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Supreme Court: दवाओं के विज्ञापन कानून पर उठा 'सुप्रीम' सवाल, जानें 1954 के अधिनियम की समीक्षा की मांग क्यों

Sat, 27 Dec 2025 10:46 PM IST
हिमांशु चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: हिमांशु चंदेल Updated Sat, 27 Dec 2025 10:46 PM IST
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question raised regarding in Supreme Court for drug advertising laws why review of 1954 Act demanded
दवाओं के विज्ञापन को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

दवाओं और उपचारों के विज्ञापन से जुड़े कानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक अहम याचिका दाखिल की गई है। याचिका में कहा गया है कि वर्ष 1954 में बने कानून को आज के वैज्ञानिक दौर के हिसाब से अपडेट करने की जरूरत है। इस याचिका ने दवाओं के विज्ञापन, जनता के सूचना के अधिकार और आयुष पद्धति से जुड़े डॉक्टरों की भूमिका को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

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यह याचिका सर्वोच्च अदालत में दायर की गई है। याचिकाकर्ता नितिन उपाध्याय ने केंद्र सरकार से मांग की है कि वह एक विशेषज्ञ समिति बनाए, जो ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम, 1954 की अनुसूची की समीक्षा करे। याचिका में कहा गया है कि यह कानून उस समय बनाया गया था, जब चिकित्सा विज्ञान की स्थिति आज जैसी नहीं थी।
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आयुष डॉक्टरों को लेकर उठाया गया सवाल
याचिका में यह भी मांग की गई है कि आयुष डॉक्टरों को भी कानून की धारा 2(सीसी) के तहत ‘पंजीकृत चिकित्सा व्यवसायी’ माना जाए। इस धारा में पंजीकृत डॉक्टर की परिभाषा दी गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि आयुष और अन्य गैर-एलोपैथिक पद्धतियों से जुड़े वैध डॉक्टरों को इस परिभाषा से बाहर रखना अनुचित है।
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किस बात पर रोक लगाता है 1954 का कानून
1954 का यह कानून कुछ खास बीमारियों और स्थितियों के इलाज से जुड़े दवाओं के विज्ञापन पर पूरी तरह रोक लगाता है। खासतौर पर धारा 3(डी) के तहत कुछ बीमारियों के इलाज से जुड़े किसी भी तरह के विज्ञापन पर पूर्ण प्रतिबंध है। याचिका में कहा गया है कि यह प्रावधान भ्रामक और सच्ची जानकारी के बीच कोई फर्क नहीं करता।

‘पूरी तरह का प्रतिबंध जनता को अंधेरे में रखता है’
याचिका में कहा गया है कि इस कानून का मकसद लोगों को झूठे और भ्रामक विज्ञापनों से बचाना था, लेकिन समय के साथ यह कानून एक ‘ब्लैंकेट बैन’ में बदल गया है। इसका असर यह हुआ है कि आयुष जैसे पद्धति से जुड़े डॉक्टर गंभीर बीमारियों के इलाज में उपलब्ध दवाओं की जानकारी भी जनता तक नहीं पहुंचा पा रहे हैं। इससे लोगों में जानकारी की कमी बनी रहती है।


सूचना के अधिकार और पुराने कानून का टकराव
याचिका में यह दलील भी दी गई है कि आज के दौर में लोगों को अपनी बीमारी के निदान, बचाव और इलाज से जुड़ी सही जानकारी पाने का अधिकार है। यदि कोई विज्ञापन सत्य, वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित और गैर-भ्रामक है, तो उसे पूरी तरह रोकना अनुचित है। याचिका के मुताबिक, एक पुराने कानून के चलते जनता का सूचना का अधिकार प्रभावित हो रहा है।

विशेषज्ञ समिति बनाने की मांग
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया है कि वह केंद्र सरकार को निर्देश दे कि एक विशेषज्ञ समिति गठित की जाए। यह समिति वर्तमान वैज्ञानिक प्रगति और साक्ष्य आधारित चिकित्सा ज्ञान के आधार पर कानून की अनुसूची की समीक्षा करे और उसे अपडेट करे। याचिका का कहना है कि इससे भ्रामक विज्ञापनों पर रोक भी बनी रहेगी और सही जानकारी भी जनता तक पहुंचेगी।


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