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President Election 2022: मोदी-शाह के आगे विपक्ष नहीं ढूंढ सका एक 'क्षत्रप', 2024 के 'प्रैक्टिस मैच' में भी नहीं मिल रहे सियासी खिलाड़ी

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Wed, 13 Jul 2022 09:01 PM IST
सार

वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक रशीद किदवई कहते हैं, भाजपा ने पहले 'कांग्रेस मुक्त भारत' की घोषणा की थी। पार्टी उसमें काफी हद तक सफल भी रही है। पांच राज्यों के चुनावी नतीजों ने बहुत हद तक इस तस्वीर को साफ कर दिया है। भाजपा के रणनीतिकार इस बात को अच्छे से समझ चुके हैं कि आगामी लोकसभा चुनाव में विपक्ष बिखराव की राह पर जा सकता है...

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President Election 2022: PM Modi and Home Minister Shah ace strategy completely entangled the opposition
विपक्ष के नेता - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

राष्ट्रपति चुनाव, ये महज देश के सर्वोच्च पद पर विराजमान होने वाले व्यक्ति का चुनाव नहीं है, बल्कि 'मिशन 2024' यानी लोकसभा चुनाव के लिए विपक्ष का प्रैक्टिस मैच भी है। केंद्र में पीएम मोदी और गृह मंत्री शाह की जोड़ी ने ऐसा चक्रव्यूह रचा है कि उसमें विपक्ष पूरी तरह उलझ कर रह गया है। मोदी-शाह के आगे, विपक्ष एक 'क्षत्रप' तक नहीं ढूंढ पा रहा है, जो 'मिशन 2024' में उनका नेतृत्व कर सके। राष्ट्रपति चुनाव, जिसे 2024 का प्रैक्टिस मैच माना जा रहा है, उसके लिए विपक्षी टीम को पर्याप्त संख्या में सियासत के खिलाड़ी तक नहीं मिल पा रहे हैं। जो मिले भी हैं, उनमें टीम भावना और तालमेल का अभाव है। राष्ट्रपति चुनाव से पहले की यह स्थिति आगामी लोकसभा चुनाव के हालात बयान करने के लिए काफी है।

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'कांग्रेस मुक्त भारत' में सफल हुई भाजपा

वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक रशीद किदवई कहते हैं, भाजपा ने पहले 'कांग्रेस मुक्त भारत' की घोषणा की थी। पार्टी उसमें काफी हद तक सफल भी रही है। पांच राज्यों के चुनावी नतीजों ने बहुत हद तक इस तस्वीर को साफ कर दिया है। भाजपा के रणनीतिकार इस बात को अच्छे से समझ चुके हैं कि आगामी लोकसभा चुनाव में विपक्ष, बिखराव की राह पर जा सकता है। कांग्रेस और दूसरे क्षेत्रीय दलों की इसी कमजोरी का फायदा भगवा टोली उठा रही है। अब इसके निशाने पर वे राज्य हैं, जहां गैर भाजपा दलों की सरकारें हैं। वहां पर किसी न किसी तरह, विवाद खड़ा कर भाजपा, खुद को पिक्चर में ला रही है। महाराष्ट्र इसका ताजा उदाहरण है। गोवा में भी प्रयास हुआ है। भले ही वर्तमान में पंजाब की सियासत के प्लेटफार्म पटल पर 'भगवा' टोली कहीं नहीं ठहरती, लेकिन उसने 2024 की तैयारी शुरू कर दी है।

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कांग्रेस के ये कदम हुए फुस्स

पंजाब कांग्रेस को आए दिन झटके देने का प्रयास हो रहा है। पहले कैप्टन अमरिंदर सिंह गए और बाद में सुनील जाखड़। पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू भी जेल में हैं। लोकसभा सांसद मनीष तिवारी भी कांग्रेस हाईकमान के निशाने पर हैं। भाजपा ने अभी से ही वहां पर मिशन 2024 की तैयारी शुरू कर दी है। केंद्रीय मंत्रियों को लोकसभा क्षेत्र सौंपे गए हैं। उन्हें वहां पर तीन-तीन दिन का प्रवास करने के लिए कहा गया है। दूसरी ओर कांग्रेस, अपनी सक्रियता दिखाने में पिछड़ रही है। पार्टी ने सेना भर्ती का अग्निपथ मुद्दा उठाया, लेकिन साथ ही साथ जब लाखों युवाओं ने अग्निवीर बनने के लिए आवेदन जमा कराया तो कांग्रेस का विरोध प्रदर्शन, मात्र एक औपचारिकता में बदल गया। कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा था कि किसान आंदोलन की तरह, अग्निपथ पर भी केंद्र सरकार को कदम पीछे रखना पड़ेगा।


 

राजनीतिक जानकार कहते हैं कि राष्ट्रपति चुनाव, विपक्षी एकता परखने के लिए एक प्रयोग है। अभी तक इसमें विपक्ष चारों खाने चित रहा है। महाराष्ट्र में सत्ता से बाहर हो चुकी शिवसेना ने भी एनडीए प्रत्याशी द्रौपदी मुर्मू को समर्थन दे दिया है। संभवतया चुनाव के दिन तक कई दूसरे विपक्षी दल भी यूपीए प्रत्याशी यशवंत सिन्हा का साथ छोड़कर, मुर्मू के समर्थन में न खड़े हो जाएं। लोकसभा या विधानसभा चुनाव में बीजेडी और वाईएसआर, कांग्रेस के साथ कैसे आएंगे। शरद पवार और फारुख अब्दुल्ला ने राष्ट्रपति चुनाव में अपना नाम क्यों नहीं आगे बढ़ाया। रशीद किदवई के मुताबिक, यहां कई समस्याएं हैं। विपक्षी दल राष्ट्रपति चुनाव या लोकसभा चुनाव में एक हो सकते हैं, लेकिन उसके बाद विधानसभा में क्या होगा। वहां तो सभी अलग-अलग ही लड़ेंगे। वह सोच, इन्हें अब एकत्रित नहीं होने दे रही है। देश के वर्तमान राजनीतिक हालात को देखें तो विपक्षी एकता में यही सोच, सबसे बड़ी बाधा है।

विपक्ष में एक सूत्रधार की कमी

कांग्रेस में ऐसा कोई 'क्षत्रप' नहीं है, जो विपक्ष को एक प्लेटफार्म पर ला सके। सोनिया गांधी और राहुल गांधी सहित कई कांग्रेसी अभी ईडी के रडार पर हैं। भले ही चुनाव में विपक्ष को, भाजपा से अधिक वोट मिलते हैं, लेकिन बिखराव के चलते उनकी कीमत जीरो हो जाती है। ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, के चंद्रशेखर राव और अखिलेश, ये सब खुद को आगे रखना चाहते हैं। सामान्य विचार बन ही नहीं पाता। तेलंगाना राष्ट्र समिति के प्रमुख के चंद्रशेखर राव, कांग्रेस के साथ मंच साझा नहीं करेंगे। 2014 व 2019 के मुकाबले 2024 में विपक्ष के सामने बड़ी चुनौती है। उस वक्त आम राय थी कि एनडीए को हराना है। आज भाजपा से टकराव है। प्रशांत किशोर को देखकर लगता था कि वे विपक्ष को एक मंच पर ला सकते हैं, लेकिन वे भी अलग-थलग पड़ गए। बतौर रशीद किदवई, विपक्ष में इच्छा शक्ति नहीं है। सीएम नीतिश कुमार, कल्पना के खेल में ही रहे। अब तो क्षेत्रीय दल ही कांग्रेस को हाशिये पर ले जाने लगे हैं। विपक्ष में एक सूत्रधार की कमी है। चंद्रबाबू नायडू व दूसरे कई लोगों ने कोशिश की थी, मगर फेल हो गए। कांग्रेस, एकला चलो पर आगे बढ़ना चाहती है। ऐसे समय में बड़ी पार्टी पहल करती है, लेकिल कांग्रेस तो अपने ही घर में घिरी है। कहीं ऐसा न हो कि पहले आप, पहले आप के चक्कर में 2024 भी विपक्ष के हाथ से न निकल जाए।

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