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गरीब सवर्णों को आरक्षण महागठबंधन का जवाब, बनायेंगे जीत का रिकॉर्ड : यूपी कैबिनेट मंत्री

Tue, 08 Jan 2019 03:15 PM IST
आसिम खान अमित शर्मा, नई दिल्ली
अमित शर्मा, नई दिल्ली Published by: आसिम खान Updated Tue, 08 Jan 2019 03:15 PM IST
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reservation of upper castes is answer to the SP-BSP alliance said up cabinet minister Brajesh Pathak
मायावती व अखिलेश यादव
गरीब सवर्णों को नौकरी और शिक्षा में दस फीसदी आरक्षण देने का वायदा कर मोदी सरकार ने एक झटके में ही विपक्ष की राजनीति को बैकफुट पर खड़ा होने को मजबूर कर दिया है। इस घोषणा का चारों तरफ जिस तरह से स्वागत हुआ है, उससे साफ़ हो गया है कि अगले आम चुनाव में इसका व्यापक असर हो सकता है। पिछले दिनों संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में सवर्ण वोटों की ताकत को देखते हुए कोई भी राजनीतिक दल इसकी मुख़ालफ़त नहीं कर पाया। जाहिर है कि इससे भाजपा की बांछें खिली हुई हैं। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने पूरे देश में जिन सीटों पर जीत हासिल की थी, उनमें नब्बे फीसदी से अधिक सीटों पर सामान्य वर्ग के लोग प्रभावशाली भूमिका में हैं। यूपी सरकार के कैबिनेट मंत्री ब्रिजेश पाठक ने अमर उजाला से कहा कि यह सपा-बसपा के गठबंधन का सटीक जवाब है। 
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उन्होंने इस बार लोकसभा चुनाव में पिछले बार से अधिक सीटें जीतने का दावा भी कर दिया। कभी मायावती की ब्राह्मणवादी राजनीति के महत्त्वपूर्ण स्तंभ रहे पाठक के मुताबिक़ सपा-बसपा ने गठबंधन कर उत्तर प्रदेश के जातीय गणित के सहारे उनके सामने एक मुश्किल चुनौती जरुर खड़ी कर दी थी, लेकिन इस फैसले ने उनकी खेल में मजबूत वापसी कर दी है। माना जा रहा है कि इस फैसले का असर सिर्फ यूपी तक सीमित नहीं रहेगा। गुजरात में पटेलों के आरक्षण का मुद्दा हो या महाराष्ट्र में मराठों के आरक्षण की मांग, मध्यप्रदेश में सवर्णों की भाजपा से नाराजगी हो या राजस्थान में गुर्जर और जाटों के आरक्षण की मांग, एक अकेला यह दांव भाजपा के कोर वोटरों को उससे जोड़े रहने के साथ ही दूसरे राजनीतिक दलों के वोटों में भी सेंध लगाएगा।
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ये है भाजपा का गणित

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार में स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह ने अमर उजाला से कहा कि पिछले विधानसभा चुनाव का परिणाम हो या लोकसभा का, सपा और बसपा दोनों के वोटों को मिला लेने के बाद भी उनका मत फीसद अकेले भाजपा से पीछे या लगभग बराबर ही है। सिद्धार्थनाथ सिंह के मुताबिक़ इस बार जब आधी सीटों पर सपा के उम्मीदवार लड़ेंगे तो बाकी की आधी सीटों पर सपा के कार्यकर्ता बसपा को ही समर्थन देंगे, यह संभव नहीं है। इसी तरह बसपा के जिन लोगों ने लंबे समय तक किसी एक सीट के लिए तैयारी की है, वे पूरी तरह सपा के उम्मीदवारों का समर्थन नहीं करेंगे। उनके मुताबिक़ इसी गलियारे से भाजपा की जीत तय होगी। भाजपा नेता के मुताबिक़ उनकी पार्टी यह मानकर चल रही है कि एक दिन एक पक्ष में भाजपा और विपक्ष में सभी अन्य पार्टियां होंगी। इसलिए वे समाज के ज्यादा से ज्यादा वर्गों को अपने साथ जोड़कर अपना मत फीसद 51 से ऊपर ले जाना चाहते हैं जो किसी भी स्थिति में अजेय साबित हो।
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ब्रजेश पाठक के मुताबिक़ उत्तर प्रदेश में सवर्ण समाज की लगभग 16 फीसदी की भागीदारी है। क्षत्रिय समाज हर सीट पर पांच से छह फीसदी की उपस्थिति रखता है। वैश्य समाज भी लगभग तीन फीसदी की मजबूत भागीदारी रखता है। आज वे ओबीसी वोटों के सबसे बड़े दावेदार हैं क्योंकि उनकी पार्टी ने ओबीसी समाज को सरकार और संगठन में बड़ी हिस्सेदारी दी है। उन्होंने कहा कि गैर जाटव समाज भी उनके साथ तेजी से जुड़ा है जिनके सहारे वे बड़ी जीत की उम्मीद रखते हैं। 


क्या था पिछले चुनाव का गणित

लोकसभा चुनाव 2014 में भाजपा और अपना दल ने 42.63 प्रतिशत वोटों के साथ 73 सीटों पर जीत हासिल की थी। जबकि इसी चुनाव में सपा को 22.35 और बसपा को 19.77 फीसदी वोट मिले थे। सपा और बसपा के वोट प्रतिशत मिलकर 42.12 फीसदी होता है जो भाजपा से कम है। हालांकि उत्तर प्रदेश की विधानसभा 2017 के चुनाव में भाजपा को 41.35 फीसदी वोट मिले थे, जबकि सपा को 28.07 और बसपा को 22.23 फिसद वोट मिला था। सपा-बसपा को मिलाकर यह पचास फीसद से अधिक बैठता है। 
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