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पुलवामा आतंकी हमला: महिला कांस्टेबलों ने सुनाई उस दिन की दर्दनाक दास्तां
Mon, 25 Feb 2019 09:32 AM IST
Sneha Baluni
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, श्रीनगर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, श्रीनगर
Published by: Sneha Baluni
Updated Mon, 25 Feb 2019 09:32 AM IST
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आतंकी हमले के बाद तैनात सुरक्षाकर्मी
- फोटो : PTI
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14 फरवरी को जम्मू कश्मीर के पुलवामा में आत्मघाती हमला हुआ था जिसमें कि सीआरपीएफ के 40 जवान शहीद हो गए थे। इस घटना को सीआरपीएफ की बेमिना बटालियन की 28 साल की कांस्टेबल शालू ने अपनी आंखों से देखा था। वह उन 30 महिला कांस्टेबल में शामिल थीं जो उस काफिले का हिस्सा था जिसे आतंकियों ने निशाना बनाया। उस घटना को याद करते हुए शालू की आंखों में आंसू आ जाते हैं। उनका परिवार इस समय 9 मार्च को राजौरी में उनकी होने वाली शादी की तैयारियां कर रहा है।
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शालू ने बताया जिस बस को आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के आत्मघाती हमलावर आदिल अहमद डार ने निशाना बनाया उसके तीसरे नंबर पर उनकी बस चल रही थी। उन्होंने कहा, 'जब बस को उड़ते हुए देखा तो एकदम घबरा गए। एकदम से खून खौला और कहा कि अब से सामने आ जाए तो उसको मार डालेंगे। मैं उस समय अपनी होने वाली सास से बात कर रही थी जब धमाका हुआ। वह समझ गईं क्योंकि मेरे मंगेतर भारतीय सेना में काम करते हैं और गुजरात में तैनात हैं। हमारी हमेशा सबसे पहली ड्यूटी देश की सेवा करना है।'
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शालू ने बताया कि कैसे जब 2012 में उन्हें सीआरपीएफ की नौकरी मिली थी तो वह खुशी के मारे उछलने लगी थीं। वहीं दूसरी 38 साल की कांस्टेबल पुष्पा को इस बात का दुख है कि जब हमलावर ने बस को उड़ाया उस समय उनके पास कोई हथियार नहीं था। 14 फरवरी को ही वह चार दिन की छुट्टी के बाद ड्यूटी पर लौटी थीं। उन्होंने कहा, 'काश मेरे पास मेरा हथियार होता और मैं अपने साथियों पर हमला करने से पहले उसे मार सकती।'
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इस समय जम्मू-कश्मीर में सीआरपीएफ की महिलाओं की चार कंपनियां तैनात हैं। जिन्हें बहुत सारी बटालियनों से लाया गया है। इससे पहले यह महिलाएं शंकराचार्य मंदिर, केंद्रीय कारागार, अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों, उच्च न्यायालयों और श्रीनगर के सरकारी दफ्तरों में तैनात थीं। 1986-87 के बाद से सीआरपीएफ में बहुत बदलाव आया है। पहली बार महिला बटालियन को स्थापित किया गया और 6 महिला अधिकारियों को भर्ती किया गया।