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Hindu Population: जनसंख्या कानून लागू करने की नींव बनेगी यह रिपोर्ट! हिंदू-मुस्लिम आबादी पर ऐसे बन रहे समीकरण?

Thu, 09 May 2024 04:39 PM IST
Ashish Tiwari आशीष तिवारी
Updated Thu, 09 May 2024 04:39 PM IST
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सार
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्ययन के मुताबिक 1950 में भारत की जनसंख्या में हिंदुओं की हिस्सेदारी 84 फीसदी थी, जो 2015 में घटकर 78 फीसदी हो गई है। इस दौरान मुसलमानों की हिस्सेदारी 9.84 फीसदी से बढ़कर 14.09 फीसदी हो गई।
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report will become the foundation for implementing population law! such equations on Hindu-Muslim population
रिपोर्ट - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की रिपोर्ट बताती है कि 65 साल में हिंदुओं की आबादी में गिरावट हई है। जबकि मुसलमानों की आबादी में बढ़ोतरी हुई है। आर्थिक सलाहकार परिषद की रिपोर्ट के बाद देश में सियासत गर्म होने लगी है। सियासी गलियारों से लेकर हिंदुओं की पैरोकारी करने वालों के गलियारों में कहा यह जाने लगा है कि अगर हिंदुओं की आबादी कम हो रही है, तो जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाए जाने की तैयारी की जानी चाहिए। 



वहीं, राजनीतिक जानकारों के मुताबिक अब बचे हुए चुनावों में यह मुद्दा बड़े जोर-शोर से उठेगा। इसके सियासी नफा-नुकसान का आकलन राजनीतिक गलियारों में किया जाने लगा है। जबकि कुछ लोगों ने ऐसी रिपोर्ट पर सवालिया निशान लगाते हुए पूछा है कि जब अभी तक जनगणना नहीं हुई है, तो यह आंकड़े कितने आधिकारिक हैं और कितने मान्य हैं। इस पर सरकार को अपना रुख स्पष्ट करना चाहिए। 


प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्ययन के मुताबिक 1950 में भारत की जनसंख्या में हिंदुओं की हिस्सेदारी 84 फीसदी थी, जो 2015 में घटकर 78 फीसदी हो गई है। इस दौरान मुसलमानों की हिस्सेदारी 9.84 फीसदी से बढ़कर 14.09 फीसदी हो गई। अखिल भारतीय संयुक्त हिंदू सनातन महासभा के सचिव आचार्य देवेंद्र शुक्ला कहते हैं कि जिस तरीके की रिपोर्ट्स मीडिया में लगातार चर्चा में हैं वह बहुत ही चिंता का विषय है। 



आचार्य शुक्ल के मताबिक अगर हिंदुओं की आबादी इस कदर घट रही है, तो अब केंद्र सरकार को इस पर कड़े फैसले लेने होंगे। वह कहते हैं कि अगर हिंदुस्तान में हिंदुओं की आबादी ही कम हो जाएगी, तो हमारी सनातन परंपरा के ध्वजवाहक फिर कहां ढूंढे जाएंगे। उनका कहना है कि उन्होंने भी मीडिया में ही यह रिपोर्ट पढ़ी है। मुसलमान की बढ़ती हुई आबादी पर उनका कहना है कि अब केंद्र सरकार को जनसंख्या नियंत्रण कानून लागू करना चाहिए, ताकि जनसंख्या पर नियंत्रण हो सके। 

इस रिपोर्ट के बाद सियासी तौर पर माहौल गर्म होने लगा है। भाजपा सांसद साक्षी महाराज कहते हैं कि इसके स्पष्ट मायने हैं या तो हिंदू मारे जा रहे हैं या फिर उनका धर्मांतरण कराया जा रहा है। साक्षी महाराज ने मांग की है कि देश में जल्द ही जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाया जाना चाहिए। यह कानून राष्ट्रहित में है। उनका कहना है कि वह हिंदू और मुसलमान की बात नहीं कर रहे हैं। लेकिन जो रिपोर्ट आई है वह बहुत ही आहत करने वाली है। वहीं भाजपा नेता और केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने विपक्षी पार्टियों पर हमलावर होते हुए भारत को इस्लामिक स्टेट बनाने की साजिश करार दे दिया।

इस रिपोर्ट के मीडिया में आने के बाद जिस तरीके की सियासत शुरू हुई है उस पर राजनीतिक जानकारों का रुख स्पष्ट है। वरिष्ठ पत्रकार राजनीतिक जानकार कुमार अनिमेष कहते हैं कि जिस तरीके से भाजपा नेताओं ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया देनी शुरू की है, उससे स्पष्ट है कि सियासत में मुद्दा अब आगे भी बढ़ने वाला है। कुमार कहते हैं कि अभी तक इस रिपोर्ट को आधिकारिक वेबसाइट पर देखा तो नहीं है, लेकिन मीडिया रिपोर्ट से जो हंगामा मचा है, वह हिंदू-मुस्लिम की राजनीति में ध्रुवीकरण की पूरी पिच तैयार कर रहा है। उनका कहना है कि अभी तक इस मामले में सबसे ज्यादा प्रतिक्रियाएं भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की ओर से आ रहीं हैं। ऐसे में निश्चित तौर पर इस मुद्दे को भारतीय जनता पार्टी के नेता आगे बढ़ा रहे हैं। जबकि अन्य पार्टियों के बड़े नेताओं की ओर से फिलहाल इस पर चुप्पी है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के रिटायर्ड प्रवक्ता और लेखक डॉ डीपी राजवंशी कहते हैं कि जिस रिपोर्ट पर इतना हंगामा मचा है उस पर कई तरह के सवाल भी खड़े होते हैं। डॉक्टर राजवंशी के कहते हैं इस रिपोर्ट में 1950 से लेकर 2015 तक की आबादी का अध्ययन बताया गया है। वह कहते हैं कि अगर इस तरीके की कोई रिपोर्ट जारी हुई है, तो उसे पब्लिक डोमेन में तो होना ही चाहिए। ताकि उसको देश के सभी लोग जान सके और पढ़ सकें। दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा डॉक्टर राजवंशी उठाते हैं कि अगर यह रिपोर्ट 2015 की है, तो नौ सालों बाद 2024 में क्यों जारी की गई। 

वह कहते हैं कि जिस रिपोर्ट को लेकर अचानक इतना हंगामा मचना शुरू हो गया, उस पर तो सरकार को भी अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। उनका कहना है कि अगर रिपोर्ट नौ साल पुरानी है, तो निश्चित तौर पर केंद्र सरकार की योजनाएं भी कुछ न कुछ तो उसके अनुरूप तैयार हुई होंगी। इसलिए यह जानना भी जरूरी है कि क्या इस रिपोर्ट के आधार पर केंद्र सरकार की कुछ योजनाएं बनी हैं या नहीं। क्योंकि अभी जनगणना होनी बाकी है। ऐसे में इस तरह की किसी रिपोर्ट की जनसंख्या के लिहाज से जारी किए गए आंकड़े कितने आधिकारिक माने जाएंगे, इस पर भी स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए।

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