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कर्नाटक में धर्मों के बीच क्यों है रगड़ा, कौन मारेगा चुनावी बाजी?

Sun, 01 Apr 2018 05:47 PM IST
सलमान रावी, बीबीसी
सलमान रावी, बीबीसी Updated Sun, 01 Apr 2018 05:47 PM IST
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Religious dispute in Karnataka, who will win the electoral battle of 2018?

बात दक्षिण कर्नाटक के मंगलुरू की आती है तो इसे सांप्रदायिक हिंसा और उन्माद के लिए बदनामी का सामना करते रहना पड़ता है। ये इलाका एक ऐसी प्रयोगशाला बन चुका है जहां कट्टरपंथ के छींटे हर आस्तीन पर हैं। लेकिन इसमें ज्यादा बदनामी हिंदूवादी संगठनों के सिर मढ़ दी जाती है क्योंकि वो बहुसंख्यक हैं। ख़ास तौर पर श्रीराम सेने और इसके जैसे दूसरे संगठन, जैसे कि बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद।

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वर्चस्व की लड़ाई

मुस्लिम संगठनों पर कट्टरवाद को बढ़ावा देने, 'लव जिहाद' और 'लैंड जिहाद' का आरोप है तो ईसाई मिशनरियों पर धर्मांतरण का। यहाँ सभी संगठन वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहे हैं, जिसकी वजह से लकीरें साफ़ खींची हुई नज़र आती हैं।
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कर्नाटक के दक्षिणी तटवर्तीय इलाकों में सांप्रदायिक उन्माद का लंबा इतिहास रहा है। कुछ स्थानीय इतिहासकार इसे साठ के दशक से जोड़कर देखते हैं तो कुछ इसे आपातकाल के दौर से।
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इतिहासकार कहते हैं कि साठ के दशक से ही गौ तस्करों पर हमलों की शुरुआत हुई। विश्व हिन्दू परिषद ने इसी दौरान इस इलाक़े मे अपना प्रभाव बढ़ाया। फिर उदय हुआ हिंदू युवा सेने और हिंदू जागरण वेदिके जैसे संगठनों का।

गुजरात के दंगों के बाद से बजरंग दल भी यहाँ काफी मज़बूत हो गया जबकि कर्नाटक में मुसलमानों की आबादी गुजरात की तुलना में काफ़ी ज़्यादा है।

धर्म के नाम पर प्रतिस्पर्धा

Religious dispute in Karnataka, who will win the electoral battle of 2018?

2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार कर्नाटक में कुल 224 में से 35 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहाँ मुसलमानों की आबादी बीस प्रतिशत या उससे ज़्यादा है।

मंगलुरु में ईसाइयों की आबादी की वजह से इसको दक्षिण भारत के 'रोम' के रूप में जाना जाता है। मगर यहाँ के लोगों को कट्टरपंथ के बीच ही रहने की आदत डालनी पड़ रही है क्योंकि अब ये सब कुछ उनकी ज़िन्दगी का हिस्सा बन चुका है।

तटवर्ती कर्नाटक का ये इलाक़ा कट्टरपंथ की एक अजीब प्रयोगशाला है जहां धर्म के नाम पर ज़बरदस्त प्रतिस्पर्धा चल रही है।

कहीं मंदिरों और मठों पर वर्चस्व की लड़ाई है तो कहीं शिया और सुन्नियों के बीच। या फिर एहले हदीस और वहाबियों के बीच। इन आपस के झगड़ों ने भी काफी हिंसा देखी है।

मस्जिदों पर किसका वर्चस्व

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विश्व हिन्दू परिषद के जगदीश शेनॉय

मस्जिदों पर किसका वर्चस्व हो इस संघर्ष ने भी कई नौजवानों को अस्पताल तक पहुंचाया है। मंगलुरू में मेरी मुलाक़ात आरटीआई कार्यकर्ता विनायक बालिगा की बहन वर्षा से हुई। वो दावा करती हैं कि उनके भाई, विनायक, सूचना के अधिकार के तहत जानकारियों के लिए याचिकाएं डाला करते थे। एक दिन उनकी हत्या उनके घर के सामने ही कर दी गई।

वर्षा का कहना है कि हत्या होने के कुछ दिन पहले उन्होंने किसी मंदिर की आमदनी और खर्च का ब्योरा आरटीआई के तहत मांगा था।

वर्षा कहती हैं कि उनके भाई भारतीय जनता पार्टी से जुड़े थे और घटना के सिलसिले में पकड़े गए आरोपी भी उसी दल से ही बताए जाते हैं।

दलितों, पिछड़ों के बीच संघ परिवार

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आरटीआई कार्यकर्ता विनायक बालिगा की बहन वर्षा


सामाजिक कार्यकर्ता नरेंद्र नायक सभी कट्टरपंथियों के निशाने पर हैं क्योंकि वो रह-रह कर इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते रहते हैं। फ़िलहाल उन्हें स्थानीय प्रशासन ने निजी सुरक्षा मुहैया कराई है।

बीबीसी से बात करते हुए नरेंद्र नायक कहते हैं जिस ब्राह्मण समाज से वो आते हैं उन्हें गोवा से भाग कर मंगलुरू आना पड़ा क्योंकि पुर्तगाली फ़ौज ने वहां अपना साम्राज्य बना लिया था। जो वहां रह गए उन्हें ईसाई बनना पड़ा था।

फिर बचे हुए लोगों को यह कहते हुए ईसाई होने की मान्यता नहीं मिली कि उनके संस्कार और संस्कृति पुरानी है। इसलिए बचे हुए हिन्दुओं वहां से भाग कर आना पड़ा।

नायक अब खुद को नास्तिक मानते हैं और इसीलिए उन्हें मंगलुरु में ज़्यादा ख़तरा हो गया है। पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के बाद नायक को दो हथियारबंद पुलिस सुरक्षाकर्मी मिले हैं जो चौबीसों घंटे उनकी हिफ़ाज़त में लगे हुए हैं।

नायक कहते हैं कि संघ परिवार ने दलितों और अन्य पिछड़ी जातियों के बीच काम करना शुरू किया। अपना प्रभाव बनाया। मगर वो कहते हैं कि जब साल 1992 में बाबरी मस्जिद ढहाई गई तो जो कार्यकर्ता यहाँ से अयोध्या गए वो दलित और अन्य पिछड़ी जातियों के ही थे जबकि अगड़ी जाति के स्वयंसेवकों को मंगलुरू में ही गिरफ़्तार कर लिया गया।

नायक का यह भी कहना है जब कभी हिंसा की नौबत आती है तो संगठन इन्हीं दलितों और अन्य पिछड़ी जाति के कार्यकर्ताओं को आगे कर देते हैं।

इस्लामी कट्टरपंथ

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प्रमोद मुथालिक

तटवर्ती कर्नाटक को कट्टरपंथ की प्रयोगशाला क्यों कहा जाता है मैंने पूछा विश्व हिन्दू परिषद के जगदीश शेनॉय से, जिन्होंने ऐसा मानने से इनकार कर दिया।

हालांकि मार्च महीने की शुरुआत में ही मंगलुरु के एक पब में हुई हिंसा के सभी अभियुक्तों को बरी कर दिया गया था। इसमें श्रीराम सेने के प्रमुख प्रमोद मुथालिक भी शामिल हैं।

जगदीश शेनॉय ने बीबीसी को बताया कि दक्षिण कन्नड़ के मंगलुरु और उडुपी ज़िलों के एक तरफ केरल का कासरगोडा का इलाका है जहां खाड़ी देशों में काम करने वाले मुसलमान पैसे कमाकर यहां अपने घर भेजते हैं और इन्ही पैसों से इस्लामिक संगठन चलते हैं।

वो कहते हैं, "अगर विश्व हिंदू परिषद नहीं होता तो यहाँ लड़कियां सुरक्षित नहीं रह सकती हैं। ये लव जिहाद और लैंड जिहाद का केंद्र बन रहा है और हम इसका विरोध कर रहे हैं।"

वहीं इस्लामी कट्टरपंथ के आरोप जिस संगठन पर लग रहे हैं उसका नाम है पीएफआई यानी 'पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इण्डिया'। इसके अलावा भी कई इस्लामी संगठन हैं जिन पर इसी तरह के आरोप लगाए जा रहे हैं।

तनाव का माहौल

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सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ इण्डिया के महासचिव मोहम्मद इलियास थुम्बे

सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ इंडिया के महासचिव मोहम्मद इलियास थुम्बे कहते हैं कि उनके संगठनों को बिना वजह बदनाम किया जा रहा है।

उनका कहना है, "लव जिहाद और लैंड जिहाद या बीफ़ जिहाद सिर्फ संघ परिवार के शब्दकोष में हैं जिसकी आड़ लेकर वो युवाओं को भड़काते हैं और तनाव का माहौल पैदा करते हैं।"

हाल ही में एक मॉल के सामने कुछ मुसलमान लड़कियों पर इसलिए हमला हुआ क्योंकि वो हिंदू लड़कों से बात कर रही थीं। इस घटना के सिलसिले में पीएफ़आई से जुड़े कुछ युवकों पर आरोप लगाया गया है।

कर्नाटक में मई महीने में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं और चुनावी घोषणा के साथ ही सभी दल जाति और धर्म के नाम पर वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश कर रहे हैं। मगर समाज का एक बड़ा तबका ऐसा भी है जो अमन के साथ मिल जुल कर रहना चाहता है।

अच्छी बात ये है कि पिछले पचास सालों से धार्मिक उन्माद के लिए कुख्यात तटवर्तीय कर्नाटक में शांति के प्रयास भी ज़ोर-शोर से जारी हैं।

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