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Quad Summit: पहली बार क्वाड बैठक से पहले आया ताइवान का नाम, घबराया चीन, लेकिन जापान-ऑस्ट्रेलिया को भायी भारत की सोच

Mon, 23 May 2022 05:20 PM IST
Ashish Tiwari आशीष तिवारी
Updated Mon, 23 May 2022 05:20 PM IST
सार

एशिया मामलों के जानकार एशियन स्टडीज ऑफ जियो पॉलिटिकल सेगमेंट के पूर्व निदेशक डॉक्टर एचएन चारू कहते हैं कि चीन हमेशा से इस बात को लेकर संकेत देता रहता है कि जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के साथ भारतीय गठजोड़ कर बनाया गया क्वाड, कहीं उसके लिए गले की हड्डी ना बन जाए...

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Quad summit 2022: Before the Quad meeting, Biden challenged China by making a statement in support of Taiwan, India adhere on its old stand
पीएम मोदी पहुंचे जापान - फोटो : ANI

विस्तार

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने टोक्यो में होने वाली क्वाड की बैठक से पहले ही ताइवान पर बोलकर चीन को खुली चुनौती दे दी है। हालांकि इस मामले में भारत ने अपना रुख सामान्य रूप से ही अख्तियार किया है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि टोक्यो में होने वाली अहम बैठक से पहले अमेरिका के इस बयान से भारत को बहुत ताकत मिली है। खास बात यह है कि भारत ने ताइवान मामले में फिलहाल जापान में अपनी कोई राय नहीं रखी है। विशेषज्ञों का मानना है कि ताइवान को लेकर भारत का रुख वही है जो कि पहले से था।

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दरअसल जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया तो पूरी दुनिया में चर्चा इस बात की होने लगी कि कहीं ऐसा तो नहीं कि चीन भी ताइवान पर अपनी जोर आजमाइश की ताकत दिखाना शुरू कर दे। क्योंकि नाटो देशों समेत ज्यादातर मजबूत मुल्कों ने यूक्रेन का साथ दिया है ऐसे में संभावना जताई जा रही थी कि अमेरिका ताइवान को ले कर अपना रुख स्पष्ट करेगा। एशिया मामलों के जानकार एशियन स्टडीज ऑफ जियो पॉलिटिकल सेगमेंट के पूर्व निदेशक डॉक्टर एचएन चारू कहते हैं कि चीन हमेशा से इस बात को लेकर संकेत देता रहता है कि जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के साथ भारतीय गठजोड़ कर बनाया गया क्वाड कहीं उसके लिए गले की हड्डी ना बन जाए। क्योंकि इंडो पैसिफिक रीजन में और एशिया के अलग-अलग क्षेत्रों में चीन अपनी ज्यादा दखलअंदाजी करता रहता था। ताइवान भी उसी का एक हिस्सा है।
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इतिहास गवाह है की Indo-Pacefic क्षेत्र के ट्रेड प्रभाव में भारत सदियों से एक प्रमुख केंद्र रहा है। विश्व का सबसे प्राचीन Commericial Port भारत में गुजरात के लोथल में था। -माननीय प्रधानमंत्री श्री @narendramodi जी। #PMModiInJapan

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- devusinh Chauhan (@devusinh) 23 May 2022

क्वॉड को मिनी नाटो बताता है चीन

डॉक्टर चारू कहते हैं कि चीन पहले से ही क्वाड को मिनी नाटो के तौर पर स्थापित करने की पुरजोर कोशिश करता रहता था। लेकिन इस संगठन की स्थापना की मायने बिल्कुल अलग थे। क्योंकि पूरी दुनिया को इस बात का अंदेशा है कि चीन ताइवान पर अपनी बुरी नजर पर लगाए हुए है, और कभी भी उस पर हमला कर सकता है। ऐसे में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन का खुले रुप से सैन्य हस्तक्षेप करने का बयान चीन को अखरने वाला ही है।



विदेशी मामलों के जानकार डॉ अभिषेक सिंह कहते हैं कि दरअसल अमेरिका ने टोक्यो से अपना संदेश स्पष्ट कर दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन की यह पहली एशिया यात्रा है और इस यात्रा को लेकर के चीन शुरुआत से ही किसी भी बैठक को फेल होने की लगातार अफवाहें उड़ाता रहा है। अभिषेक कहते हैं, जबकि हकीकत इससे विपरीत है। वह कहते हैं कि भारत, जापान के साथ मिलकर अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के सहयोग से इंडो पैसिफिक रीजन में इकोनॉमिक फ्रेमवर्क को मजबूत करना चाहता है। इसके अलावा भारत क्वाड की बैठक में टेक्नोलॉजी, कोविड से लड़ने के लिए वैक्सीन और पूरे इंडो पैसिफिक रीजन, जिसमें भारत की बढ़ती भूमिका और उसके समग्र विकास को लेकर चर्चा करना शामिल है। सिर्फ इन मुद्दों पर ही नहीं बल्कि भारत सप्लाई चेन, डिजिटल ट्रेड, क्लीन एनर्जी समेत समग्र विकास और क्लाइमेट चेंज जैसे मुद्दों पर बातचीत कर उनका न सिर्फ समाधान निकालना कर उस दिशा में आगे बढ़ कर अपने देश की अर्थव्यवस्था मजबूत करने के साथ-साथ पूरी दुनिया में व्यापारिक दृष्टिकोण से अव्यवस्थाओं को और सुगम बनाना है।

जापान और आस्ट्रेलिया को भायी भारत की सोच

अभिषेक कहते हैं कि अमेरिका भी इन्हीं मामलों पर बातचीत करेगा, लेकिन उसकी मंशा इसके अलावा और भी बहुत चीजों को लेकर के बनी हुई है। वे कहते हैं कि वह दो साल पहले तैयार किए गए आकस (AUKUS) ग्रुप के माध्यम से अपनी सैन्य ताकत को भी इस क्षेत्र में स्थापित करना चाहता है। हालांकि यह बात दीगर है भारत उसका फिलहाल हिस्सेदार नहीं है। अभिषेक कहते हैं भारत की अप्रोच जापान के प्रधानमंत्री और ऑस्ट्रेलिया के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री को विकास के लिहाज से न सिर्फ फायदेमंद लग रही है, बल्कि भारत के साथ विकास के मुद्दों पर द्विस्तरीय और त्रिस्तरीय वार्ता के लिए भी आगे का रोडमैप तैयार कर रहे हैं।

विदेशी मामलों के जानकार चारु कहते हैं कि भारत की ताकत इस लिहाज से भी और ज्यादा बड़ी है क्योंकि अमेरिका लगातार रूस और यूक्रेन के युद्ध की शुरुआत से ही भारत पर रूस के साथ व्यापारिक रिश्तों को कम करने का दबाव बनाता रहा है। लेकिन भारत ने रूस और यूक्रेन के मामले में अपना स्टैंड पूरी तरीके से साफ रखा है। इसी तरीके से ताइवान के मामले में जब अमेरिका ने अपना रुख स्पष्ट किया तो इनको तो निश्चित तौर पर यह बात चीन के लिए बड़े झटके जैसी थी। लेकिन भारत के स्पष्ट स्टैंड की वजह से अमेरिका और चीन को इस बात का अंदाजा हो गया कि भारत किसी दबाव में न आकर अपनी विदेश नीति को अपने देश के विकास के लिहाज से ही तय करेगा। भारत के विदेश सेवा से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों का मानना है कि यह रुख भारत को न सिर्फ जापान के साथ बेहतर स्तर पर आगे लेकर जाएगा, बल्कि ऑस्ट्रेलिया की विदेश नीति के साथ भी बेहतर तालमेल बिठाकर रखेगा।

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