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IPS के सामने कैसे बढ़ेगा CAPF कमांडरों का रुतबा! कैडर रिव्यू प्रक्रिया पर उठे सवाल
Sat, 13 Feb 2021 07:04 PM IST
Harendra Chaudhary
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Harendra Chaudhary
Updated Sat, 13 Feb 2021 07:04 PM IST
सार
डीओपीटी के नियमानुसार, हर पांच साल में कैडर रिव्यू जरूरी है। लेकिन सरकार जानबूझ कर इस प्रक्रिया में देरी कर रही है। पिछले साल दिल्ली हाईकोर्ट ने 30 जून 2021 तक कैडर रिव्यू करने के लिए कहा था, लेकिन बाद में उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी गई...
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गृह मंत्रालय
- फोटो : ANI (File)
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विस्तार
केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में नए बदलावों को लेकर संशय के बादल छाए गए हैं। पदोन्नति के लिए लंबे समय से अदालती लड़ाई लड़ रहे सीएपीएफ कमांडरों का रुतबा आईपीएस के सामने बढ़ पाएगा या नहीं, इस पर प्रश्नचिन्ह लग गया है। खासतौर पर, सीआरपीएफ और बीएसएफ के कैडर रिव्यू प्रक्रिया को लेकर सवाल उठने लगे हैं। इन दोनों ही बलों में अभी तक यह प्रक्रिया शुरू नहीं हो पाई है।
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डीओपीटी के नियमानुसार, हर पांच साल में कैडर रिव्यू जरूरी है। सूत्रों का कहना है कि केंद्र सरकार जानबूझ कर इस प्रक्रिया में देरी कर रही है। पिछले साल दिल्ली हाईकोर्ट ने 30 जून 2021 तक कैडर रिव्यू करने के लिए कहा था, लेकिन बाद में उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी गई।
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नतीजा, सरकार को यह कहने का मौका मिल गया कि अभी ये मामला कोर्ट में विचाराधीन है। सीएपीएफ के अफसरों का कहना है कि सरकार ने जानबूझकर अदालती फैसले की आड़ ली है। कैडर रिव्यू प्रक्रिया पांच साल में होनी चाहिए, ये भी केंद्र सरकार का ही नियम है।
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सीएपीएफ अफसरों के मुताबिक इससे पहले भी सरकार का कैडर रिव्यू को लेकर सुस्त रवैया रहा है। अदालती हस्तक्षेप के बाद सीआरपीएफ के पिछले कैडर रिव्यू की सीआरसी बैठक 15 दिसंबर 2015 को हुई थी। इसके बाद 29 जून 2016 को उसे कैबिनेट की मंजूरी मिली। इसी तरह बीएसएफ के कैडर रिव्यू को लेकर 29 जून को सीआरसी बैठक हुई, जबकि 12 सितंबर 2016 को कैबिनेट की मंजूरी मिली थी। सीएपीएफ अधिकारी बताते हैं कि वे सरकार की अनदेखी के चलते पदोन्नति के मामले में बहुत पीछे चले गए हैं।
मौजूदा समय में कई ऐसे केस देखने को मिल जाएंगे, जिनमें सहायक कमांडेंट को 12 साल में पहली पदोन्नति मिल रही है, जबकि नियम है कि उसे चार साल में अगले पद का वेतन और छह साल में पदोन्नति मिल जानी चाहिए। नियम के तहत टूआईसी बनने में करीब 9 साल लगते हैं, मगर अभी 17 से 22 साल में इस पद पर पहुंचा जा रहा है। डीआईजी बनने के लिए 16 साल और आईजी के लिए 18 साल की नौकरी जरूरी है। वर्तमान में हालत यह है कि इन पदों तक पहुंचने के लिए बहुत से अफसरों का तो नंबर ही नहीं आता।
कैडर अफसरों का कहना है कि वे इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक जा चुके हैं। हमारे पक्ष में फैसला भी आया है। अदालत में यह बात साबित भी हुई थी कि सीएपीएफ के अफसरों को तय समय पर पदोन्नति नहीं मिल पा रही है। कैडर अफसरों की याचिका पर ही दिल्ली हाईकोर्ट ने इन बलों में प्रतिनियुक्ति पर आने वाले आईपीएस अफसरों के आने पर रोक लगा दी थी।
पिछले साल दिल्ली हाईकोर्ट ने आईपीएस-आईजी के पदों को प्रतिनियुक्ति के जरिए भरने की इजाजत देने के साथ ही सरकार को यह आदेश दिया था कि वह 30 जून 2021 तक सीआरपीएफ और बीएसएफ में कैडर रिव्यू प्रक्रिया पूरी कर रिपोर्ट प्रस्तुत करे। केंद्रीय गृह मंत्रालय में एक कमेटी भी गठित कर दी गई। साथ ही, दोनों बलों के कैडर अधिकारियों से अपने प्रपोजल देने के लिए कहा गया। बहुत से अधिकारियों ने अपना रिप्रेजेंटेशन दे दिया।
अफसरों का कहना है, अब केंद्र सरकार ने यह कह कर कैडर अफसरों के रिप्रेजेंटेशन पर विचार ही नहीं किया कि ये मामला तो अदालत में विचाराधीन है। दूसरी तरफ कैडर अधिकारियों की दलील है, ये सरकार का ही नियम है कि एक विभाग का कैडर रिव्यू पांच वर्ष में हो जाना चाहिए। इसमें अदालत की कोई भूमिका नहीं है। भले ही केस अदालत में हो, लेकिन सरकार को तो समय पर कैडर रिव्यू करना चाहिए। यह प्रक्रिया एक-दो सप्ताह में पूरी नहीं हो सकती। पहले एक बल को प्रपोजल तैयार करना होगा। इसमें तीन चार माह लगते हैं।
उसके बाद गृह मंत्रालय, रिपोर्ट का अध्ययन करेगा। यहां से सब कुछ ठीक रहा तो वह फाइल डीओपीटी के पास जाएगी। वहां से वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग में फाइल भेजेंगे। नए कैडर रिव्यू से कितना खर्च बढ़ेगा, इसका गणना करके फाइल को अंतिम रूप दिया जाएगा। वहां से उसे कैबिनेट की मंजूरी के लिए भेजते हैं। इस प्रक्रिया में आठ दस माह का समय लग जाता है। इस साल अभी तक इन बलों में कैडर रिव्यू प्रक्रिया शुरू नहीं की गई है।
जब तक कैडर रिव्यू नहीं होगा तो बल की मौजूदा क्षमताओं की समीक्षा नहीं हो सकेगी। कहां पर कितने कर्मी ज्यादा हैं या कम हैं, पदों के नए सृजन की जरूरत है या वहां कमी की जाए, कितनी नई बीओपी खड़ी होंगी, नक्सल या जम्मू-कश्मीर को लेकर क्या रणनीति रहेगी, आदि बातें कैडर रिव्यू में होती हैं। अधिकारियों के मुताबिक 2016 से पहले सीआरपीएफ का कैडर रिव्यू तो नब्बे के दशक में हुआ था। बाद में गृह मंत्रालय के एक संयुक्त सचिव ने तो इतना तक कह दिया था कि इन बलों में कैडर रिव्यू की कोई जरूरत नहीं है।
हालांकि बाद में सचिव और डीओपीटी ने उनकी बात को सिरे से खारिज कर दिया था। कैडर अधिकारियों का कहना है कि सरकार को जल्द से जल्द कैडर रिव्यू प्रक्रिया पूरी कर उनकी पदोन्नति की राह प्रशस्त करनी चाहिए। इस बाबत मंत्रालय के एक अधिकारी का कहना है कि इस मामले में कार्यवाही जारी है। अदालत के फैसले को ध्यान में रखकर आगे बढ़ा जाएगा।