PM Modi Ukraine Visit: यूक्रेन से क्या लेकर लौटेंगे प्रधानमंत्री मोदी, युद्ध के बीच समाधान की कितनी उम्मीद?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पोलैंड की यात्रा पर हैं। वहां से यूक्रेन की राजधानी कीव जाएंगे। बड़ा सवाल यही है कि यूक्रेन से प्रधानमंत्री मोदी क्या लेकर लौटेंगे? इस सवाल के जवाब में विशेषज्ञों की अलग-अलग राय है।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पोलैंड की यात्रा पर हैं। वहां से यूक्रेन की राजधानी कीव जाएंगे। कीव में राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की से मिलेंगे। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यूक्रेन से प्रधानमंत्री मोदी क्या लेकर लौटेंगे? इस सवाल के जवाब में विशेषज्ञों की अलग-अलग राय है। हालांकि, प्रधानमंत्री के साथ एक संक्षिप्त प्रतिनिधि मंडल भी गया है। माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की के साथ भेंट के दौरान आपसी हितों के अलावा क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा करेंगे।
इस समय रूस और यूक्रेन के अलावा इस्राइल और ईरान में तनाव चरम पर चल रहा है। पूरी दुनिया ईरान की प्रतिक्रिया पर टकटकी लगाए बैठी है। अमेरिका, ईरान की इस्राइल पर प्रतिक्रिया की संभावना को रोकने के हर उपाय में जुटा है। ऐसे में जेलेंस्की से मुलाकात के बाद प्रधानमंत्री मोदी एक बार फिर युद्ध को मानवता और विश्व के विकास में बाधक होने संबंधी बयान दे सकते हैं।
रूस और यूक्रेन में भीषण लड़ाई की आशंका
रक्षा मामलों के जानकार विनोद शर्मा कहते हैं कि मास्को में यूक्रेन ने ड्रोन से हमले की कोशिश की और उन्हें रूस की सेनाओं ने मार गिराया। यूक्रेन की सेना रूस के 1000 वर्ग किमी क्षेत्र में घुस आई है। रूस इसका जवाब देने की रणनीति में जुटा है। रूस की सेनाएं चारों तरफ से यूक्रेन की सेना को घेर रही हैं। राष्ट्रपति पुतिन चेचेन्या के दौरे पर हैं। वे वहां लड़ाकों की संभावना टटोलने गए हैं। चेचेन्या के स्वयं सेवक लड़ाके यूक्रेन और रूस, दोनों की तरफ से लड़ रहे हैं। रूस की तरफ से लड़ने वाले लड़ाकों की संख्या 40 हजार से अधिक बताई जा रही है। तमाम लड़ाके अभी प्रशिक्षण ले रहे हैं और इनके जल्द ही रूस की तरफ से यूक्रेन के खिलाफ लड़ने की संभावना है।
विनोद शर्मा बताते हैं कि रूस के सामने गोला-बारूद, जमीनी युद्ध के लिए सैनिकों आदि की समस्या खड़ी हो रही है। लेकिन रूस के पास अपनी साख बचाने की चुनौती इससे भी बड़ी है। आगे दोनों देशों में भीषण लड़ाई होने की आशंका है। रूस प्रतिक्रिया में बड़ी सैन्य कार्रवाई कर सकता है। इसलिए फिलहाल रूस और यूक्रेन में कोई युद्ध विराम की संभावना नहीं है। भारत की इस मामले में भूमिका भी बहुत सीमित होने की ही गुंजाइश है। प्रधानमंत्री मोदी रूस गए थे। राष्ट्रपति पुतिन से उनकी रूस की सेना में रोजगार के नाम पर शामिल किए गए भारतीय सैनिकों की वापसी को लेकर चर्चा हुई थी। अभी तक रूस ने इन भारतीयों को भारत को नहीं सौंपा है। कहने का अर्थ यह कि भारत का महत्व है, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में समाधान की बहुत ज्यादा उम्मीद लगाना ठीक नहीं है।
क्या लेकर लौटेंगे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी?
23 अगस्त को राष्ट्रपति जेलेंस्की के साथ संभावित वार्ता में भारत और यूक्रेन के बीच में कई मुद्दों पर चर्चा की संभावना है। दोनों देश आपसी हितों, सहयोग बढ़ाने के उपायों पर भी चर्चा करेंगे। सोवियत संघ का हिस्सा होने के दौरान यूक्रेन मशीनरी क्षेत्र का मुख्य केंद्र था। परिवहन विमानों के निर्माण में अग्रणी भूमिका थी। भारतीय वायुसेना का परिवहन विमान एएन-32 का का मुख्य कारखाना भी यूक्रेन में ही है। तमाम युद्धपोत, भारी इंजन, मशीनरी के मामले में भी यूक्रेन का कोई जवाब नहीं। ऐसे में प्रधानमंत्री यूक्रेन के साथ अर्थ, विज्ञान, रक्षा क्षेत्र में साजो-सामान समेत तमाम आपसी हित के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा कर सकते हैं।
भारत दशकों से युद्धपोत, पनडुब्बी आदि के इंजन बनाने में लगा है। इस दिशा में भी चर्चा हो सकती है, लेकिन पूर्व एयर वाइस मार्शल एनबी सिंह कहते हैं कि हमारे रक्षा हार्ड वेयर का बड़ा हिस्सा रूस से आया है। इसलिए यूक्रेन से रिश्ते की शर्त पर भारत रूस को निराश नहीं कर सकता। विदेश मामलों के वरिष्ठ पत्रकार रंजीत कुमार कहते हैं कि प्रधानमंत्री ने यात्रा का यही समय क्यों चुना और इस यात्रा के पीछे मुख्य रणनीतिकार कौन है, यह बड़ा सवाल है।
यूक्रेन की बहुत बड़ी क्षमता नहीं
सोवियत संघ का हिस्सा रहे यूक्रेन के पास परमाणु संयंत्र केन्द्र और शस्त्रागार हैं, लेकिन रूस के मुकाबले उसकी ताकत बहुत सीमित है। यूक्रेन के अलग होने के समय उसे करीब 7,80,000 सैनिक मिले थे। जमीनी सेना, वायुसेना, नौसेना, वायु आक्रमण बल, मरीन कॉर्प्स, विशेष ऑपरेशन बल, मानव रहित बल प्रणाली और प्रदेश रक्षा बल को मिलाकर यूक्रेन के पास करीब 10 लाख सैन्य कर्मी हो सकते हैं। यूक्रेन में तमाम सैन्य अकादमियां और प्रशिक्षण के केंद्र हैं, लेकिन इन सभी के बावजूद यूक्रेन की फायर पावर रूस की तुलना में कमजोर है।
पूर्व एयर वाइस मार्शल एन बी सिंह कहते हैं कि इसमें कोई दो राय नहीं कि अमेरिका यूक्रेन को सहयोग दे रहा है। इस मामले में यूरोप के देश कम तेजी दिखा रहे हैं। फिलहाल जो भू-राजनीतिक परिस्थिति दिखाई दे रही है, उसमें कुछ बड़ा हासिल होने की उम्मीद कम है। हालांकि, राष्ट्राध्यक्ष की हर विदेश यात्रा का मकसद कुछ हासिल करना ही नहीं होता। कभी-कभी दूसरे उद्देश्यों के लिए भी शीर्ष नेता ऐसी यात्रा करते हैं। यह यात्रा भी इसी का हिस्सा है।
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