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Punjab Election 2022: चुनाव हारे कैप्टन अब क्या करेंगे, कांग्रेस से अलग होकर पार्टी बनाने वाले दूसरे नेता कितने सफल हुए?
Thu, 10 Mar 2022 03:31 PM IST
प्रतिभा ज्योति
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: प्रतिभा ज्योति
Updated Thu, 10 Mar 2022 03:31 PM IST
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कैप्टन अमरिंदर सिंह
- फोटो :
अमर उजाला
विस्तार
कांग्रेस से अलग होकर नई पार्टी बनाकर चुनाव लड़ने वाले पंजाब के पूर्व सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह चुनाव हार गए हैं। पंजाब की पटियाला शहरी विधानसभा क्षेत्र से कैप्टन को आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार अजीत पाल सिंह कोहली ने मात दी है।पंजाब में कांग्रेस छोड़ने के बाद आखिरकार कैप्टन अमरिंदर सिंह ने नई पार्टी का एलान किया और पंजाब लोक कांग्रेस नाम से नई पार्टी का गठन किया। उन्होंने इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन किया और मिलकर चुनाव लड़े। लेकिन इस चुनाव में उन्हें कोई सफलता नहीं मिली। यानी कांग्रेस से निकलने के बाद कैप्टन के राजनीतिक करियर में फिलहाल एक ब्रेक लग गया है। हालांकि इस चुनाव में कांग्रेस को भी अपेक्षित सफलता नहीं मिली और आम आदमी पार्टी पंजाब की नंबर एक पार्टी बन गई है।
क्या होगा कैप्टन का राजनीतिक भविष्य?
कैप्टन अमरिंदर सिंह के राजनीतिक करियर के लिए यह चुनाव बेहद अहम था। इस चुनाव के जरिए वे यह साबित करना चाहते थे कि पंजाब की राजनीति में उनकी कितनी अहमियत है और कांग्रेस ने उन्हें पार्टी से निकाल कर क्या खोया है? लेकिन यह चुनाव अमरिंदर के लिए यह तो अच्छी खबर लेकर आई कि कांग्रेस सत्ता से बेदखल हो गई लेकिन वे खुद अपनी सीट नहीं बचा पाए।
कैप्टन इन चुनावों में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाते हैं, तो भाजपा के साथ मिलकर उनका राजनीतिक करियर एक ऊंचाई पर पहुंचता लेकिन अब उनके भविष्य पर जरूर सवाल उठेंगे जानकार बताते हैं कि अब कैप्टन को अपनी नई पार्टी के साथ पंजाब की राजनीति में नए तरीके से संघर्ष करना पड़ेगा। हालांकि इस संघर्ष में उनकी उम्र आड़े आ सकती है।
80 साल के अमरिंदर सिंह, साल 2017 में मुख्यमंत्री बनने के बाद यह एलान कर चुके थे कि वह अब दोबारा चुनाव नहीं लड़ेंगे। हालांकि बाद में उन्होंने अपना इरादा बदल दिया और कांग्रेस को सबक सिखाने के मकसद से अपनी अलग पार्टी बना ली।
सुभाष चंद्र बोस (फाइल फोटो)
- फोटो :
गूगल
कैप्टन अमरिंदर सिंह पहले ऐसे नेता नहीं है जिन्होंने कांग्रेस से नाराज होने के बाद नई पार्टी बनाई। उनसे पहले भी कई नेताओं ने कांग्रेस छोड़ कर अलग राह चुनी। लेकिन उनमें से महज कुछ ने ही सफलता का स्वाद चखा।
कब-कब टूटी कांग्रेस
देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस में अब तक 64 से ज्यादा बार टूट हुई हो चुकी है, जिनमें 16 टूट सफल रही है।
दो बार तो इंदिरा गांधी ने ही कांग्रेस तोड़ी और दोनों बार सफल रहीं। सोनिया गांधी के अध्यक्ष रहते सबसे ज्यादा फूट पड़ी है।
आजादी से पहले कांग्रेस दो बार टूटी। 1923 में चितरंज दास और मोतीलाल नेहरू ने कांग्रेस पार्टी छोड़ दी और स्वराज पार्टी बनाई।
1939 में महात्मा गांधी से नाराज होकर सुभाष चंद्र बोस ने ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्ल़ॉक पार्टी बनाई।
आजादी के बाद 1959 में कांग्रेस से टूट के बाद तीन नई पार्टियां बनी। किसान मजदूर प्रजा पार्टी, हैदराबाद स्टेट प्रजा पार्टी और स्वराज खेदूत संघ।
1956 से 1970 तक कांग्रेस से अलग कर 12 नई पार्टियां बनीं।
1967 में चौधरी चरणसिंह ने कांग्रेस से अलग होकर भारतीय क्रांति दल का गठन किया। बाद में यह लोकदल के नाम से जानी गई।
12 नवंबर 1969 के दिन कांग्रेस के मजबूत सिंडिकेट ने जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पार्टी से निकाल दिया तो उन्होंने नई पार्टी बनाई कांग्रेस (आर) बनाई।
कब-कब टूटी कांग्रेस
देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस में अब तक 64 से ज्यादा बार टूट हुई हो चुकी है, जिनमें 16 टूट सफल रही है।
दो बार तो इंदिरा गांधी ने ही कांग्रेस तोड़ी और दोनों बार सफल रहीं। सोनिया गांधी के अध्यक्ष रहते सबसे ज्यादा फूट पड़ी है।
आजादी से पहले कांग्रेस दो बार टूटी। 1923 में चितरंज दास और मोतीलाल नेहरू ने कांग्रेस पार्टी छोड़ दी और स्वराज पार्टी बनाई।
1939 में महात्मा गांधी से नाराज होकर सुभाष चंद्र बोस ने ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्ल़ॉक पार्टी बनाई।
आजादी के बाद 1959 में कांग्रेस से टूट के बाद तीन नई पार्टियां बनी। किसान मजदूर प्रजा पार्टी, हैदराबाद स्टेट प्रजा पार्टी और स्वराज खेदूत संघ।
1956 से 1970 तक कांग्रेस से अलग कर 12 नई पार्टियां बनीं।
1967 में चौधरी चरणसिंह ने कांग्रेस से अलग होकर भारतीय क्रांति दल का गठन किया। बाद में यह लोकदल के नाम से जानी गई।
12 नवंबर 1969 के दिन कांग्रेस के मजबूत सिंडिकेट ने जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पार्टी से निकाल दिया तो उन्होंने नई पार्टी बनाई कांग्रेस (आर) बनाई।
इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री रहते हुए कांग्रेस के नेताओं ने पार्टी से बाहर कर दिया था।
- फोटो :
सोशल मीडिया
सिंडिकेट के नेताओं ने कांग्रेस का नाम बदलकर इंडियन नेशनल कांग्रेस (ओ) कर दिया तो इंदिरा गांधी ने कांग्रेस को तोड़ते हुए फिर नई पार्टी कांग्रेस (आई) बनाई।
उसी समय 1969 में बीजू पटनायक ने उत्कल कांग्रेस और आंध्र प्रदेश में एम चेन्नारेड्डी ने तेलंगाना प्रजा समिति बनाई।
2009 में जगनमोहन रेड्डी ने अपने पिता वाई एस राजशेखर रेड्डी के नाम पर वाईएसआर कांग्रेस बना ली।
2016 में पार्टी एक बार फिर टूटी। इस बार कारण छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी थे। जोगी ने छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस बनाकर अपना रास्ता अलग कर लिया।
जो अलग पार्टियां बनी उनका क्या हुआ?
आजादी के बाद बनी कई पार्टियां खत्म हो चुकी हैं, जबकि कुछ आज भी अस्तित्व में हैं। महात्मा गांधी से अनबन होने पर सुभाष चंद्र बोस और शार्दुल सिंह ने ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक नाम से अलग पार्टी खड़ी कर ली। पश्चिम बंगाल में अभी भी ये पार्टी अस्तित्व में है। हालांकि, इसका जनाधार काफी कम हो चुका है।
कांग्रेस छोड़ने वाले नेताओं ने 1951 में तीन नई पार्टी खड़ी की। इसमें जीवटराम कृपलानी ने किसान मजदूर प्रजा पार्टी, तंगुतूरी प्रकाशम और एनजी रंगा ने हैदराबाद स्टेट प्रजा पार्टी और नरसिंह भाई ने सौराष्ट्र खेदूत संघ नाम से अलग राजनीतक दल शुरू किया।
उसी समय 1969 में बीजू पटनायक ने उत्कल कांग्रेस और आंध्र प्रदेश में एम चेन्नारेड्डी ने तेलंगाना प्रजा समिति बनाई।
2009 में जगनमोहन रेड्डी ने अपने पिता वाई एस राजशेखर रेड्डी के नाम पर वाईएसआर कांग्रेस बना ली।
2016 में पार्टी एक बार फिर टूटी। इस बार कारण छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी थे। जोगी ने छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस बनाकर अपना रास्ता अलग कर लिया।
जो अलग पार्टियां बनी उनका क्या हुआ?
आजादी के बाद बनी कई पार्टियां खत्म हो चुकी हैं, जबकि कुछ आज भी अस्तित्व में हैं। महात्मा गांधी से अनबन होने पर सुभाष चंद्र बोस और शार्दुल सिंह ने ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक नाम से अलग पार्टी खड़ी कर ली। पश्चिम बंगाल में अभी भी ये पार्टी अस्तित्व में है। हालांकि, इसका जनाधार काफी कम हो चुका है।
कांग्रेस छोड़ने वाले नेताओं ने 1951 में तीन नई पार्टी खड़ी की। इसमें जीवटराम कृपलानी ने किसान मजदूर प्रजा पार्टी, तंगुतूरी प्रकाशम और एनजी रंगा ने हैदराबाद स्टेट प्रजा पार्टी और नरसिंह भाई ने सौराष्ट्र खेदूत संघ नाम से अलग राजनीतक दल शुरू किया।
Congress symbol
- फोटो :
Social Media
इसमें हैदराबाद स्टेट प्रजा पार्टी का विलय किसान मजदूर प्रजा पार्टी में हो गया। बाद में किसान मजदूर प्रजा पार्टी का विलय प्रजा सोशलिस्ट पार्टी और सौराष्ट्र खेदूर संघ का विलय स्वतंत्र पार्टी में हो गया।
1969 में तो कांग्रेस के दिग्गज नेताओं ने इंदिरा गांधी को ही पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया था। तब इंदिरा ने अलग कांग्रेस बना ली थी। 1998 में ममता बनर्जी ने कांग्रेस छोड़कर ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस बना ली थी। वे पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री हैं।
इसके एक साल बाद ही शरद पवार, पीए संगमा और तारिक अनवर ने नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी का गठन कर लिया था। अब इसे एनसीपी के नाम से जाना जाता है। शरद पवार अभी भी इसके प्रमुख हैं। आखिरी बार 2016 में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के बड़े नेता रहे अजीत जोगी ने पार्टी छोड़कर छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस नाम से नया दल बना लिया।
सात सालों में 222 नेताओं ने कांग्रेस छोड़ी
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीएआर) के एक सर्वे के मुताबिक 2014 से 2021 के दौरान कुल सात सालों में 222 नेता कांग्रेस छोड़कर दूसरी पार्टियों में चले गए। इनमें 177 सांसद और विधायक हैं। 115 उम्मीदवार कांग्रेस में शामिल भी हुए हैं और उसमें 61 सांसद और विधायक हैं।
1969 में तो कांग्रेस के दिग्गज नेताओं ने इंदिरा गांधी को ही पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया था। तब इंदिरा ने अलग कांग्रेस बना ली थी। 1998 में ममता बनर्जी ने कांग्रेस छोड़कर ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस बना ली थी। वे पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री हैं।
इसके एक साल बाद ही शरद पवार, पीए संगमा और तारिक अनवर ने नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी का गठन कर लिया था। अब इसे एनसीपी के नाम से जाना जाता है। शरद पवार अभी भी इसके प्रमुख हैं। आखिरी बार 2016 में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के बड़े नेता रहे अजीत जोगी ने पार्टी छोड़कर छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस नाम से नया दल बना लिया।
सात सालों में 222 नेताओं ने कांग्रेस छोड़ी
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीएआर) के एक सर्वे के मुताबिक 2014 से 2021 के दौरान कुल सात सालों में 222 नेता कांग्रेस छोड़कर दूसरी पार्टियों में चले गए। इनमें 177 सांसद और विधायक हैं। 115 उम्मीदवार कांग्रेस में शामिल भी हुए हैं और उसमें 61 सांसद और विधायक हैं।
सी राजगोपालाचारी ने भी कांग्रेस छोड़ दी थी।
- फोटो :
सोशल मीडिया
जो कांग्रेस से अलग हुए उनमें कितने सफल हुए?
जिन नेताओं ने कांग्रेस से अलग होकर अपनी नई पार्टी बना ली, जरुरी नहीं कि सबकी राह आसान रही हो। कुछ नेताओं ने बाद में अपनी पार्टी का दूसरी पार्टियों में इसका विलय कर लिया। उदाहरण के लिए कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे सी राजगोपालाचारी ने 1956 में पार्टी छोड़ दी।
पार्टी छोड़ने के बाद उन्होंने इंडियन नेशनल डेमोक्रेटिक्स कांग्रेस पार्टी की स्थापना की। ये पार्टी मद्रास तक ही सीमित रही। हालांकि, बाद में राजगोपालाचारी ने एनसी रंगा के साथ 1959 में स्वतंत्र पार्टी की स्थापना कर ली और इंडियन नेशनल डेमोक्रेटिक्स पार्टी का इसमें विलय कर दिया।
1964 में केएम जॉर्ज ने केरल कांग्रेस नाम से नई पार्टी का गठन कर दिया। हालांकि, बाद में इस पार्टी से निकले नेताओं ने अपनी सात अलग-अलग पार्टी खड़ी कर ली।
इंदिरा से विवाद के चलते ही के. कामराज और मोरारजी देसाई ने इंडियन नेशनल कांग्रेस ऑर्गेनाइजेशन नाम से अलग पार्टी बनाई थी। बाद में इसका विलय जनता पार्टी में हो गया।
1969 में ही बीजू पटनायक ने ओडिशा में उत्कल कांग्रेस, आंध्र प्रदेश में मैरी चेना रेड्डी ने तेलंगाना प्रजा समिति का गठन किया।
वे नेता जो कांग्रेस से निकले लेकिन असफल रहे
कभी निजी राष्ट्रीय महात्वकांक्षा तो कभी उपेक्षा के कारण दर्जनों बार कद्दावर नेताओं ने पार्टी छोड़ी और कांग्रेस का सियासी विकल्प बनने की कोशिश की। जिनमें मुख्य तौर पर प्रणब मुखर्जी, जगजीवन राम, जी के मूपनार, नारायण दत्त तिवारी, अर्जुन सिंह, माधव राव सिंधिया, नारायणदत्त तिवारी, पी चिदंबरम, तारिक अनवर जैसे कुछ प्रमुख नाम हैं, जो कांग्रेस पार्टी छोड़कर तो गए लेकिन उन्हें वैसी सफलता नहीं मिली जिसकी उम्मीद में वे गए थे तो वे लौटकर कांग्रेस में ही आ गए।
जिन नेताओं ने कांग्रेस से अलग होकर अपनी नई पार्टी बना ली, जरुरी नहीं कि सबकी राह आसान रही हो। कुछ नेताओं ने बाद में अपनी पार्टी का दूसरी पार्टियों में इसका विलय कर लिया। उदाहरण के लिए कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे सी राजगोपालाचारी ने 1956 में पार्टी छोड़ दी।
पार्टी छोड़ने के बाद उन्होंने इंडियन नेशनल डेमोक्रेटिक्स कांग्रेस पार्टी की स्थापना की। ये पार्टी मद्रास तक ही सीमित रही। हालांकि, बाद में राजगोपालाचारी ने एनसी रंगा के साथ 1959 में स्वतंत्र पार्टी की स्थापना कर ली और इंडियन नेशनल डेमोक्रेटिक्स पार्टी का इसमें विलय कर दिया।
1964 में केएम जॉर्ज ने केरल कांग्रेस नाम से नई पार्टी का गठन कर दिया। हालांकि, बाद में इस पार्टी से निकले नेताओं ने अपनी सात अलग-अलग पार्टी खड़ी कर ली।
इंदिरा से विवाद के चलते ही के. कामराज और मोरारजी देसाई ने इंडियन नेशनल कांग्रेस ऑर्गेनाइजेशन नाम से अलग पार्टी बनाई थी। बाद में इसका विलय जनता पार्टी में हो गया।
1969 में ही बीजू पटनायक ने ओडिशा में उत्कल कांग्रेस, आंध्र प्रदेश में मैरी चेना रेड्डी ने तेलंगाना प्रजा समिति का गठन किया।
वे नेता जो कांग्रेस से निकले लेकिन असफल रहे
कभी निजी राष्ट्रीय महात्वकांक्षा तो कभी उपेक्षा के कारण दर्जनों बार कद्दावर नेताओं ने पार्टी छोड़ी और कांग्रेस का सियासी विकल्प बनने की कोशिश की। जिनमें मुख्य तौर पर प्रणब मुखर्जी, जगजीवन राम, जी के मूपनार, नारायण दत्त तिवारी, अर्जुन सिंह, माधव राव सिंधिया, नारायणदत्त तिवारी, पी चिदंबरम, तारिक अनवर जैसे कुछ प्रमुख नाम हैं, जो कांग्रेस पार्टी छोड़कर तो गए लेकिन उन्हें वैसी सफलता नहीं मिली जिसकी उम्मीद में वे गए थे तो वे लौटकर कांग्रेस में ही आ गए।
शरद पवार, ममता बनर्जी, जगनमोहन रेड्डी
- फोटो :
Amar Ujala
जो कांग्रेस से निकले और सफल हो गए
लेकिन कुछ नाम ऐसे हैं जिन्होंने न केवल अलग पार्टी बनाने का जोखिम उठाया बल्कि हर चुनौती भी स्वीकार की। ममता बनर्जी, शरद पवार और जगन मोहन रेड्डी जैसे नेताओं ने अपनी क्षेत्रीय पार्टी बना कर सियासी परचम तो लहराया ही, कामयाबी की नई इबारत भी लिखी।
ममता बनर्जी
कई मुद्दों पर कांग्रेस से मनमुटाव होने पर करीब 25 साल वहां रहने के बाद ममता बनर्जी 1998 में पार्टी से अलग हो गईं। उन्होंने तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की। यह पार्टी जल्द ही राज्य की मुख्य विपक्षी दल बन गई। काफी संघर्ष के बाद ममता बनर्जी की पार्टी को बंगाल में सत्ता 2011 में हासिल हुई। 2011 में उन्होंने पश्चिम बंगाल में 34 सालों से सत्ता पर काबिज वामपंथी मोर्चे का सफाया कर दिया। पांच मई 2021 को उन्होंने तीसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। जबकि कांग्रेस बंगाल में अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करती दिख रही है।
शरद पवार
1999 में शरद पवार ने सोनिया गांधी के नेतृत्व को चुनौती दी। पवार, पीए संगमा और तारिक अनवर जैसे बड़े नेताओं ने सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने का विरोध किया। जिसके बाद उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया। तीनों ने मिलकर पांच मई 1999 को राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का गठन कर लिया। हालांकि पवार ने अलग पार्टी तो बना ली लेकिन राष्ट्रीय महात्वाकांक्षा के कारण वे कांग्रेस के साथ चलते रहे हैं।
शरद पवार ने दो बार कांग्रेस छोड़ी, लेकिन बाद में उसी का समर्थन किया। पवार अब महाराष्ट्र की सियासत के बड़े क्षेत्रीय छत्रप होने के कारण राष्ट्रीय राजनीति में भी प्रासंगिक बने हुए हैं, लेकिन संगमा ने जब देखा कि एनसीपी केवल महाराष्ट्र तक की राजनीति में सिमटी है तो वे मेघालय में क्षेत्रीय राजनीति करने लगे। जबकि तारिक अनवर ने पिछले लोकसभा चुनाव से पहले घर वापसी कर ली है।
जगन मोहन रेड्डी
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी ने कांग्रेस से अलग होकर अपनी क्षेत्रीय पार्टी वाईएसआर कांग्रेस बनाकर अपना सियासी परचम लहराया है। उनके पिता और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री वाई एस राजशेखर रेड्डी का सितम्बर 2009 में एक हवाई दुर्घटना में निधन होने के बाद जगन उनकी जगह खुद मुख्यमंत्री बनने का दावा करने लगे। जिसकी वजह से कांग्रेस उनके खिलाफ हो गई।
कांग्रेस की परवाह किए बिना पिता के विराट जनसमर्थन के सहारे खुद की अपनी अलग पार्टी बनाई। हालांकि इस राह में कई अड़चनें भी आईं और उनकी पार्टी को राज्य में काफी संघर्ष करना पड़ा, लेकिन अभी राज्य की कमान उनके हाथों में है। बहुत ही कम समय में वाईएसआर कांग्रेस ने कांग्रेस को राज्य में पीछे धकेल दिया।
लेकिन कुछ नाम ऐसे हैं जिन्होंने न केवल अलग पार्टी बनाने का जोखिम उठाया बल्कि हर चुनौती भी स्वीकार की। ममता बनर्जी, शरद पवार और जगन मोहन रेड्डी जैसे नेताओं ने अपनी क्षेत्रीय पार्टी बना कर सियासी परचम तो लहराया ही, कामयाबी की नई इबारत भी लिखी।
ममता बनर्जी
कई मुद्दों पर कांग्रेस से मनमुटाव होने पर करीब 25 साल वहां रहने के बाद ममता बनर्जी 1998 में पार्टी से अलग हो गईं। उन्होंने तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की। यह पार्टी जल्द ही राज्य की मुख्य विपक्षी दल बन गई। काफी संघर्ष के बाद ममता बनर्जी की पार्टी को बंगाल में सत्ता 2011 में हासिल हुई। 2011 में उन्होंने पश्चिम बंगाल में 34 सालों से सत्ता पर काबिज वामपंथी मोर्चे का सफाया कर दिया। पांच मई 2021 को उन्होंने तीसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। जबकि कांग्रेस बंगाल में अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करती दिख रही है।
शरद पवार
1999 में शरद पवार ने सोनिया गांधी के नेतृत्व को चुनौती दी। पवार, पीए संगमा और तारिक अनवर जैसे बड़े नेताओं ने सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने का विरोध किया। जिसके बाद उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया। तीनों ने मिलकर पांच मई 1999 को राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का गठन कर लिया। हालांकि पवार ने अलग पार्टी तो बना ली लेकिन राष्ट्रीय महात्वाकांक्षा के कारण वे कांग्रेस के साथ चलते रहे हैं।
शरद पवार ने दो बार कांग्रेस छोड़ी, लेकिन बाद में उसी का समर्थन किया। पवार अब महाराष्ट्र की सियासत के बड़े क्षेत्रीय छत्रप होने के कारण राष्ट्रीय राजनीति में भी प्रासंगिक बने हुए हैं, लेकिन संगमा ने जब देखा कि एनसीपी केवल महाराष्ट्र तक की राजनीति में सिमटी है तो वे मेघालय में क्षेत्रीय राजनीति करने लगे। जबकि तारिक अनवर ने पिछले लोकसभा चुनाव से पहले घर वापसी कर ली है।
जगन मोहन रेड्डी
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी ने कांग्रेस से अलग होकर अपनी क्षेत्रीय पार्टी वाईएसआर कांग्रेस बनाकर अपना सियासी परचम लहराया है। उनके पिता और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री वाई एस राजशेखर रेड्डी का सितम्बर 2009 में एक हवाई दुर्घटना में निधन होने के बाद जगन उनकी जगह खुद मुख्यमंत्री बनने का दावा करने लगे। जिसकी वजह से कांग्रेस उनके खिलाफ हो गई।
कांग्रेस की परवाह किए बिना पिता के विराट जनसमर्थन के सहारे खुद की अपनी अलग पार्टी बनाई। हालांकि इस राह में कई अड़चनें भी आईं और उनकी पार्टी को राज्य में काफी संघर्ष करना पड़ा, लेकिन अभी राज्य की कमान उनके हाथों में है। बहुत ही कम समय में वाईएसआर कांग्रेस ने कांग्रेस को राज्य में पीछे धकेल दिया।