फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   'Premeditated': SC censures trial court, quashes proceedings against ex-Haryana IPS officer

Premeditated: सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की निंदा की, हरियाणा के पूर्व IPS अधिकारी को NDPS एक्ट में दी राहत

Fri, 13 Dec 2024 05:57 PM IST
पवन पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: पवन पांडेय Updated Fri, 13 Dec 2024 05:57 PM IST
सार

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि विशेष न्यायाधीश ने अपने स्थानांतरण के बाद भी मामले की 'बिजली की गति' से सुनवाई की और निर्णय लिखवाया जबकि घोषणा का कार्य अपने उत्तराधिकारी न्यायाधीश पर छोड़ दिया। पीठ ने कहा, 'जब हमने 24 अक्तूबर, 2024 को सीलबंद लिफाफा खोला और विशेष न्यायाधीश की तरफ से पारित 30 मई, 2008 के आदेश का अवलोकन किया, तो हमें यह स्पष्ट हो गया कि विशेष न्यायाधीश ने पूर्वनियोजित तरीके से कार्य किया था।'

विज्ञापन
'Premeditated': SC censures trial court, quashes proceedings against ex-Haryana IPS officer
Supreme Court - फोटो : PTI

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक पूर्व आईपीएस अधिकारी को राहत देते हुए हरियाणा में नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस (एनडीपीएस) अधिनियम के तहत उनके खिलाफ कार्यवाही रद्द कर दी, जिसमें कहा गया कि विशेष न्यायाधीश ने 'पूर्व नियोजित तरीके से' काम किया।
विज्ञापन


पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के आदेश को दी गई थी चुनौती
मामले में जस्टिस बीआर गवई, पीके मिश्रा और केवी विश्वनाथन की पीठ ने एक आदेश को खारिज कर दिया, जिसे 30 मई, 2008 को विशेष न्यायाधीश की तरफ से लिखा और टाइप किया गया था और एक सीलबंद लिफाफे में रखा गया था, यह देखते हुए कि यह 'पूरी तरह से दिमाग का इस्तेमाल न करने' को दर्शाता है। पीठ का फैसला अधिकारी की तरफ से दायर अपील पर आया, जिसने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के 14 अक्तूबर, 2010 के आदेश को चुनौती दी थी।
विज्ञापन


उच्च न्यायालय ने कुरुक्षेत्र के विशेष न्यायाधीश के 30 मई, 2008 के आदेश को बरकरार रखा, जिन्होंने एनडीपीएस अधिनियम की धारा 58 के तहत दंडनीय अपराध के लिए अधिकारी के खिलाफ शुरू की गई कार्यवाही से संबंधित टाइप किए गए और लिखे गए आदेश को उत्तराधिकारी विशेष न्यायाधीश की तरफ से वितरित किए जाने के लिए एक सीलबंद लिफाफे में रखा था। अधिनियम की धारा 58 में परेशान करने वाले प्रवेश, तलाशी, जब्ती या गिरफ्तारी के लिए दंड का प्रावधान है। 
विज्ञापन
विज्ञापन


'विशेष न्यायाधीश ने पूर्वनियोजित तरीके से कार्य किया'
मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि विशेष न्यायाधीश ने अपने स्थानांतरण के बाद भी मामले की 'बिजली की गति' से सुनवाई की और निर्णय लिखवाया जबकि घोषणा का कार्य अपने उत्तराधिकारी न्यायाधीश पर छोड़ दिया। पीठ ने कहा, 'जब हमने 24 अक्तूबर, 2024 को सीलबंद लिफाफा खोला और विशेष न्यायाधीश की तरफ से पारित 30 मई, 2008 के आदेश का अवलोकन किया, तो हमें यह स्पष्ट हो गया कि विशेष न्यायाधीश ने पूर्वनियोजित तरीके से कार्य किया था।' पीठ ने कहा कि 26 मई, 2008 को विशेष न्यायाधीश को कुरुक्षेत्र से पानीपत स्थानांतरित करने के लिए स्थानांतरण आदेश जारी किया गया था, लेकिन न्यायिक अधिकारी ने मामले को फिर से 27 मई से 30 मई, 2008 तक सुनवाई के लिए रखा। 

पुलिस ने गुप्त सूचना पर की थी कार्रवाई
पीठ ने कहा कि अपीलकर्ता भारती अरोड़ा 21 मई, 2004 से 18 मार्च, 2005 तक कुरुक्षेत्र की पुलिस अधीक्षक के रूप में तैनात थीं। जनवरी 2005 में, एक गुप्त सूचना पर कार्रवाई करते हुए पुलिस ने 8 किलोग्राम से अधिक वजन की अफीम के साथ एक व्यक्ति को पकड़ा। इसके तुरंत बाद, उस व्यक्ति ने एक आवेदन दायर किया जिसमें दावा किया गया कि वह निर्दोष है और अफीम उसे दूसरों ने दी थी। पीठ ने कहा कि अरोड़ा ने आवेदन का संज्ञान लिया और जांच की गई। जांच रिपोर्ट के अनुसार, वह व्यक्ति निर्दोष था और अफीम तीन अन्य व्यक्तियों की तरफ से लगाई गई थी।

कुरुक्षेत्र एसपी को जारी किया गया था कारण बताओ नोटिस
22 फरवरी, 2007 को विशेष न्यायाधीश ने पुलिस की तरफ से पकड़े गए व्यक्ति को दोषी ठहराया और अन्य तीन व्यक्तियों को बरी कर दिया। इस फैसले में विशेष न्यायाधीश ने कहा कि तीनों की तरफ ले व्यक्ति को फंसाए जाने की कहानी वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की तरफ से गढ़ी गई थी और इसलिए उन्हें कारण बताना चाहिए कि उनके खिलाफ एनडीपीएस अधिनियम की धारा 58 के तहत कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए। सर्वोच्च न्यायालय ने उल्लेख किया कि 26 फरवरी, 2007 को विशेष न्यायाधीश ने अधिनियम की धारा 58 के तहत भारती अरोड़ा को कारण बताओ नोटिस जारी किया था और उन्हें 15 मार्च, 2007 को न्यायालय के समक्ष उपस्थित रहने का निर्देश दिया था।

मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने उल्लेख किया कि उसने 26 अक्तूबर, 2010 को उच्च न्यायालय के आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी थी। अपने फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि विशेष न्यायाधीश की तरफ से अपीलकर्ता और अन्य पुलिस अधिकारियों को दिया गया नोटिस एनडीपीएस अधिनियम की धारा 58(1) और (2) के तहत दंडनीय कथित अपराध के लिए था। पीठ ने कहा कि अपीलकर्ता के खिलाफ शुरू की गई कार्यवाही कथित अपराध के लिए दंडनीय थी जिसके लिए अधिकतम सजा दो साल तक थी। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि विशेष न्यायाधीश एनडीपीएस अधिनियम की धारा 58 के तहत दंडनीय अपराध के लिए वर्तमान अपीलकर्ता के खिलाफ कार्यवाही नहीं कर सकते थे, क्योंकि ऐसी कार्यवाही केवल मजिस्ट्रेट की तरफ से ही की जा सकती थी।


उच्च न्यायालय का अक्तूबर 2010 का फैसले रद्द
पीठ ने एनडीपीएस अधिनियम की धारा 69 का भी उल्लेख किया जो सद्भावनापूर्वक की गई कार्रवाई के संरक्षण से संबंधित है। पीठ ने विशेष न्यायाधीश के फरवरी 2007 के आदेश का हवाला देते हुए कहा, 'विशेष न्यायाधीश ने उन्हें नोटिस दिए बिना ही, मामले की अंतिम सुनवाई के चरण में पेश की गई दलीलों के आधार पर, उनके खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणियां कीं और उन्हें एनडीपीएस अधिनियम की धारा 58 के तहत दंडनीय अपराध का लगभग दोषी पाया। अपील स्वीकार करते हुए पीठ ने उच्च न्यायालय के अक्टूबर 2010 के फैसले को रद्द कर दिया।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed