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SC: 'जमानत पर रिहा बुजुर्ग आरोपियों की दोषसिद्धि के खिलाफ अपील को दें प्राथमिकता', कोर्ट की 'सुप्रीम' टिप्पणी

Fri, 21 Mar 2025 08:45 PM IST
पवन पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: पवन पांडेय Updated Fri, 21 Mar 2025 08:45 PM IST
सार

देश की सर्वोच्च अदालत ने सभी हाईकोर्ट को सलाह दी कि वे उन आपराधिक अपीलों को पर्याप्त प्राथमिकता दें, जहां आरोपी जमानत पर हैं। कोर्ट ने इस दौरान कहा कि आमतौर पर उन अपीलों पर सुनवाई को प्राथमिकता दी जाती है, जहां आरोपी जेल में है।

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Prioritise criminal appeals against conviction of aged accused on bail: SC, News in hindi
Supreme Court - फोटो : PTI

विस्तार

देश की सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि अभियुक्त की अधिक आयु और अपराध किए जाने के बाद से काफी समय बीत जाने के कारण, जमानत पर रिहा अभियुक्तों की दोषसिद्धि के खिलाफ अपील को प्राथमिकता दी जा सकती है। उच्च न्यायालयों में दोषसिद्धि और दोषमुक्ति के खिलाफ आपराधिक अपीलों के लंबित मामलों को ध्यान में रखते हुए, शीर्ष अदालत ने कहा कि दोषसिद्धि के खिलाफ कुछ पुरानी आपराधिक अपीलों पर सुनवाई करके सही संतुलन बनाना होगा, जिनमें अभियुक्त जमानत पर हैं।
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सुनवाई के दौरान पीठ की टिप्पणी
मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति अभय एस ओका, न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा, 'इसलिए यह वांछनीय है कि दोषसिद्धि के खिलाफ अपील की कुछ श्रेणियों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जहां आरोपी जमानत पर हैं। मामले में पीठ ने कहा कि बहुत पुरानी आपराधिक अपीलों के लंबित रहने को देखते हुए, आमतौर पर उन अपीलों की सुनवाई को प्राथमिकता दी जाती है जहां आरोपी जेल में हैं।
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'आरोपी को लंबी अवधि के बाद वापस जेल भेजने का सवाल उठता'
पीठ ने कहा, 'आरोपी की वृद्धावस्था और अपराध को अंजाम दिए जाने के बाद से काफी समय बीत जाने के कारण जमानत पर आरोपी की दोषसिद्धि के खिलाफ अपील को प्राथमिकता देने के लिए हमेशा आधार उपलब्ध हो सकता है।' पीठ ने आगे कहा कि यदि दोषसिद्धि के खिलाफ अपील, जहां आरोपी जमानत पर हैं और विशेष रूप से जहां आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है, उनकी फाइलिंग के एक दशक या उससे अधिक समय बाद सुनी जाती है और खारिज कर दी जाती है, तो आरोपी को लंबी अवधि के बाद वापस जेल भेजने का सवाल उठता है। 


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पीठ ने 20 मार्च के अपने फैसले के बाद कहा, 'हमारे देश के सभी प्रमुख उच्च न्यायालयों में दोषसिद्धि और बरी किए जाने के खिलाफ आपराधिक अपीलों की एक बड़ी संख्या लंबित है।' यह फैसला मध्य प्रदेश राज्य की तरफ से उच्च न्यायालय के अगस्त 2017 के फैसले को चुनौती देने वाली अपील पर आया। उच्च न्यायालय ने हत्या के लिए कुछ लोगों की दोषसिद्धि को खारिज कर दिया था और उन्हें भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 304 के दूसरे भाग के तहत दोषी ठहराया था। आईपीसी की धारा 304 गैर इरादतन हत्या के लिए सजा से संबंधित है।

क्या है पूरा मामला?
शीर्ष अदालत ने कहा कि उच्च न्यायालय ने पाया कि घटना 1989 की है और प्रतिवादियों में से एक की उम्र करीब 80 साल है, जबकि चार अन्य की उम्र 70 साल से अधिक है। उच्च न्यायालय ने उन्हें पहले ही सजा काट लेने के बाद छोड़ दिया था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपियों ने भैंस की पूंछ काटने के आरोप में छह लोगों पर हमला किया था और उनमें से एक की बाद में मौत हो गई थी। राज्य के वकील ने शीर्ष अदालत में दलील दी थी कि आरोपियों को केवल 76 दिनों की सजा काट लेने के बाद छोड़ दिया गया।

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