Republic Day 2019: इस डॉक्टर दंपति का त्याग जान लेंगे तो सलाम के लिए उठ जाएंगे हाथ
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रविंद्र कोल्हे नागपुर मेडिकल कालेज से एमबीबीएस कर रहे थे। शेगांव में हर कोई रविंद्र की पढ़ाई खत्म होने का इंतजार कर रहा था। वजह, रविंद्र अपने खानदान के पहले डॉक्टर जो बनने वाले थे। परिजनों में जश्न जैसा माहौल था। पर, ये कौन जानता था, अपना डॉक्टर पैसे के पीछे भागने की बजाए एक अलग ही राह चुनेगा। हुआ भी कुछ ऐसा ही। पत्नी भी उनकी सोच वाली मिल गई। डॉक्टर दंपति ने दुनिया के तमाम ऐशो-आराम छोड़कर महाराष्ट्र के अति पिछड़े कहे जाने वाले मेलघाट क्षेत्र के गांव बैरागढ़ को अपने जीने का मकसद बना लिया।
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रविंद्र कोल्हे नागपुर मेडिकल कालेज से एमबीबीएस कर रहे थे। शेगांव में हर कोई रविंद्र की पढ़ाई खत्म होने का इंतजार कर रहा था। वजह, रविंद्र अपने खानदान के पहले डॉक्टर जो बनने वाले थे। परिजनों में जश्न जैसा माहौल था। पर, ये कौन जानता था, अपना डॉक्टर पैसे के पीछे भागने की बजाए एक अलग ही राह चुनेगा। हुआ भी कुछ ऐसा ही। पत्नी भी उनकी सोच वाली मिल गई। डॉक्टर दंपति ने दुनिया के तमाम ऐशो-आराम छोड़कर महाराष्ट्र के अति पिछड़े कहे जाने वाले मेलघाट क्षेत्र के गांव बैरागढ़ को अपने जीने का मकसद बना लिया।
एक ऐसा गांव जहां पर बुनियादी सुविधाएं न के बराबर थी। बिजली का तो नाम ही नहीं था। अस्सी के दशक में स्वास्थ्य सेवाएं ऐसी थीं कि मरीज बीच राह में दम तोड़ दे। मतलब, निकटवर्ती अस्पताल हरिसाल (छोटा सा कस्बा) में था, जो बैरागढ़ से 40 किलोमीटर दूर था। खास बात, वहां तक पैदल ही जाना पड़ता था।
डॉ. रविंद्र और डॉ. स्मिता कोल्हे ने मेलघाट के लोगों की जिंदगी बदल दी। इस दंपति ने इलाके की स्वास्थ्य सुविधाओं को एक नया आयाम दे दिया। इतना ही नहीं, लोगों को बिजली, सड़क और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भी उपलब्ध कराए हैं। गणतंत्र दिवस पर इस दंपति को पद्मश्री देने की घोषणा की गई।
डेविड वर्नर की पुस्तक के पहले पन्ने पर छपी तस्वीर ने जीवन का मकसद तय कर दिया
डॉ. कोल्हे ने जीवन का मतलब समझने के लिए महात्मा गांधी और विनोबा भावे की कई पुस्तकें पढ़ी थीं। इससे उनकी जीवन के प्रति सोच ही बदल गई। डॉ. कोल्हे ने तय किया कि वे डॉक्टरी की पढ़ाई का इस्तेमाल पैसे कमाने के लिए नहीं करेंगे, बल्कि जरूरतमंदों की मदद के लिए करेंगे। अब उनके सामने बस एक ही सवाल था कि शुरूआत कहां से की जाए। डॉ. कोल्हे ने डेविड वर्नर की पुस्तक के पहले पन्ने पर चार लोगों की तस्वीर देखी।
इसमें चार आदमी एक मरीज को अपने कंधे पर उठाये चले जा रहे थे। बस फिर क्या था, डॉ. कोल्हे को अपनी राह मिल गई। उन्होंने तय कर लिया कि वे अपनी सेवाएं ऐसी जगह पर देंगे, जहां दूर-दूर तक कोई स्वास्थ्य सुविधा नहीं है। इसके लिए उन्होंने बैरागढ़ का चयन किया। यह महराष्ट्र के मेलघाट में पड़ता है। मेलघाट की यात्रा अमरावती से शुरू होकर हरिसाल पर जाकर खत्म होती थी। यहां से बैरागढ़ तक पहुंचने के लिए 40 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था।
लगा कि डॉक्टरी की पढ़ाई अधूरी है, एमडी करने के लिए शहर चले गए
किसी भी सुदूर इलाके में काम करने वाले डॉक्टर को तीने चीजें आनी चाहिएं।पहला, बिना सोनोग्राफी या खून चढ़ाने की सुविधा के प्रसव कराना, दूसरा बिना एक्स-रे के निमोनिया की पहचान करना और तीसरा, डायरिया का इलाज। डॉ. कोल्हे को कहां चैन था। वे तुरंत मुंबई पहुंच गए। वहां पर उन्होंने छह माह तक ये तीन विद्याएं सीखीं। इसके बाद वे बैरागढ़ के लिए वापस चल दिए।
एक बार उनके पास ऐसा केस आया, जिसमें किसी व्यक्ति का बाजू विस्फोट में उड़ गया था। उन्हें सर्जरी का ज्ञान नहीं था। इसे लेकर वे बहुत दुखी हुए। चूंकि वे उस व्यक्ति का इलाज नहीं कर सके थे, इसलिए उनका मन व्यथित हो गया। बतौर डॉ. कोल्हे, मुझे लगा कि ऐसे मरीजों को बचाने के लिए मुझे और पढ़ने की जरूरत है। इसके बाद 1987 में वे एमडी करने के लिए एक बार फिर शहर चल दिए।
शादी के लिए रखी ये शर्तें
दूसरी, वो पांच रुपये वाली शादी के लिए हां भरे (उन दिनों कोर्ट मेरिज पांच रुपये में होती थी)। तीसरी, वो चार सौ रुपये में पूरे माह गुजार कर सके। वजह, डॉ. कोल्हे हर मरीज से एक रुपया लेते थे और एक माह में चार सौ मरीज देखते थे। चौथी और आखिरी शर्त, अपने लिए तो नहीं, पर कभी दूसरों के भले के लिए भीख भी मांगना पड़े तो वो उसके लिए तैयार रहे।
करीब सौ लड़कियों ने उन्हें ठुकरा दिया। आखिरकार नागपुर की एक जानी-मानी डॉक्टर स्मिता ने डॉ. कोल्हे की सभी शर्तों को मानकर उनका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। इस तरह मेलघाट को उसका दूसरा डॉक्टर मिल गया।
डॉक्टर स्मिता का यह त्याग भला कोई भुला सकता है?
करीब दो साल तक आदिवासी इलाके में रहने के बाद लोग उन पर भरोसा करने लगे थे। डॉ. स्मिता को लेकर थोड़ी दिक्कत हुई। वजह, उन्होंने वहां औरतों के हक के लिए लड़ना शुरु कर दिया। इसे लोग स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। समय बीतता गया और वह दिन भी आया जब डॉ. स्मिता ने सभी गांव वालों का विश्वास व प्यार जीत लिया। डॉ. स्मिता जब पहली बार मां बनने वाली थी, तब डॉ. कोल्हे ने निश्चय किया कि वो उनका प्रसव खुद करेंगे। जैसे वे गांव की दूसरी औरतों का करते थे। बच्चा हो गया, लेकिन उसे मैनिजाइटिस, निमोनिया और सेप्टिसीमिया जैसी बीमारियों ने घेर लिया।
गांव वालों ने सुझाव दिया कि मां-बच्चे को अकोला के बड़े अस्पताल में भर्ती करा दिया जाए। डॉ. कोल्हे सोच रहे थे कि स्मिता ने शहर जाने का फैसला किया तो वे गांव वालों को कभी अपनी शक्ल नहीं दिखाएंगे। हालांकि उन्होंने फिर भी यह फैसला स्मिता पर छोड़ दिया। डॉ. स्मिता भी डॉ. कोल्हे का मन भांप चुकी थीं। उन्होंने फैसला किया कि वे गांव के दूसरे बच्चों की तरह अपना इलाज यहीं पर कराएंगी। इसके बाद लोगों की नजरों में उनकी इज्जत और बढ़ गई।
डॉ रविंद्र कोल्हे के मुताबिक, सब जानते थे कि मेलघाट के बच्चे कुपोषण से मर रहे हैं। निमोनिया, मलेरिया और सांप के काटने से भी बच्चों की मौत हो रही थी। शोधकर्ता यह तो जानने में सफल हो गए कि ये मौतें किस वजह से हो रही हैं, लेकिन असल वजह कोई नहीं जान पाया। वह थी गरीबी। निमोनिया का कारण, सर्दियों में तन ढकने के लिए कपड़े नहीं थे। कुपोषण की वजह, उनके पास पैसों की कमी थी।
जब खेती का मौसम नहीं होता तो लोगों को खाने के लाले पड़े जाते थे। डॉ. दंपति ने इन समस्याओं से लोगों को निजात दिला दी। गांव वालों को जब स्वास्थ्य सुधार दिया तो भोले-भाले लोगों को उनमें भगवान नजर आने लगा। उन्हें लगने लगा कि डॉ. साहब के पास हर बीमारी का इलाज है। वे न केवल फसल, पेड़-पौधों, बल्कि अपने मवेशियों को भी इलाज के लिए लाने लगे।
चूंकि कोई दूसरा डॉक्टर नहीं था, इसलिए डॉ. कोल्हे ने अपने एक पशु चिकित्सक मित्र की मदद से जानवरों की संरचना के बारे में जाना। बाद में उन्होंने पंजाब राव कृषि विद्यापीठ, अकोला से कृषि की भी पढ़ाई शुरु कर दी। फंगस न लगने वाला बीज बना दिया। डॉ. कोल्हे का साफ कहना था, प्रगति के लिए खेती बहुत जरूरी है। युवाओं के खेती में आने से ही प्रगति होगी। यह संदेश लोगों की नजरों में उस वक्त और ज्यादा साफ हो गया, जब डॉ. कोल्हे का बड़ा बेटा रोहित किसान बन गया।
रोहित कोल्हे का कहना है कि वह आज मिश्रित खेती कर इतने पैसा कमा लेता है, जितना एक आईआईटियन किसी प्राइवेट कंपनी की जॉब से कमाता है। डॉ. दंपति ने पीडीएस (सार्वजनिक वितरण प्रणाली) को भी अपने हाथ में ले लिया है। इसका फायदा यह हुआ कि बरसात के सीजन में जब खेती का काम नहीं होता तो उस समय भी हर किसी को भोजन मिल जाता है। इस वजह से मेलघाट में कई सालों से अब कोई किसान आत्महत्या नहीं करता।
कोल्हे दंपति कहते हैं, "अगर हम किसी को एक दिन का खाना देते हैं तो उसकी बस एक ही दिन की भूख मिटती है, पर अगर हम उसे कमाना सिखाते हैं तो हम उसे जिंदगी भर का खाना दे देते हैं। हम यही करना चाहते थे। उस वक्त लोक निर्माण विभाग के मंत्री रहे नितिन गडकरी, जो स्मिता के मानस भाई थे, कोल्हे दंपति से मिलने उनके घर आए। उन्होंने जब डॉ. कोल्हे का छपरैल वाला घर और रहने का ढंग देखा तो वे चौंक गए।
मंत्री जी ने उनके लिए घर बनाने की इच्छा जाहिर की। स्मिता ने घर की बजाए अच्छी सड़क बनाने के लिए कहा। मंत्री जी ने अपना वादा निभाते हुए सड़क बनवा दी। आज मेलघाट के 70 फीसदी गांवों में सड़क बन चुकी है। बता दें कि मेलघाट महाराष्ट्र के सबसे पिछड़े हिस्सों में से एक है। यहां तकरीबन तीन सौ गांव हैं। करीब साढ़े तीन सौ गैर सरकारी संस्थाएं काम कर रही हैं।
इस डॉक्टर दंपति की लंबी लड़ाई ने अब अपना फल दिखा दिया है। मेलघाट में अच्छी सड़क हैं, बिजली है और 12 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र खुल गए हैं। डॉ. कोल्हे अब किसी से पैसे नहीं लेते हैं। वो लोगों को सरकारी अस्पताल ले जाकर यथासंभव बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं दिलाते हैं।