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बढ़ते तापमान और पेड़ों की कटाई से दुनिया को भारी नुकसान, पक्षी, मौसम सब हो रहे प्रभावित

Sat, 09 Mar 2019 04:06 PM IST
Shilpa Thakur न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: Shilpa Thakur Updated Sat, 09 Mar 2019 04:06 PM IST
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Problems in the world due to increasing temperature
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : pexels.com

जलवायु परिवर्तन के इस दौर में बढ़ते तापमान के कारण दुनिया को कई प्रकार की मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा है। कहीं जीवों की प्रजातियां लुप्त होती जा रही हैं को कहीं कचरा और प्लास्टिक बड़ी समस्या बन रही है। तो चलिए जानते हैं कि दुनिया में किस प्रकार की समस्याएं बढ़ती जा रही हैं-

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जलवायु परिवर्तन के इस दौर में बढ़ते तापमान के कारण दुनिया को कई प्रकार की मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा है। कहीं जीवों की प्रजातियां लुप्त होती जा रही हैं को कहीं कचरा और प्लास्टिक बड़ी समस्या बन रही है। तो चलिए जानते हैं कि दुनिया में किस प्रकार की समस्याएं बढ़ती जा रही हैं-

तापमान बढ़ने से नुकसान

कोलंबिया यूनिवर्सिटी में किए गए एक अध्ययन में पता चला है कि वायुमंडल का तापमान बढ़ने से पेड़ों की कार्बन डाईऑक्साइड आदि गैसों को सोखने की क्षमता कम होती जा रही है। माना जाता है कि मानव द्वारा उत्सर्जित की जा रही इन गैसों का चौथाई हिस्सा पेड़ और मिट्टी सोख लेते हैं। लेकिन लगातार बढ़ रहे तापमान के कारण इनकी सोखने की क्षमता कम होती जा रही है।

तापमान वृद्धि का असर जलीय जीवों पर भी पड़ रहा है। समुद्र का तापमान बढ़ने से जलीय जीवों में आश्चर्यजनक बदलाव देखने को मिल रहे हैं। जर्नल सिमेट्री में प्रकाशित शोध में पता चला है कि बढ़ते तापमान के कारण शार्क अपने रास्ते से भटक रही हैं। ऑस्टेलियाई वैज्ञानिकों का दावा है कि समुद्र का तापमान बढ़ने से शार्क के तैरने की दिशा पर फर्क पड़ रहा है।

खत्म होती जा रही प्रजातियां

दुनिया के सबसे बड़े जैव विविधता वाले बॉटेनिकल पार्क क्यू गार्डन में वैज्ञानिकों द्वारा की गई खोज में पता चला है कि दुनिया में सबसे ज्यादा पी जाने वाली जंगली कॉफी अरेबिका और रोबस्टा समेत कई कॉफी की 60 फीसदी प्रजातियां खत्म होती जा रही हैं। जंगलों के कटने के कारण जंगली कॉफी की 124 में से 75 प्रजातियां लुप्त होने की कगार पर हैं। 

कचरा प्रबंधन बड़ी समस्या

प्रतीकात्मक तस्वीर
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : pexels.com
अर्थ साइंस कॉन्फ्रेंस द्वारा जारी की गई रिपोर्ट में पता चला है कि 88 वर्ग किलोमीटर भूमि की जरूरत सिर्फ कचरा प्रबंधन के लिए होगी। इसका स्तर लगातार बड़ रहा है।

वहीं प्लास्टिक कंपोस्ट करने वाली केवल एक इकाई है, ये इकाइ उत्तर प्रदेश राज्य में स्थित है। साथ ही करीब 312 गैर पंजीकृत प्लास्टिक कारखाने चल रहे हैं। इनपर कोई रोक नहीं है।

पानी में जहरीले शैवालों की संख्या बढ़ रही है

अर्थ साइंस कॉन्फ्रेंस की रिपोर्ट से पता चला है कि जलवायु परिवर्तन के कारण पूर्वी अंटार्कटिका में ग्लेशियर पिघल रहे हैं। बर्फ के पिघलने से तापमान में वृद्धि हो रही है। जिसके कारण पानी में जहरीले शैवालों की संख्या बढ़ रही है। हालात इतने खराब हो चुके हैं कि 30 सालों में आर्कटिक ध्रुव पर बर्फ की मोटाई 95 फीसदी तक कम हो चुकी है।

समय से पहले आया बसंत

जलवायु परिवर्तन का असर मौसम पर भी पड़ रहा है। बसंत ऋतु भी समय पर देखने को नहीं मिल रही है। इसका एक उदाहरण है ब्रिटेन में समय से पहले बसंत ऋतु का आ जाना। यहां के कई शहरों में वक्त से पहले बसंत ऋतु देखी गई। यहां बसंत में खिलने वाले फूल पहले ही दिखाई देने लगे। 

बदलते मौसम को लेकर पौधे और प्रकृति के संरक्षण के लिए काम करने वाली संस्था वुडलैंड ट्रस्ट का कहना है कि इस बात का अंदाजा नवंबर में ही लगा लिया जाता है कि मौसम कैसे बदलेगा और कब बदलेगा। इसका पता तापमान बढ़ने से फूलों के आसपास कीटों के मंडराने से लगाया जाता है।

अधिक मात्रा में आ सकते हैं तूफान

प्रतीकात्मक तस्वीर
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : pexels.com
बढ़ते तापमान का असर तूफानों की बढ़ती संख्या के तौर पर देखा जा सकता है। नासा के एक अध्ययन में पता चला है कि उष्णकटिबंधीय महासागरों का तापमान बढ़ने से सदी के अंत में बारिश के साथ भयंकर तूफान आने की दर बढ़ सकती है। इस अध्ययन में उष्णकटिबंधीय महासागरों के ऊपर अंतरिक्ष एजेंसी के वायुमंडलीय इन्फ्रारेड साउंडर के उपकरण द्वारा अधिग्रहित 15 वर्षों के आकंड़ों का अध्ययन किया गया।

प्लास्टिक भी बन रही समस्या

वर्ल्ड वाइड फंड द्वारा जारी एक रिपोर्ट में पता चला है कि प्लास्टिक आने वाले सालों में एक बड़ी समस्या बनता जा रहा है। साल 2030 तक प्लास्टिक प्रदूषण दोगुना हो जाएगा। इस रिपोर्ट में पता चला है कि 1950 से 2016 के बीच जितना प्लास्टिक जमा हुआ है, उतना अगले एक दशक में जमा होने की आशंका है।

जिसके चलते प्लास्टिक का कचरा महासागरों में 30 करोड़ टन तक पहुंच जाएगा। वहीं माना जा रहा है कि समुद्र में 2030 तक प्लास्टिक दहन पर कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन तिगुना हो जाएगा। इससे हृदय संंबंधी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं।

भारत दुनिया में ऐसा तीसरा देश है जो सबसे ज्यादा प्लास्टिक का उपयोग करता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की वार्षिक रिपोर्ट 2015-16 के अनुसार भारत में हर साल 15 लाख टन से अधिक प्लास्टिक का उत्पादन होता है। यहां अलग-अलग प्रदेशों में कुल इकाइयां 2243 हैं। 


पक्षियों की संख्या घट रही है

पक्षी भी जलवायु परिवर्तन के कारण प्रभावित हो रहे हैं। इनकी संख्या घटती जा रही है। ब्लैक गिलिमॉट चिड़िया पर रिसर्च कर रहे पक्षीविज्ञानी जॉर्ज डिवोकी का कहना है कि बीते छह माह में कई बदलाव देखे गए हैं। बीते साल ब्लैक गिलिमॉट के जोड़ों ने 225 घोसले बनाए थे लेकिन इस साल केवल 85 पक्षी ही आईलैंड पहुंच पाए हैं।
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