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सड़क हादसे में गंवाई जान तो 'भविष्य' की संभावनाएं देखकर मिलेगा मुआवजा
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 01 Nov 2017 10:35 AM IST
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सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाने या घायल होने वाले स्वरोजगार वाले या जिनकी तय आमदनी हो, उन्हें मुआवजे देते वक्त उसकी आमदनी के साथ-साथ फ्यूचर प्रोस्पेक्ट (भविष्य में कमाई की संभावनाओं) पर भी विचार किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को मुआवजा तय करने के इस सिद्धांत को हरी झंडी दे दी।
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चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा कि वैसे तो मौत का विकल्प पैसा नहीं हो सकता, लेकिन मुआवजे में एक समानता तो होनी ही चाहिए। पीठ ने कहा कि इन दोनों के बीच संतुलन होना जरूरी है। संविधान पीठ ने कहा कि मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत पीड़ित परिवारों को दी जाने वाली मुआवजे की राशि तय करने से पहले यह ध्यान रखना जरूरी है कि वह तार्किक और समानता के सिद्धांत के अनुरूप हो।
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पीठ ने कहा कि दुर्घटना में मारे गए व्यक्ति की आयु 40 से कम हो तो मृतक के वेतन का 50 फीसदी उसके फ्यूचर प्रोस्पेक्ट के तौर पर मिलना चाहिए। वहीं 40 से 50 वर्ष के बीच के मृतकों के लिए यह 30 फीसदी जबकि 50 से 60 वर्ष के बीच की आयु के मृतक के लिए यह 15 फीसदी होनी चाहिए।
संविधान पीठ ने कहा कि अगर मृतक स्वरोजगार वाला हो या जिसकी निर्धारित आमदनी (टैक्स को छोड़कर) हो और उसकी उम्र 40 वर्ष से कम हो तो उस वक्त जो वह कमा रहा था कि उसका 40 फीसदी अतिरिक्त मुआवजा मिलेगा। वहीं 40 से 50 वर्ष के बीच वाले लोगों के लिए यह 25 फीसदी और 50 से 60 वर्ष के बीच वाले मृतकों के लिए यह 10 फीसदी होगा।
संविधान पीठ ने यह फैसला यह देखते हुए दिया है कि पुराने कई आदेशों में सड़क दुर्घटना पीड़ितों को मिलने वाले मुआवजों में ‘जोड़-घटाव’ अलग-अलग रहा है। साथ ही पीठ ने संपदा की क्षति के मद में 15 हजार रुपये, कंपनी के नुकसान के मद में 40 हजार रुपये और अंतिम संस्कार के लिए 15 हजार रुपये देने के लिए कहा है। हर तीन वर्ष में इन रकमों में 10 फीसदी का इजाफा होगा। पीठ ने कहा कि अदालत और ट्रिब्यूनल को मुआवजे की रकम तय करते वक्त व्यावहारिक रवैया अपनाना चाहिए जो वास्तविकता के करीब हो।