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साख पर सवाल: कमांडरों के बिना आखिर कैसे पूरा कर पाएंगी बहुजन प्रमुख मायावती अपना सपना?

Wed, 08 Sep 2021 02:29 AM IST
देव कश्यप शशिधर पाठक, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, नई दिल्ली Published by: देव कश्यप Updated Wed, 08 Sep 2021 02:29 AM IST
सार

  • अब तो मुख्यमंत्री क्या, मायावती मंत्री भी नहीं बन पाएंगी- गोयल 
  • बहुजन मिशन का चेहरा, चरित्र, चाल, विचार, सोच, नजरिया सबकुछ बदला
  • दलित, अति दलित, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक के बड़े नेता छोड़ गए साथ
  • कोईरी, कुर्मी, नाई, काछी, कोहार, लोहार, राजभर, नोनिया, पटेल, पासी समेत सब छोड़ गए साथ
  • मान्यवर कांशीराम के मिशन से जुड़े नेताओं ने भी बनाई दूरी

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Question on BSP chief Mayawati Political career with help of Brahmin she seeing dream of coming in power
बसपा सुप्रीमो मायावती। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बहुजन समाज के कमांडरों से विहीन बसपा प्रमुख मायावती का मुख्यमंत्री बनने का सपना कैसे साकार हो पाएगा? ब्राह्मण सम्मेलन के सहारे मायावती सत्ता में आने का ख्याब देख रही हैं, लेकिन इस सवाल के जवाब में कभी मान्यवर कांशीराम के दौर से जुड़े और मायावती के इशारे पर चलने वाले सुधीर गोयल कहते हैं कि मायावती के लखनऊ स्थित आवास से मुख्यमंत्री का आवास बहुत दूर है। सुधीर गोयल जवाब में कहते हैं कि मायावती मुख्यमंत्री तो छोड़िए अब कभी मंत्री भी नहीं बन सकती। एक दौर था, जो अब चला गया। अब संगी हैं, न साथी। न काफिला है और न बहुजन।

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गोयल की आंखे इस चर्चा में शून्य की तरफ निहारने लगती हैं। वह बताते हैं कि कैसे बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक, बहुजन समाज को आवाज, मजबूती देने वाले मान्यवर कांशीराम के साथ जुड़े थे। गांधी आजाद, पंजाब में संतोष सिंह, करीमपुरी, मध्यप्रदेश. में फूल सिंह बरैया, आर्या सब जुड़े थे। तिनका-तिनका जुड़कर बहुजन समाज पार्टी का मिशन तैयार हुआ था और अब सब बिखर गया।
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लकड़ी की संदूक रखकर अंबेथ राजन करते थे पार्टी का काम
सुधीर गोयल कहते हैं कि 1982 का समय नहीं भूलूंगा, जब अंबेथ राजन मान्यवर के मिशन से जुड़े थे। वह तमिलनाडु से सब छोड़कर चले आए थे और लकड़ी की एक संदूक रखकर बहुजन समाज के मिशन को आगे बढ़ाने का काम कर रहे थे। अब अंबेथ राजन भी पार्टी के साथ नहीं हैं। छोड़ गए। मान्यवर के दौर के तमाम लोगों को या तो पार्टी से निकाल दिया गया या फिर दुर्दशा, मिशन से भटकाव देखकर पार्टी से दूरी बनाते चले गए। अब तो कोई नहीं है। सुधीर गोयल कहते हैं कि अपने हित में मायावती ने पूरी पार्टी, बहुजन मिशन का सबकुछ बदल डाला। सोच, विचार, चेहरा, चरित्र सबकुछ। अब न तो साथ में पहले की तरह अल्पसंख्यक है और न ही दलित, अति दलित, अन्य पिछड़ा वर्ग। सुधीर गोयल कहते हैं कि जिस पार्टी के साथ उसका मूल आधार नहीं है, आप ही बताइए वह सत्ता में कैसे लौट सकती है?
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2006-07 था स्वर्णिम काल
सुधीर गोयल की तरह ही बहुजन समाज पार्टी के एक और नेता कहते हैं कि कोईरी, कुर्मी, पटेल, नाई, कांछी, कोहार, लोहार, धुनिया, नोनिया, केवट, पासी, राजभर, वर्मा, कुशवाहा, पटेल जैसी तमाम छोटी-छोटी जातियों को जोड़कर बसपा ने अपना जनाधार खड़ा किया था। पंजाब से लेकर उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात समेत तमाम राज्यों में जनाधार बढ़ रहा था, लेकिन अब कुछ भी नहीं बचा है। बताते हैं सभी को जोड़कर बसपा ने 2007 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। सुधीर गोयल 2007 की सरकार में सूचना मंत्री थे। गोयल कहते हैं कि तब बहुजन समाज के लोगों ने भाई चारा बनाओं समितियों के माध्यम से पूरी ताकत के साथ साथ दिया था। 2007 के चुनाव में कुछ ब्राह्मण भी साथ जुड़े। मनुवादी विरोध की पार्टी ने पहली बार चोला बदला था और पूर्ण बहुमत की सरकार बनी थी, लेकिन इसके बाद बसपा प्रमुख मायावती बेलगाम होती गईं। गोयल कहते हैं कि हमारे नेता हमें छोड़-छोड़कर जाते रहे या निकाल दिए गए। अब तो कुछ बचा ही नहीं है।

मुख्यमंत्री क्या अब कभी मंत्री भी नहीं बन सकती मायावती
सुधीर गोयल की टिप्पणी थोड़ा तल्ख है। वह कहते हैं कि मायावती मुख्यमंत्री तो क्या अब मंत्री भी नहीं बन सकती। संवाददाता को याद है कि जब सवाल तिलक, तराजू और तलवार .... का नारा बसपा के गले की फांस बन रहा था, तब सुधीर गोयल ने मीडिया में जिम्मेदारी निभाकर संतुलन बनाने में काफी काम किया था। इसी के पुरस्कार रूप में सूचना मंत्री बनाए गए थे। गोयल कहते हैं कि सवाल बसपा का नहीं है। सवाल उस मिशन का है। अब मान्यवर कांशीराम का मिशन रहा ही नहीं, आधार भी नहीं रहा। ऐसे में हवा में किले तो बनेंगे नहीं। हर साल नया मतदाता जुड़ रहा है, जीवन के  मुद्दे, जरुरतें बदल रही है और राजनीति में भी बड़ा बदलाव आ रहा है। गोयल कहते हैं कि मुझे नहीं लगता कि बसपा इसके हिसाब से खुद को तैयार कर पा रही है। 2007 की तरह सभी जातियों, वर्गों, संप्रदायों को जोड़ पा रही है। लालजी वर्मा, राम अचल राजभर, बाबू सिंह कुशवाहा, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे तमाम नेताओं की स्थिति आप देख ही रहे हैं। वह कहते हैं कि आगामी यूपी विधानसभा चुनाव काफी दिलचस्प और ऐतिहासिक होने वाला है।


मुझे बता दीजिए ऐसे 13 फीसदी ब्राह्मण कैसे बसपा को वोट दे देगा?
2007 के चुनाव में बसपा के लिए कड़ी मेहनत करने वाले एक पूर्व ब्राह्मण नेता की सुन लीजिए। वह कहते हैं कि आखिर प्रदेश का 13 फीसदी ब्राह्मण आज मायावती के याद करने पर कैसे उनके साथ जुड़ जाएगा? क्या मायावती को 2012 (विधानसभा), 2014 (लोकसभा), 2017 (विधानसभा), 2019 का लोकसभा चुनाव याद नहीं है। हालांकि मायावती के सचिवालय को 2022 में यूपी की सत्ता बदलने का पूरा भरोसा है। बसपा के एक पूर्व सांसद कहते हैं कि पहले बसपा का टिकट मिलने पर 50 फीसदी जीत का भरोसा हो जाता था। इसलिए दूसरी जाति के लोग बसपा का टिकट पाने की कोशिश करते थे। इसका कारण बसपा का आधार वोट था। इसमें प्रत्याशी की जाति का वोट प्रतिशत जुड़ने के बाद उसकी जीत तय हो जाती थी। अब बसपा का आधार वोट बहुत सिकुड़ गया है। इसके अलावा दूसरी जातियों के लोगों में भी बसपा के टिकट की मारा मारी भी बंद हो चुकी है। इसको ब्राह्मण भी समझता है। वहीं बसपा के एक प्रवक्ता कहते हैं कि 2022 का इंतजार कीजिए। सब पता चल जाएगा।  
 

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