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वर्दी पुलिस की पहनते है, हाजिरी कहीं और बजाते हैं!
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 24 Dec 2016 11:23 PM IST
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जयपुर में गुरुवार रात एटीएस में एएसपी आशीष प्रभाकर द्वारा अपनी सर्विस रिवाल्वर से महिला मित्र पूनम शर्मा को और बाद में खुद को गोली मारने की घटना ने पुलिस विभाग की भीतरी व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं। पूरी घटना से ऐसा लग रहा है, मानो पुलिसकर्मियों और अधिकारियों को अपनी समस्या सुलझाने को लेकर अपने ही विभाग पर भरोसा नहीं है।
इस मामले में वरिष्ठ आईपीएस पंकज चौधरी का पुलिस विभाग की भीतरी व्यवस्था पर दर्द छलक उठा है। उन्होंने एक बेबाक पत्र सोशल मीडिया पर जारी किया है। पंकज वहीं आईपीएस हैं, जिन्होंने जैसलमेर एसपी रहते पिछली कांग्रेस सरकार के समय सालों से बंद पड़ी गाजी फकीर की हिस्ट्रीशीट खोली थी, जिससे राजस्थान में बवाल मच गया था। उनका चौबीस घंटे में तबादला हो गया था।
पढ़िए पंकज चौधरी का पत्र...
आशीष की मौत एक सबक एवं आत्ममंथन का क्षण पुलिस विभाग के लिए, ये मेरी व्यक्तिगत राय एवं सोच है। क्या आशीष की दुखद: मौत टाली जा सकती थी? एक होनहार पुलिस अधिकारी कई प्रश्न इस समाज एवं पुलिस के लिए छोड़ जाते हैं। मेरा मानना है कि जितना इस अधिकारी के बारे में जान पाया हूं, यह पुलिस के लिए बड़ा नुकसान कई प्रकार से है।
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ऐसे क्या कारण रहे, जो इस अधिकारी की मानसिक दशा का आभास पुलिस विभाग नहीं कर सका, जो आमजन की किसी भी समस्या का समाधान करता नजर आता है। पुलिस विभाग एक परिवार के रूप में संचालित होता है, इसका आभास आशीष को क्यों नही हुआ? क्या आशीष को सबसे ज्यादा असुरक्षा एवं भय इस विभाग से रहा, जो इतने बड़े परिवार को अपनी बात या व्यथा रखने की हिम्मत नहीं जुटा सका।
यदि किसी ट्रैप, ब्लैकमैलिग, चीटिंग से परिवार तबाह होने के कगार पर था, तो पुलिस विभाग पर भरोसा रखना था, अपनी बातों को निडरता से बोलना था, खुद से कुछ गलती हो गई, उसको भी ठीक करना था और इस ट्रैप से बाहर आना था। शायद पुन: रिपीट कर रहा हूं, विभाग पर भरोसा नहीं रखा गया, यह मान लिया गया कि इस विभाग के अधिकांश अधिकारी, कर्मचारी, जवान उसका पक्ष नहीं मानेंगे और हंसी का पात्र बनाएंगे।
मैं इस तथाकथित आशंका को सही भी मानता हूं एवं निरंतर इस बात का प्रबल विरोध इस विभाग के कुछ (जिनकी संख्या दिनदुनी रात चौगुनी बढ़ते) दलालों एवं चापलूसों पर करता रहा हूं, जो वर्दी तो पुलिस की पहनते हैं, पर अपने स्वार्थ के लिए हाजिरी कहीं और बजाते हैं। पुलिसिंग में यह प्रजाति काफी समय से इस विभाग को खोखला कर रही है, यह उचित मंच नहीं है, अन्यथा विभाग के इन चापलुसों को उजागर करने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। ये सबसे घातक तत्व है, जो पुलिस परिवार को खंडित कर रहे हैं।
पुन: इस बेहद दुखद घटना से मर्मांहत हूं और इस घटना के बाद पुलिस के भीतरी समीकरण को पुख्ता करने की अपेक्षा रखता हूं, ताकि कोई अन्य प्रभाकर इस दशा में पुलिस विभाग को सबसे पहले अपना हितैषी मानेगा और आने वाले इस प्रकार के संकट से बाहर आ सकेगा।
जय हिंद, जय भारत, जय संविधान
पंकज चौधरी (आई.पी.एस)
2009 बैच, राजस्थान कैडर
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इस मामले में वरिष्ठ आईपीएस पंकज चौधरी का पुलिस विभाग की भीतरी व्यवस्था पर दर्द छलक उठा है। उन्होंने एक बेबाक पत्र सोशल मीडिया पर जारी किया है। पंकज वहीं आईपीएस हैं, जिन्होंने जैसलमेर एसपी रहते पिछली कांग्रेस सरकार के समय सालों से बंद पड़ी गाजी फकीर की हिस्ट्रीशीट खोली थी, जिससे राजस्थान में बवाल मच गया था। उनका चौबीस घंटे में तबादला हो गया था।
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पढ़िए पंकज चौधरी का पत्र...
आशीष की मौत एक सबक एवं आत्ममंथन का क्षण पुलिस विभाग के लिए, ये मेरी व्यक्तिगत राय एवं सोच है। क्या आशीष की दुखद: मौत टाली जा सकती थी? एक होनहार पुलिस अधिकारी कई प्रश्न इस समाज एवं पुलिस के लिए छोड़ जाते हैं। मेरा मानना है कि जितना इस अधिकारी के बारे में जान पाया हूं, यह पुलिस के लिए बड़ा नुकसान कई प्रकार से है।
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ऐसे क्या कारण रहे, जो इस अधिकारी की मानसिक दशा का आभास पुलिस विभाग नहीं कर सका, जो आमजन की किसी भी समस्या का समाधान करता नजर आता है। पुलिस विभाग एक परिवार के रूप में संचालित होता है, इसका आभास आशीष को क्यों नही हुआ? क्या आशीष को सबसे ज्यादा असुरक्षा एवं भय इस विभाग से रहा, जो इतने बड़े परिवार को अपनी बात या व्यथा रखने की हिम्मत नहीं जुटा सका।
यदि किसी ट्रैप, ब्लैकमैलिग, चीटिंग से परिवार तबाह होने के कगार पर था, तो पुलिस विभाग पर भरोसा रखना था, अपनी बातों को निडरता से बोलना था, खुद से कुछ गलती हो गई, उसको भी ठीक करना था और इस ट्रैप से बाहर आना था। शायद पुन: रिपीट कर रहा हूं, विभाग पर भरोसा नहीं रखा गया, यह मान लिया गया कि इस विभाग के अधिकांश अधिकारी, कर्मचारी, जवान उसका पक्ष नहीं मानेंगे और हंसी का पात्र बनाएंगे।
मैं इस तथाकथित आशंका को सही भी मानता हूं एवं निरंतर इस बात का प्रबल विरोध इस विभाग के कुछ (जिनकी संख्या दिनदुनी रात चौगुनी बढ़ते) दलालों एवं चापलूसों पर करता रहा हूं, जो वर्दी तो पुलिस की पहनते हैं, पर अपने स्वार्थ के लिए हाजिरी कहीं और बजाते हैं। पुलिसिंग में यह प्रजाति काफी समय से इस विभाग को खोखला कर रही है, यह उचित मंच नहीं है, अन्यथा विभाग के इन चापलुसों को उजागर करने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। ये सबसे घातक तत्व है, जो पुलिस परिवार को खंडित कर रहे हैं।
पुन: इस बेहद दुखद घटना से मर्मांहत हूं और इस घटना के बाद पुलिस के भीतरी समीकरण को पुख्ता करने की अपेक्षा रखता हूं, ताकि कोई अन्य प्रभाकर इस दशा में पुलिस विभाग को सबसे पहले अपना हितैषी मानेगा और आने वाले इस प्रकार के संकट से बाहर आ सकेगा।
जय हिंद, जय भारत, जय संविधान
पंकज चौधरी (आई.पी.एस)
2009 बैच, राजस्थान कैडर