रोतों से कुछ पुराने कानूनों को भी ले लिया गया।’
उन्होंने कहा, ‘हमारे संस्थापकों ने भारतीय लोकाचार की समझ के आधार पर हमारा संविधान लिखा है। लेकिन इनमें से कई कानून जिनका हम आज भी इस्तेमाल कर रहे हैं, विदेशी स्रोतों पर आधारित हैं। ये कानून उनकी सोच के अनुसार बने थे। हमारी आजादी को सात दशक बीत चुके हैं। यह कुछ ऐसा है, जिस पर हमें जरूर विचार करना चाहिए।’
भागवत ने कहा, समूची प्रणाली समाज के स्वभाव पर आधारित होनी चाहिए। इस पर चर्चा और बहस जरूर की जानी चाहिए। व्यापक राष्ट्रीय बहस के बाद हमें एक आम सहमति पर पहुंचना होगा और लोगों के लिए एक ऐसी व्यवस्था उपलब्ध करानी होगी।
'हर कानून नैतिक रूप से सही हो यह जरूरी नहीं'
उन्होंने कहा अन्य राष्ट्रों का अपना न्यायशास्त्र है। लेकिन, क्या हमारा न्यायशास्त्र हमारे समाज की नैतिक मूल्यों की प्रणाली को दर्शाता है?
संघ प्रमुख ने क्रांतिकारी बिरसा मुंडा और 400 आदिवासियों के बारे में उल्लेख करते हुए बताया कि जब वे आजादी के लिए शस्त्र के साथ संघर्ष कर रहे थे तो अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया। सुनवाई के दौरान आदिवासी जो कह रहे थे, उन्हें दुभाषिए द्वारा गलत तरीके से पेश किया जा रहा था। कोर्ट में ट्रायल के दौरान न्यायाधीश जो कह रहा था और आरोपी जो कह रहे थे उनके बीच एक बड़ा अंतर था। यह अंतर आज भी अस्तित्व में है।
उन्होंने सवाल करते हुए कहा, हमारी न्याय प्रणाली कानूनी ढांचे के दायरे में है। लेकिन हर कानून नैतिक रूप से सही हो यह जरूरी नहीं है। उदाहरण के लिए, आपातकाल के दौरान, पुलिस को किसी को गोली मारने का अधिकार था और कोई भी सवाल नहीं पूछ सकता था। कानूनी तौर पर, पुलिस सही थी लेकिन नैतिक रूप से...?
'ऐसे समाज का निर्माण होना चाहिए जहां नैतिकता का एक स्तर हो'
समाज को चलाने में कानून और कानून के महत्व को रेखांकित करते हुए भागवत ने कहा कि एक ऐसे समाज का निर्माण होना चाहिए जहां नैतिकता का एक स्तर हो, जहां सामान्य रूप से समाज और कानून एक-दूसरे के साथ विवादों में नहीं हो।
उन्होंने कहा इसमें कोई संदेह नहीं है, कानून का प्रभावशील होना जरूरी है। हालांकि, यह पूरी तरह तभी प्रभावी होगा, जब जनता शिक्षित हो। यह शिक्षा केवल जानकारी से नहीं हो सकती, इसमें नैतिक-आधारित शिक्षा शामिल करनी होगी। जब तक हम भारतीय मूल्यों को अपने जीवन में ईमानदारी से नहीं अपनाएंगे, हम समाज को बदलने में सक्षम नहीं होंगे।
उन्होंने कहा हमारे समाज में, 'धर्म' को सर्वोच्च स्थान पर रखा गया है क्योंकि यह सत्य के खंभों पर आधारित है, पश्चिमी सभ्यता के विपरीत, जो मानते हैं कि राजा सर्वोच्च है और कोई गलती नहीं कर सकता।'