शून्य कार्बन उत्सर्जन: चार गुना तक बढ़ानी होगी बिजली की खपत, BEE जैसे मानकों को बनाना होगा और मजबूत
- हाइड्रोजन के उपयोग को कुल ऊर्जा खपत का 13 फीसदी तक बढ़ाने से कार्बन उत्सर्जन को कम करने में मिलगी बड़ी मदद
- विद्युत् उत्पादन में कोयला आधारित संयंत्रों की बजाय सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और गैस के उपयोग की सलाह
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लगभग 135 करोड़ लोगों की भारी-भरकम आबादी वाले भारत के लिए वर्ष 2050 तक शून्य कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करना बेहद कठिन है। देश को एक तरफ इतनी बड़ी आबादी के लिए ऊर्जा उपलब्धता भी सुनिश्चित करनी है तो साथ ही में कार्बन उत्सर्जन कम कर जानलेवा प्रदूषण पर लगाम भी लगानी है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि एक निश्चित रणनीति अपनाकर तकनीकी सुधार कर इस लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए देश को ऊर्जा के पारंपरिक स्रोतों से हटते हुए बिजली खपत को वर्तमान 2000 टेरा वॉट से 9000 टेरा वॉट तक ले जाने की जरूरत होगी। साथ ही, हाइड्रोजन और सौर ऊर्जा जैसे ऊर्जा के नए माध्यमों को भी पूरी क्षमता के साथ अपनाना होगा।
द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टिट्यूट (टेरी) और शेल के एक अध्ययन में इस बात का खुलासा हुआ है कि शून्य कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करने के लिए बिजली खपत को वर्तमान में कुल ऊर्जा खपत के 18 फीसदी से बढ़ाकर वर्ष 2050 तक 45 फीसदी तक ले जाना होगा। इसके लिए देश में बिजली उत्पादन को चार गुना से कुछ अधिक बढ़ाना होगा।
टेरी की निदेशक और ऊर्जा विशेषज्ञ डॉ. रितु माथुर के मुताबिक़ केवल बिजली खपत बढ़ाना ही शून्य कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य को हासिल नहीं कर सकता, क्योंकि स्वयं बिजली उत्पादन में भी आज लगभग 65 फीसदी जैविक ईंधनों का उपयोग होता है। इसकी जगह विद्युत् उत्पादन के लिए देश को 90 फीसदी बिजली सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा से हासिल करनी होगा। लगभग पांच फीसदी बिजली का उत्पादन गैस आधारित संयंत्रों से करने की आवश्यकता पड़ सकती है। लेकिन सौर ऊर्जा से इतनी भारी मात्रा में बिजली उत्पादन के लिए देश को भारी मात्रा में निवेश करना होगा। इसके लिए तकनीक में भी भारी सुधार करने की आवश्यकता होगी।
हाइड्रोजन की क्षमता का उपयोग
वैश्विक स्तर पर ऊर्जा उपलब्ध कराने में हाइड्रोजन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। कई देशों में हाइड्रोजन की क्षमता का पर्याप्त उपयोग हो रहा है। लेकिन हमारे देश में हाइड्रोजन ऊर्जा का उपयोग लगभग नगण्य स्तर पर है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस क्षमता का उपयोग बढ़ाकर कुल ऊर्जा का लगभग 13 फीसदी किया जाना चाहिए। इसके लिए भी भारी निवेश और हाइड्रोजन चालित इंजनों के उपयोग को बढ़ावा देना चाहिए।
शून्य कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करने के लिए केवल बिजली खपत को बढ़ाना ही कारगर साबित नहीं होगा, बल्कि बिजली की खपत ज्यादा करने वाली तकनीक को कम बिजली खपत करने वाली तकनीक से बदलना भी होगा। इस क्षेत्र में विद्युत् के कम उपयोग के BEE जैसे मानकों को और उच्चस्तरीय भी बनाना होगा। लोगों को बिना कारण बिजली खपत को कम करने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
सीमाएं निश्चित, लेकिन उपाय भी
प्रदूषण के सबसे महत्वपूर्ण कारकों भारी वाहनों, हवाईजहाज और भारी औद्योगिक गतिविधियों में कार्बन उत्सर्जन कम करने की अपनी एक निश्चित सीमा है। इन क्षेत्रों में इस स्तर से ज्यादा विद्युतीकरण अपनाना संभव नहीं होगा, लेकिन कार्बन उत्सर्जन की इस सीमित मात्रा को वृक्षारोपण जैसे प्राकृतिक उपायों से भरा जा सकता है और इस प्रकार 2050 तक शून्य कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल कर देश-दुनिया को एक बेहतर पर्यावरण उपलब्ध कराया जा सकता है।