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सबके साथ के बिना सबका विकास कैसे?: वे योजनाएं जिन्हें अब तक लागू नहीं करा पाई मोदी सरकार

Fri, 19 Nov 2021 02:46 PM IST
प्रांजुल श्रीवास्तव न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: प्रांजुल श्रीवास्तव Updated Fri, 19 Nov 2021 02:46 PM IST
सार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन में तीन कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा कर दी। यह कानून सरकार के प्राथमिक कदमों में से एक था, लेकिन इससे पहले भी ऐसे कानूनों को लेकर मोदी सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा, जो उनकी महात्वाकांक्षी योजना थी। 
 

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Repeal farm laws: From three agriculture law to land acquisition bill, schemes of Modi government Incomplete Despite Powerful Majority
सरकार का यू-टर्न - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार कई ऐतिहासिक निर्णय लेने के लिए जानी जाती है। इस सरकार ने धारा 370 और तीन तलाक जैसे ऐसे कई क्रांतिकारी कानूनों को पास कराया जो देश की अन्य सरकारों के लिए दूरी की कौड़ी बने हुए थे, लेकिन पीएम मोदी की कुछ महत्वाकांक्षी योजनाएं  ऐसी भी हैं, जो सरकार के गले की फांस बनी हुई हैं। इन्हें लागू कराने के लिए सरकार ने संसद में कानून तक पारित करवा दिए, लेकिन फिर पीछे हटने की नौबत आ गई। 

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कृषि कानून
मोदी सरकार द्वारा तीन कृषि विधेयकों को पारित करवाए जाने का कदम देश के कृषि क्षेत्र के लिए बड़े बदलावों की नींव माना जा रहा था। हालांकि, शुक्रवार को पीएम मोदी ने खुद इन कानूनों की वापसी की घोषणा कर दी। बिल पास होते ही  पंजाब, हरियाणा और फिर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रदर्शन शुरू हुए, उनसे एक बार फिर सरकार अपनी महत्वाकांक्षी योजना को लागू कराने से पहले बैकफुट पर आ गई। आलम यह है कि कृषि कानूनों को लेकर किसानों का प्रदर्शन अभी तक जारी है और दिल्ली, यूपी, हरियाणा और पंजाब के हजारों की संख्या में किसान बॉर्डर और हाईवे पर बड़ी संख्या में प्रदर्शन के लिए जुटे हैं। 

कृषि कानूनों के विरोध का आलम यह रहा कि सुप्रीम कोर्ट ने खुद इन कानूनों को लागू होने से रोक दिया। खास बात यह थी कि मोदी सरकार ने भी कोर्ट के इस कदम का विरोध नहीं किया। किसानों से बातचीत में सरकार ने खुद इन कानूनों को डेढ़ साल के लिए लागू न करने की बात कही थी। 

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सीएए-एनआरसी
भाजपा के 2014 के घोषणापत्र में यह वादा किया गया था कि उनकी सरकार देश में घुसपैठ रोकने और अवैध प्रवासियों के मुद्दे पर एक स्पष्ट नीति बनाएगी और इसका हल निकालेगी। 2019 के घोषणापत्र में भी इसी वादे को दोहराते हुए भाजपा ने कहा कि वह नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन (एनआरसी) को भी जोर-शोर से पूरा कराएगी। लेकिन 11 दिसंबर 2019 को संसद में विधेयक पारित कराने के बाद इस कानून का सड़कों पर विरोध शुरू हो गया। कई मुस्लिम संगठनों ने दिल्ली से लेकर लखनऊ और अहमदाबाद से लेकर कोलकाता तक इस कानून के विरोध में प्रदर्शन किए। 

इन प्रदर्शनों के चलते ही अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि पर काफी नकारात्मक असर पड़ा। 2020 में यूएन मानवाधिकार आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में इस कानून के खिलाफ याचिका भी दायर कर दी। अमेरिका के थिंक टैंक फ्रीडम हाउस ने इन प्रदर्शनों के बीच ही भारत के लोकतंत्र को स्वतंत्र से आंशिक स्वतंत्र के दर्जे पर पहुंचा दिया था। इसका असर यह हुआ कि भारत सरकार ने जोर-शोर से पारित करवाए गए सीएए को लागू करने की योजना को पीछे कर दिया और इसके नियमों को अब तक फाइनल नहीं किया है। गृह मंत्रालय ने जुलाई में संसद को बताया था कि वह अभी सीएए के नियमों को तय करने के लिए छह महीने और लेगा। 

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जम्मू-कश्मीर
भाजपा ने सीएए और कृषि कानूनों की तरह ही अपनी महत्वाकांक्षी जम्मू-कश्मीर योजना को भी बैकसीट में धकेल दिया है। दरअसल, जम्मू-कश्मीर राज्य को दो हिस्सों में तोड़ने के बाद भाजपा श्रीनगर और लेह को दिल्ली से ही नियंत्रित करने की योजना बना चुकी थी। इसके लिए लंबे समय तक कश्मीर के नेताओं को भी नजरबंद रखा गया। साथ ही सरकार ने टेलिकॉम सेवाओं पर भी रोक जारी रखी। लेकिन जैसे ही अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच प्रतिबंधों में ढील देना और फारूक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती जैसे नजरबंदी में रखे गए नेताओं को छोड़ना शुरू किया गया, वैसे ही मोदी सरकार को एक बार फिर कश्मीर अपने नियंत्रण से बाहर जाता दिखने लगा। आखिरकार भाजपा को कश्मीर में भी राजनीतिक चेहरों से बातचीत शुरू करनी पड़ी। पहले जितेंद्र सिंह समेत नेताओं के दल ने कश्मीर का दौरा किया और फिर इस साल 24 जून को खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कश्मीरी नेताओं से मुलाकात कर इस केंद्र शासित प्रदेश के हालात फिर से पटरी पर लाने पर बातचीत की। 

जमीन अधिग्रहण कानून
अपनी इन तीनों महत्वाकांक्षी योजनाओं पर पीछे हटने से पहले मोदी सरकार 2014 में भी एक योजना को लेकर आलोचना का शिकार हुई थी। यह था जमीन अधिग्रहण अध्यादेश, जिस पर लोकसभा से लेकर राज्यसभा तक में जबरदस्त हंगामा हुआ। आखिरकार इस विधेयक को राज्यसभा में मंजूरी न मिलने के बाद संसद की जॉइंट पार्लियामेंट कमेटी के पास भेजा गया। लेकिन यूपीए के समय लाए गए कानून में संशोधन कराने का विरोध जारी रहा। आखिरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 31 अगस्त 2015 में अपने मन की बात कार्यक्रम में कहा कि किसानों को जमीन अधिग्रहण कानून के संशोधनों पर बहकाया जा रहा है और इसलिए इस अध्यादेश को वापस लिया जा रहा है।

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