Republic Day 2019: देश के अधिकतर लोग चाहते हैं बेटी, फिर भी कई मायनों में वो पीछे क्यों?
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- लिंगानुपात में हुआ है सुधार।
- फिर भी कई मामलों में बेटियां पीछे।
- श्रम बल में भी कम है महिलाओं की संख्या।
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विस्तार
देशभर में गणतंत्र दिवस की तैयारियां चल रही हैं। हर कोई देशभक्ति के रंग में डूबा हुआ नजर आ रहा है। हमारे देश में बेटा हो या बेटी दोनों को बराबरी के अधिकार दिलाने के लिए हर तरह की पहल की जा रही है। बेटियों की सदियों से चली आ रही खराब स्थिति को दूर करने के लिए सरकार ने बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, सुकन्या जैसी कई योजनाओं की शुरुआत भी की है। लेकिन फिर भी कई मायनों में बेटियां आज भी अच्छी स्थिति में नहीं है।
21 से 26 जनवरी तक पूरा सप्ताह बेटियों के नाम पर रखा गया है। बेटियों को लेकर एक अच्छी खबर नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस) की रिपोर्ट में आई है। रिपोर्ट के मुताबिक देश के करीब 80 फीसदी लोग घर में कम से कम एक बेटी चाहते हैं। एनएफएचएस के सर्वे में पता चला है कि जो लोग बेटियों की चाह रखते हैं उनमें ग्रामीण और गैर पढ़ेलिखे लोग अधिक हैं। रिपोर्ट के अनुसार 83 फीसदी अनपढ़ पुरुष और 74 फीसदी 12वीं पास पुरुष घर में एक बेटी चाहते हैं। वहीं ग्रामीण पुरुषों में ये आंकड़ा 80 फीसदी और शहरी पुरुषों में ये आंकड़ा 75 फीसदी है।
शहरी की तुलना में अधिक ग्रामीण चाहते हैं बेटी
इस सर्वे में 15 से 49 साल की 79 फीसदी महिलाओं और 15-54 साल के करीब 78 फीसदी पुरुषों ने कहा है कि घर में एक बेटी होनी चाहिए। सबसे अच्छी बात ये है कि जो लोग घर में एक बेटी की चाह रखते हैं, उनमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, आर्थिक रूप से पिछड़े लोग और मुस्लिम लोगों की संख्या अधिक है। रिपोर्ट में सबसे अच्छी बात ये है कि जो लोग बेटी चाहते हैं, उनमें शहरी और पढ़ेलिखे लोगों की तुलना में ग्रामीण लोगों की संख्या अधिक है।
अशिक्षित महिलाएं चाहती हैं बेटियां
अगर महिलाओं की बात करें तो रिपोर्ट के नतीजे कहते हैं कि करीब 85 फीसदी अशिक्षित महिलाएं ऐसी हैं जो बेटियों की चाह रखती हैं। वहीं अगर 12वीं पास महिलाओं की बात करें, तो 72 फीसदी महिलाएं ऐसी हैं जो चाहती हैं कि घर में एक बेटी हो। रिपोर्ट में कहा गया है कि बेटी की चाह रखने वालों की संख्या पहले के मुकाबले अब अधिक बढ़ी है।
लिंगानुपात में आया है सुधार
सरकार द्वारा बालिकाओं के लिए शुरू की गई कई योजनाओं से सुधार हुआ है। जिसमें से एक है पोषण अभियान। जिसका सीधा असर लिंगानुपात और जन्म एवं जीवन प्रत्याशा दर पर पड़ा है। इस मामले में बीते पांच सालों में अधिक सुधार आया है। जीवन प्रत्याशा दर में भी वृद्धि हुई है। पोषण अभियान की बात करें तो इसके तहत जरूरी पोषक तत्व मुहैया कराए जाते हैं। इसके अलावा देश को 2019 तक खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) कराने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर चलाए जा रहे अभियानों से भी काफी सुधार हुआ है। अखिल भारतीय स्तर पर देखा जाए तो जन्म के समय लिंग अनुपात में सुधार देखा गया है।
यहां अब भी बाकी है निराशा
यहां अब भी निराशा है बाकी?
केंद्र सरकार के आंकड़ों और सामाजिक विज्ञापनों में अकसर दिखाया जाता है कि बीते पांच सालों में लिंगानुपात में सुधार आया है। इसके अलावा बेटी की चाह रखने वालों की संख्या में भी इजाफा हुआ है। लेकिन बावजूद इसके अभी भी कई क्षेत्र ऐसे हैं, जहां महिलाओं को लेकर अभी भी सुधार किए जाने बाकी हैं। इसी से संबंधित एक रिपोर्ट द इनफेंट एंड चाइल्ड मॉर्टेलिटी इंडिया ने जारी की है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 7.6 करोड़ भारतीयों को पीने के लिए स्वच्छ पानी उपलब्ध नहीं है।
वहीं 72 फीसदी नवजात और 52 फीसदी शादीशुदा महिलाओं में रक्त की कमी है और वह एनीमिया से ग्रसित हैं। ये भी एक वजह है कि देश में बाल मृत्युदर का आंकड़ा तो घट रहा है लेकिन वैश्विक तौर पर अभी भी भारत में ये आंकड़ा अधिक बना हुआ है। इसके अलावा कई अलग-अलग तरह की रिपोर्ट में ये बात भी सामने आई है कि कई क्षेत्रों में बालकों को मिल रही सुख सुविधाओं में बालिकाएं आज भी पीछे हैं।
शिक्षा के क्षेत्र में अभी भी पीछे हैं हमारी बेटियां
बालिकाओं की शिक्षा को प्रोत्साहन देने के लिए सरकार द्वारा शुरू की गई सुकन्या योजना के दौर में भी बालिकाएं शिक्षा पाने के मामले में अधिक सहज नहीं हैं। देशभर में शिक्षित लोगों में 74 फीसदी महिलाएं हैं, जबकि 88 फीसदी पुरुष हैं। इसके अलावा स्कूल जाने वाले बच्चों में भी बालिकाओं का आंकड़ा कम बन हुआ है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि स्कूलों में बालिकाओं को जरूरी सुविधाएं नहीं मिल पाती हैं। वह स्कूल तो जाना चाहती हैं लेकिन फिर भी नहीं जा पातीं।
हाल ही में आए आंकड़े बताते हैं कि भारत के 55.7 फीसदी स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय नहीं हैं। भारत में प्राथमिक स्कूल छोड़ने वाले बच्चों का कुल आंकड़ा 4.7 फीसदी है। जिसमें लड़कियों की संख्या अधिक है। वहीं अगर श्रम बल की बात करें तो इसमें महिलाओं का आंकड़ा 26 फीसदी और पुरुषों का आंकड़ा 53 फीसदी है। औसत वेतन के मामले में भी पुरुष महिलाओं से आगे हैं। इसमें औसत वेतन पाने के मामले में पुरुषों को 289 रुपये और महिलाओं को 208 रुपये मिलते हैं।
महिलाओं के शीर्ष पद पर भी भारत पीछे
एक वैश्विक रिपोर्ट में पता चला है कि जब भी महिलाओं के शीर्ष पदों पर रहने की बात की जाती है तो इस मामले में भारत तीसरा सबसे पिछड़ा हुआ देश है। यहां महिलाओं की भागीदारी केवल 34 फीसदी है।
स्वास्थ्य के मामले में हुआ है सुधार
रिपोर्ट में स्वास्थ्य को लेकर सकारात्मक आंकड़े सामने आए हैं। सरकार की पोषण योजना और खुले में शौच से मुक्त करने की राष्ट्रीय प्रतिबद्धता से इसमें काफी सुधार हुआ है। रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि कई मामलों में बालिकाओं को लेकर सुधार तो हुआ है लेकिन उनके साथ होने वाले हिंसक अपराधों में बहुत अधिक गिरावट देखने को नहीं मिली है।