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चुनाव नतीजों का पंच किसे करेगा नॉकआउट?
रशीद किदवई/राजनीतिक विश्लेषक, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
Updated Sat, 23 Apr 2016 05:32 PM IST
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पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुदुचेरी का चुनाव
- फोटो : BBC
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जैसे-जैसे असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुदुचेरी का चुनाव आगे बढ़ रहा है, यह एक साम्राज्य का चुनाव बनता जा रहा है। जिन नेताओं पर देश को आगे ले जाने की जिम्मेदारी है, क्या वो नेता आज भी अपने मतदाताओं के बीच लोकप्रिय हैं? इन पाँच राज्यों का चुनाव, यह जानने और उसका मूल्यांकन करने का एक मौक़ा है। 19 मई को चुनाव परिणाम आने के बाद ही यह पता चलेगा कि भविष्य में विधानसभा ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर किसी उम्मीदवार या राजनीतिक दल की क्या स्थिति बन सकती है।
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कांग्रेस और बीजेपी के लिए असम का परिणाम सबसे महत्वपूर्ण होगा। बिहार और दिल्ली विधानसभा के चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने सब कुछ दांव पर लगा दिया था। अगर असम में बीजेपी की जीत होती है, तो यह देशभर में पार्टी की विस्तार के लिहाज उसके लिए काफ़ी महत्वपूर्ण होगा। यह, मध्य, उत्तर और पश्चिम भारत के बाद, यहाँ उसकी दक्षिणपंथी राजनीति को स्थापित करेगा।
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अगर असम बीजेपी के लिए पूर्व का प्रवेश द्वार बनता है, तो भविष्य में बीजेपी बंगाल और उत्तर पूर्वी राज्यों में आगे बढ़ेगी। बीजेपी अपने 'प्लान बी' के मुताबिक़ मौलाना बदरूद्दीन अजमल की पार्टी ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट से भी गठबंधन कर सकती है। इस पार्टी को मुस्लिमों का बड़ा समर्थन हासिल है। हालांकि अजमल और बीजेपी दोनों ही चुनाव के बाद इस तरह के किसी भी संभावित गठबंधन से इनकार करते रहे हैं। लेकिन राजनीति में इस तरह की बयानों को बहुत ज़्यादा महत्व नहीं दिया जा सकता। जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनाव प्रचार में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पीडीपी पर 'बाप-बेटी' पार्टी कहकर ज़ोरदार हमला किया था। और कुछ ही हफ़्तों के बाद मोदी ने मुफ़्ती मोहम्मद सईद को मुख्यमंत्री बनाए जाने का संकेत दिया था। अब महबूबा मुफ़्ती भी मोदी के समर्थन से ही अपने पिता की जगह मुख्यमंत्री बनीं हैं। वहीं अजमल से जुड़े एक क़रीबी सूत्र निजी तौर बातचीत में चुनाव के बाद एआईयूडीएफ़ के साथ बीजेपी-एजीपी-बीपीएफ़ के गठबंधन का अनुमान लगा रहे हैं।
कांग्रेस और असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के पास अजमल को देने के लिए बहुत कुछ नहीं है। जमात-ए-उलेमा के सक्रिय सदस्य अजमल की महत्वाकांक्षा राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रभावशाली मुस्लिम नेता बनने की भी है। अजमल को यह भी पता है कि वो और महबूबा मुफ़्ती मोदी सरकार को प्रभावित करने और अल्पसंख्यकों के लिए बेहतर सौदेबाज़ी कर पाने की स्थिति में होंगे। जबकि सोनिया और राहुल के नेतृत्व वाली कमज़ोर कांग्रेस के पास फ़िलहाल ऐसा कुछ भी नहीं है। अगर असम में त्रिशंकु विधानसभा बनती है तो अजमल के लिए तरुण गोगोई और सीपी जोशी के मुक़ाबले, राम माधव और सर्बानंद सोनोवाल से बात कर पाना ज़्यादा आसान होगा।
जहां तक डींगे मारने का सवाल है, तो बीजेपी के नेताओं के पास चमत्कारों पर भरोसा करने की ग़ज़ब की क्षमता है। हालांकि पश्चिम बंगाल में राज्य स्तर के नेता के अभाव में भी बीजेपी चुनाव प्रचार में जी जान से लगी हुई है। संभव है पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी एक बार फिर से मुख्यमंत्री बन जाएं। लेकिन बीजेपी के पास जिन इलाकों में थोड़े-बहुत वोट हैं, वो वहां से कुछ ज़्यादा ही समर्थन और वोट की उम्मीद लगाए बैठी है। इस तरह से बीजेपी 2019 के लिए कुछ लोकसभा सीटों पर ज़मीन तैयार करने में लगी है। इसके साथ ही वो 2021 के विधानसभा चुनाव में एक मज़बूत दावेदार बनने की तैयारी भी कर रही है।
जबकि कांग्रेस और लेफ़्ट समान रूप से ममता बनर्जी को सही टक्कर देने की उम्मीद में हैं। लेकिन बीजेपी की तरह ही, कांग्रेस और वाम दल भी मुख्यमंत्री पद का एक ठोस उम्मीदवार पेश करने में असफल रहे हैं। वहीं कांग्रेस और वाम नेता ऊपर से भले ही बहुत ही सहज दिख रहे हों, लेकिन ज़मीनी स्तर पर यह सच नहीं है। वहां पिछले 34 साल से चल रही लड़ाई की वजह से कांग्रेस के कार्यकर्ता पूरी तरह से वाम दलों के ख़िलाफ़ हैं और ममता बनर्जी के मुख्यमंत्री बनने के बाद भी वो संघर्ष ही कर रहे हैं। उसके बाद यहां कथित तौर पर चुनाव को प्रभावित करने वाला भी एक मुद्दा है।
लोकप्रिय मान्यताओं के उलट, उत्तर प्रदेश या बिहार की तुलना में पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा ज़्यादा बड़ी सच्चाई है। यहां महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले या ज़मीनी स्तर पर हेराफेरी करने वाले लोगों के वाम दलों को छोड़ तृणमूल की ओर जाने की बात होती रहती है। अगर इस तरह का 'छलावा' करने वाले चुनाव आयोग की तैयारियों को मात देते हैं, तो सत्ताधारी दल के लिए फिर से जीत पाना बहुत ही आसान होगा। वहीं ममता बनर्जी का करिश्मा और उनकी छवि भी आज तक बनी हुई है। कांग्रेस उम्मीद कर रही है कि वो यहां डीएमके के साथ मिलकर जयललिता के नेतृत्व वाली एआईएडीएमके को ज़ोरदार टक्कर दे रही है। इस तरह वो डीएमके साथ गठबंधन वाली सत्ता की साझेदार बन सकती है।
41 सीटों पर चुनाव लड़कर कांग्रेस इस गठबंधन में भले ही बहुत ताक़तवर भूमिका में न हो, लेकिन इसकी जीत के कई महत्व हो सकते हैं। सबसे पहले इससे कांग्रेस को एक राष्ट्रीय स्तर की पार्टी वाली पहचान को बल मिलेगा। इससे यह भी स्थापित होगा कि कांग्रेस महत्वपूर्ण क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन करने की क्षमता रखती है। इसके अलावा कांग्रेस की मौजूदगी, बीजेपी को डीएमके के क़रीब आने से रोके रखेगी। करुणानिधि की पार्टी पहले एनडीए की सहयोगी भी रही है। तमिलनाडु की बड़ी विधानसभा के कारण, केंद्र को कुछ महत्वपूर्ण विधेयकों पर राज्य की सहमति लेने और उसे राज्यसभा में पारित कराने में मुश्किलें आ सकती हैं।
दूसरी ओर एआईएडीएमके की जीत होने से, कांग्रेस की क़ीमत पर किसी क्षेत्रीय दल के उदय का संकेत मिलेगा। वहीं, जयललिता की एक और जीत उनको मोदी को मुद्दे पर आधारित समर्थन और राज्य के लिए कुछ छूट मांगने की ताक़त दे सकता है। साथ ही जयललिता, मोदी के नेतृत्व वाले एनडीए के ख़िलाफ़ नवीन पटनायक, नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, मायावती और अरविंद केजरीवाल के साथ मिलकर एक गठबंधन भी खड़ा कर सकती हैं। दक्षिणी राज्य केरल को एक गठबंधन से दूसरे गठबंधन की ओर जाने के लिए जाना जाता है।
यहाँ एक बात पर सबका ध्यान रहेगा कि अगर वाम दल बंगाल में कोई असर छोड़ने में नाकाम रहते हैं, तो केरल में उन्हें एक दिलासा भरी जीत मिलती है या नहीं। केरल में एलडीएफ़ की सत्ता में वापसी होने से यहाँ विपक्ष की एकता को बड़ा बल मिलेगा। कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूडीएफ़ यहां किसी तरह के करिश्मे की उम्मीद नहीं कर रहा है। केरल की जीत से राहुल गांधी को बड़ी ताक़त मिल सकती है। इससे उन्हें राष्ट्रीय स्तर के नेता के रूप में आगे बढ़ने में कुछ मदद मिल सकती है। अगर कांग्रेस केरल में जीत जाती है, तो असम में हार या तमिलनाडु में कोई असर न छोड़ पाने पर भी, उसे अपना चेहरा छिपाने में मदद मिल सकती है।
पुदुचेरी की सीमा तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश से लगी हुई है। इस वजह से इन तीनों राज्यों की राजनीति का असर पुदुचेरी में दिखता है। स्पष्ट तौर पर तीनों ही राज्यों में कांग्रेस के कमज़ोर संगठन की वजह से, पुदुचेरी में कांग्रेस की वापसी की संभावना नहीं दिखती है। हालांकि यहां की जीत से पूर्व केंद्रीय मंत्री वी नारायणस्वामी का राजनीतिक कद बढ़ सकता है। इससे पहले नारायणस्वामी अरुणाचल प्रदेश में ग़लतियां कर चुके हैं। वहां एआईसीसी (कांग्रेस) के प्रतिनिधि के रूप में गए नारायणस्वामी के असहमत होने से कांग्रेस के हाथ से सत्ता चली गई।