एक चिट्ठी ने लिखी तीन तलाक कानून की पटकथा, पढ़ें सूत्रधार आरिफ मोहम्मद खान से खास बातचीत
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आरिफ मोहम्मद खान कमाल के स्कॉलर हैं। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार में मंत्री थे, शाहबानो प्रकरण के चलते इस्तीफा देकर सरकार से अलग हो गए थे। शुक्रवार को आरिफ मोहम्मद खान केरल के राष्ट्रपति पद की शपथ लेंगे, लेकिन बहुत कम लोगों को पता होगा कि 06 अक्टूबर 2017 को उनके लिखे एक पत्र ने देश में तीन तलाक कानून की पटकथा लिख दी थी। अगले ही दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें बुलाया, तसल्ली से उनकी बात सुनी और तीन तलाक का कानून लाने का भरोसा दिया। कम लोगों को पता होगा कि तीन तलाक का कानून लाने के पीछे असल का दिमाग आरिफ मोहम्मद खान का ही था।
चच्चा पंखे से लटक जाएंगे, लेकिन यह निकाह नहीं करेंगे?
अमर उजाला से विशेष बातचीत में आरिफ मोहम्मद खान बताते हैं कि बिटिया ने फोन पर जज्बा दिखाया। हलाला से गुजरने से इनकार कर दिया और कहा चच्चा पंखे से लटक जाएंगे, लेकिन यह निकाह मंजूर नहीं है। चच्चा थे आरिफ मोहम्मद खान। फोन की दूसरी लाइन पर थी बहराइच के एक मित्र की बिटिया। बिटिया के शब्द सुनते ही आरिफ साहब के सीने में जितना बिटिया के शब्दों से उसके परिवार के टूटने का अहसास भरा दर्द उभरा, उतना ही उसका साहस देखकर वह फख्र से फूले नहीं समाए। बैचेनी और साहस दोनों समेटे, उन्होंने पांच अक्टूबर को प्रधानमंत्री को पत्र लिख दिया, अगले दिन प्रधानमंत्री से मिलने भी गए।
राजीव गांधी ने किया था अनसुना
तीन तलाक पर प्रधानमंत्री से भरोसा लेकर लौटे और अगले ही दिन से देश के विधि एवं न्याय मंत्रालय का फोन घनघनाने लगा। केरल के नव नियुक्त राज्यपाल ने तब राहत की सांस ली। उनकी आंखों में अस्सी के दशक का इतिहास तैर गया। शाहबानो प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय, तत्कालीन राजीव गांधी की सरकार ने आरिफ मोहम्मद खान को अनसुना करके कठमुल्ला नेताओं की सलाह पर अदालत के निर्णय को पलटने का कदम याद आ गया। अब आरिफ मोहम्मद खान कहते हैं कि यदि तब राजीव गांधी की सरकार ने यह निर्णय न बदला होता तो अब तक मुस्लिम समाज में क्रांति आ गई होती।
5 सितंबर को आया था बहराइच के मित्र का फोन
आरिफ मोहम्मद खान बताते हैं कि 5 सितंबर को बहराइच के एक मित्र का फोन आया। उन्होंने दुखी मन से कहा कि जिस बिटिया की शादी में आप आए थे, उसके शौहर ने बेबात उसे तलाक दे दिया है। आरिफ मोहम्मद खान ने अपने मित्र के बेटी के परिवार को बचाने की खूब कोशिश की। पुलिस से लेकर बेटी के शौहर और उसके पिता तक से प्रयास किया। अंत में शौहर के पिता ने इस्लाम के रीति-नीति का हवाला देते हुए कहा कि तलाक के बाद निकाह खत्म हो चुका है।
इसलिए अब बेटी का निकाह पहले किसी युवक से कराने के बाद फिर उससे तलाक दिलाने (हलाला) के बाद उनके बेटे से फिर निकाह कराया जा सकता है। आरिफ मोहम्मद खान ने टेलीफोन पर हुई बात अपने मित्र को बताई और फिर भारी मन से मित्र की बेटी को बताया।
मुस्लिम समाज की बच्चियों को वरदान
प्रधानमंत्री की सरकार ने देश के मुस्लिम समाज की बच्चियों को वरदान दे दिया है। अब वे अपने सम्मान से जी सकेंगी। बचपन से एक कड़क जुबान कि थोड़ा सहन कर ले वहां जहां निकाह होगा, शौहर तलाक दे देगा। यह दंश अब बचपन में मन पर असर नहीं डालेगा। आरिफ मोहम्मद खान कहते हैं कि इससे क्रांति आ गई। तभी तो पाकिस्तान की काउंसिल ने भी भारत के इस कानून को सही ठहराया है। वहां के चेयरमैन ने अपने देश में भारत की तरह सजा का प्रावधान तय करने की सिफारिश की है। आरिफ मोहम्मद खान कहते हैं कि यही तो होना चाहिए था।
बिना सजा के प्रावधान के यह कानून भी तमाम कानूनों की तरह अदालत पर एक बोझ बनकर रह जाता। अब तीन तलाक देने वाला भी डरेगा और मुस्लिम परिवार की बच्चियों की जिंदगी को भी नई रोशनी मिल सकेगी। क्योंकि मोदी सरकार के दोबारा सत्ता में आने के बाद इस कानून पर संसद की मुहर लग गई है। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद यह प्रभावी कानून बन चुका है। अब इस कानून के असर की खबर हर रोज समाचार पत्र में देखने को मिल रही है।
राज्यपाल बनने से पहले सीखनी शुरू की मलयालम
सफलता की सीढ़ियां इंसान के चेहरे पर दर्द का मीठा अहसास लेकर आती हैं। आरिफ मोहम्मद खान से भेंट इसका पूरा अहसास करा रही थी। अस्सी के दशक से वह एक कश्मकस लेकर चल रहे थे। जिस दल में जाते, कट्टरपंथी मुस्लिम समाज और नेताओं के कारण लोग कुछ दूरी बनाने लगते। इसके चलते आरिफ मोहम्मद खान राजनीति में कोई सफल पारी नहीं खेल पाए। लेकिन राजनीतिक व्यक्ति होने के साथ-साथ धर्म, समाज, व्यवस्था पर ज्ञान ने जज्बे के साथ जिंदा रखा। हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू, अरबी, फारसी, संस्कृत भाषा के ज्ञान ने दिशा दी।
रामायण, गीता, कुरान समेत अन्य ग्रंथों और वहां से बने आभा मंडल ने स्कॉलर की श्रेणी में रख दिया। कहते हैं इसी आभामंडल ने 1986 से अब तक की जिंदगी को शान से गुजार दिया। अब तो शुक्रवार को शपथ लेकर केरल के महामहिम (राज्यपाल) बन जाएंगे। सीखने की लगन फिर भी कम नहीं हुई, राज्यपाल बने नहीं हैं, लेकिन मलयालम सीखना शुरू कर दिया है। थोड़ी-बहुत कन्नड़ भी आती है।