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यूपी में 'पीके' का प्लान, ब्राह्मण बने कांग्रेस का चेहरा

Tue, 03 May 2016 04:51 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Tue, 03 May 2016 04:51 PM IST
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prashant kishor plan: brhamin became the face of congress in up

अगले साल होने वाले यूपी के विधानसभा चुनावों के लिए पूरी जान झोंक चुकी कांग्रेस जल्द ही कोई बड़ा दांव खेल सकती है। यूपी में कांग्रेस के रणनीतिकार पीके उर्फ प्रशांत किशोर की चली तो राज्य में कांग्रेस किसी ब्राह्मण को अपना चेहरा बना सकती है। 

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हालांकि इससे पहले वह राहुल गांधी और उनकी बहन प्रियंका वाड्रा को भी प्रदेश में मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर प्रोजक्ट करने की कोशिश कर चुके हैं लेकिन दोनों पक्षों से खास रिस्पांस मिलते न देख पीके ने प्लान बी पर तैयारी तेज कर दी है। 
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400 से ज्यादा विधानसभा सीटों वाले वाले उत्तर प्रदेश में 13 फीसदी ब्राह्मण आबादी कभी बसपा तो कभी भाजपा का समर्थन करती रही है। एक दौर में वह कांग्रेस की भी समर्थक रही है। तब ब्राह्मण, दलित और मुस्लिमों के दम पर कांग्रेस ने लंबे समय तक यूपी में राज किया था। धीरे धीरे यह वोट बैंक खिसका तो पार्टी भी सत्ता से बाहर हो गई। प्रशांत किशोर उसी गणित को दोबारा दुरुस्त करने की कवायद में लग गए हैं।
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यूपी में सत्ता समीकरण पूरी तरह जात-पात के गणित पर निर्भर रहता है। बसपा यहां दलितों के साथ अन्य बिरादरियों को गोलबंद कर सत्ता सुख चखती रही है तो समाजवादी पार्टी मुस्लिमों के साथ ओबीसी और अन्य जातियों के दम पर राज करती रही है। 

यूपी में ब्राह्मण-मुस्लिम का गठजोड़ खड़ा करना चाहती है पार्टी 

prashant kishor plan: brhamin became the face of congress in up

भाजपा भी अगडों और दलितों को साथ लेकर एक दो बार सत्ता के शिखर पर रह चुकी है। जबकि सबसे ज्यादा लंबे समय तक राज करने वाली कांग्रेस को उस समय मुस्लिमों और दलितों का एकतरफा समर्थन हासिल था। 

खास बात ये है कि ब्राह्मण भी उस समय कांग्रेस के ही समर्थक माने जाते थे। लेकिन वक्त के साथ साथ वह अपना राजनीतिक ठिया बदलते रहे। भाजपा ने राज्य में ब्राह्मण चेहरे को हटाकर ओबीसी को अपना अध्यक्ष बनाया तो प्रशांत किशोर ने इसमें खुद और कांग्रेस के लिए मौका तलाश लिया है। 

पीके का जोर इस बात पर है कि कांग्रेस राज्य में किसी ब्राह्मण को अपना चेहरा बनाए। इसमें भी वह किसी कद्दावर चेहरे की तलाश में हैं। सूत्रों की मानें तो उनकी निगाहें दिल्‍ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित पर टिकी हैं। 

अपनी विकासवादी छवि के चलते तीन बार दिल्‍ली की मुख्यमंत्री रह चुकी शीला दीक्षित कुशल राजनीतिज्ञ तो मानी जाती ही हैं कांग्रेस नेतृत्व का भी उन पर अटूट विश्वास है। इसके अलावा महिला होने के नाते वह बसपा सुप्रीमो मायावती को भी मजबूत टक्कर दे सकती हैं। 

दिल्‍ली बिहार के मुकाबले पीके के लिए मु‌‌श्किल है यूपी की लड़ाई

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असल में ब्राह्मण चेहरे पर प्रशांत का जोर इसलिए भी है कि उन्हें विश्वास है कि अगर यह अगडी जाति कांग्रेस के पाले में आ जाती है तो फिर पुराने वोटबैंक मुसलमानों को भी साथ जोड़ने में ज्यादा ‌दिक्‍कत नहीं होगी, जो आज भी उम्‍मीदों भरी नजर से उसकी ओर देख रहा है। 

ऐसे में 13 फीसदी ब्राह्मण और 15 फीसदी मुस्लिमों के साथ प्रशांत किशोर 28 फीसदी का मजबूत वोट बैंक खड़ा करना चाहते हैं जो 2017 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की राह आसान कर सके। सूत्रों की मानें तो पीके के इस प्लान को कांग्रेस नेतृत्व की भी हरी झंडी मिल चुकी है।

हालांकि 39 साल के प्रशांत किशोर के लिए यूपी की लड़ाई उतनी आसान भी नहीं दिखती जितनी दिल्‍ली और बिहार में रही है। 80 लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पास केवल दो सीटें हैं तो विधानसभा में मात्र 30 सीटों के साथ वो बहुत अच्छी स्थिति में नहीं है। 

लेकिन पार्टी और उसके रणनीतिकार जानते हैं कि अगर 2019 के आम चुनावों में पार्टी को दिल्‍ली के तख्त तक पहुंचना है तो उत्तर प्रदेश में अपनी जड़ें मजबूत करनी होंगी। ऐसे में कांग्रेस को सत्ता शिखर तक ले जाने के लिए प्रशांत को खासी मशक्कत करनी पड़ सकती है। 

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