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अहमदाबाद: देश में हिंदी पर छिड़ी बहस के बीच संघ प्रमुख का बड़ा बयान, बोले- भारत में कई भाषाएं, लेकिन सभी में एक ही भाव

Thu, 21 Apr 2022 10:51 PM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अहमदाबाद
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अहमदाबाद Published by: शिव शरण शुक्ला Updated Thu, 21 Apr 2022 10:51 PM IST
सार

आरएसएस प्रमुख ने कहा कि देश में कई भाषाएं हैं, लेकिन सभी में एक ही भाव है। रामायण, महाभारत सभी भाषाओं में है, लेकिन सभी भाषाओं की परंपराएं इसी भाव को व्यक्त करती हैं।

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Rashtriya Swayamsevak Sangh chief Mohan Bhagwat says India has many languages but all of them carry same feeling
सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत - फोटो : पीटीआई

विस्तार

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने गुरुवार को अहमदाबाद में भारत की एकजुटता का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि भारत में कई भाषाएं हैं, लेकिन उन सभी में एक ही भाव या भावना है, जो देश की एकजुटता का स्रोत है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत का हमेशा से मानना रहा है कि एकजुट रहने के लिए एक जैसे होने की जरूरत नहीं है। संघ प्रमुख की भाषाओं पर यह टिप्पणी उस समय आई है जब आरोप लगाए जा रहे हैं कि सरकार द्वारा देश में गैर-हिंदी भाषी राज्यों पर हिंदी भाषा थोपने के प्रयास किए जा रहे हैं।

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आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत गुजरात साहित्य अकादमी द्वारा संस्कृत भाषा की पुस्तकों को पुरस्कार प्रदान करने और उड़िया पुस्तक 'अनन्या जगन्नाथ अनुभूतिमा' के गुजराती अनुवाद को लॉन्च करने के लिए आए थे। इस मौके पर गुरुवार को आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने ये बातें कहीं। 
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उन्होंने कहा कि भाषा जो भी हो, क्योंकि देश में कई भाषाएं हैं। ऐसा कहा जाता है कि बोलियों सहित लगभग 3,800 भाषाएं हैं, और एक ही भाषा को अलग तरीके से बोली जाने वाली भाषा को समझना मुश्किल है। भाषाएं भले ही अलग हों, फिर भी 'भाव' एक ही है। यह भारत की एकजुटता है। आरएसएस प्रमुख ने कहा कि देश में कई भाषाएं हैं, लेकिन सभी में एक ही भाव है। रामायण, महाभारत सभी भाषाओं में है, लेकिन सभी भाषाओं की परंपराएं इसी भाव को व्यक्त करती हैं।
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उन्होंने कहा कि भारत जैसा कोई दूसरा देश नहीं है, और जबकि दुनिया भर के लोग कहते हैं कि एकजुट रहने के लिए एक जैसा होना चाहिए, भारत प्राचीन काल से यह मानता रहा है कि एकजुट होने के लिए समान होने की कोई आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि हम 'अनेकता में एकता' कहते रहे हैं, लेकिन हम सभी को कुछ और शब्दों का इस्तेमाल करना होगा और अब हमें एकता में विविधता कहना होगा।


संघ प्रमुख ने कहा कि भारत की राष्ट्रीय भावना की स्वाभाविक अभिव्यक्ति संकटग्रस्त देशों की मदद करना है न कि युद्ध करना। उन्होंने कहा कि भारत ने मालदीव को पानी की आपूर्ति की, युद्ध के समय में दूसरे देशों में फंसे लोगों को निकाला, संकट का सामना कर रहे श्रीलंका को चावल की आपूर्ति की। उन्होंने कहा कि यही हमारे 'राष्ट्रीय भाव' की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है।

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