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मशहूर कवि केदारनाथ सिंह नहीं रहे... कि अंत महज एक मुहावरा है

Tue, 20 Mar 2018 06:06 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Tue, 20 Mar 2018 06:06 AM IST
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prominent poet kedarnath singh passes away in delhi aiims hospital 
आधुनिक हिंदी साहित्य के मशहूर कवि और लेखक केदारनाथ सिंह का दिल्ली के एम्स में निधन

आधुनिक कविता के सशक्त हस्ताक्षर और लेखक केदारनाथ सिंह का सोमवार रात 9:10 बजे एम्स में निधन हो गया। यूपी के बलिया जिले के चकिया गांव में 1934 को जन्मे सिंह को 2013 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। सांस की तकलीफ के कारण उन्हें 13 मार्च को एम्स के पल्मोनरी मेडिसिन विभाग में भर्ती किया गया था। ‘अंत महज एक मुहावरा है’ और ‘दिन के इस सुनसान पहर में रुक सी गई प्रगति जीवन की’ के रचयिता को ‘यह जानते हुए कि जाना हिंदी की सबसे खौफनाक क्रिया है’ बचाया न जा सका। 

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उनका अंतिम संस्कार मंगलवार को दिल्ली के लोधी रोड स्थित शमशान घाट पर होगा। एम्स से मिली जानकारी के अनुसार, उन्हें संक्रमण की शिकायत भी थी। डॉक्टरों का कहना है कि 86 वर्षीय केदार नाथ काफी समय से बीमारी से जूझ रहे थे। केदार नाथ सिंह हिंदी कविता में नए बिंबों के प्रयोग के लिए जाने जाते हैं। बीएचयू से 1956 में हिंदी में एमए और 1964 में पीएचडी करने वाले सिंह ज्ञानपीठ पुरस्कार पाने वाले वह हिंदी के 10वें लेखक हैं। इसके अलावा उन्हें मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, कुमारन आशान पुरस्कार, जीवन भारती सम्मान, दिनकर पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, व्यास सम्मान पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है।
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केदारनाथ सिंह को वर्ष 2013 में भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार पाने वाले वह हिंदी साहित्य के 10वें लेखक थे। उनकी मौत की खबर से साहित्य जगत में शोक की लहर है। 
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केदारनाथ सिंह की एक कविता पढ़ें - 

अंत महज एक मुहावरा है

अंत में मित्रों,
इतना ही कहूंगा
कि अंत महज एक मुहावरा है
जिसे शब्द हमेशा 
अपने विस्फोट से उड़ा देते हैं
और बचा रहता है हर बार
वही एक कच्चा-सा
आदिम मिट्टी जैसा ताजा आरंभ
जहां से हर चीज
फिर से शुरू हो सकती है

हिंदी जगत का सबसे बड़ा सम्मान मिला

prominent poet kedarnath singh passes away in delhi aiims hospital 
वह अज्ञेय द्वारा संपादित तीसरा सप्तक के कवि रहे। उनकी प्रमुख रचनाओं में अभी बिल्कुल अभी, जमीन पक रही है, अकाल में सारस, तालस्तॉय और साइकिल, बाघ तथा सृष्टि में पहरा शामिल हैं। उन्होंने बनारस विश्वविद्यालय से 1956 में हिंदी में एमए और 1964 में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की।वह जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में भारतीय भाषा केंद्र में बतौर आचार्य और अध्यक्ष काम कर चुके हैं।

जन्म : सात जुलाई 1934 में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के चकिया गांव में
शिक्षा : बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से 1956 में हिंदी से एमए, 1964 में पीएचडी
नौकरी : कई कॉलेजों में शिक्षण का काम किया। अंत में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से हिंदी के विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हुए

प्रमुख कृतियां
कविता संग्रह : अभी बिल्कुल नहीं, जमीन पक रही है, यहां से देखो, बाघ, अकाल में सारस, उत्तर कबीर और अन्य कविताएं, तालस्टाय और साइकिल
आलोचना : कल्पना और छायावाद, आधुनिक हिंदी कविता में बिंबविधान, मेरे समय के शब्द, मेरे साक्षात्कार
संपादन : ताना-बाना (आधुनिक भारतीय कविता से एक चयन), समकालीन रूसी कविताएं, कविता दशक, साखी (अनियतकालिक पत्रिका), शब्द (अनियतकालिक पत्रिका) 

सम्मान और पुरस्कार
ज्ञानपीठ पुरस्कार, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, कुमारन आशान पुरस्कार, जीवन भारती सम्मान, दिनकर पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, व्यास सम्मान

तीसरा सप्तक के लोकप्रिय कवि
1959 में प्रकाशित चर्चित कविता संग्रह तीसरा सप्तक के लोकप्रिय कवि केदारनाथ सिंह थे। अज्ञेय ने उनकी कविताओं को इसमें जगह दी थी और वह इसे चर्चा में आए थे। 

सर्दियों में बहन से मिलने कोलकाता जाते थे: मंडलोई

prominent poet kedarnath singh passes away in delhi aiims hospital 
भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक लीलाधर मंडलोई ने बताया कि केदारनाथ सिंह हर बार सर्दियों में अपनी बहन से मिलने कोलकाता जाते थे। पिछले कुछ दिनों से वह निमोनिया से पीड़ित थे। एम्स में भर्ती करने से पहले साकेत और मूलचंद अस्पतालों में भी उनका इलाज कराया गया था। 

मंडलोई ने बताया कि केदारनाथ सिंह हिंदी साहित्य के शीर्ष तीन कवियों में से एक थे। उन्होंने मेरे समय के शब्द, कल्पना और छायावाद, हिंदी कविता में बिंब विधान, कब्रिस्तान में पंचायत समेत कई मशहूर कहानियां और लेख भी लिखे।

मंडलोई के मुताबिक, वह उन कवियों में शुमार थे, जिनकी अपनी राजनीति है। वह सादगी पसंद कवि थे। उनके परिवार में एक बेटा और पांच बेटियां हैं। 
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