Politics: क्या I.N.D.I.A. को 'घमंडिया' साबित कर पाएगी भाजपा, इंडिया कहने से बचने का दांव कितना होगा कारगर?
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विस्तार
विपक्षी दलों ने जब से अपने गठबंधन को इंडिया (I.N.D.I.A.) नाम दिया, भाजपा सकते में है। उसे समझ नहीं आ रहा है कि आखिर वह उस नाम का विरोध कैसे करे, जिसे स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही अपनी विभिन्न योजनाओं के माध्यम से आगे बढ़ाते रहे हैं। भाजपा नेता 'इंडिया' शब्द का उपयोग करने से बच रहे हैं। एक तय रणनीति के अनुसार भाजपा नेता विपक्षी दलों के गठबंधन को कभी कांग्रेस की अगुवाई वाले 'यूपीए' का नाम दे रहे हैं, तो कभी इंडिया के अक्षरों को अलग-अलग करके बोलने की कोशिश कर रहे हैं।
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पीएम मोदी ने तो विपक्षी दलों के नाम का असर समाप्त करने के लिए उसे 'ईस्ट इंडिया कंपनी', इंडियन मुजाहिदीन और पीएफआई तक से जोड़ दिया। लेकिन इन हमलों में वह असर नहीं दिखाई पड़ रहा है, जो विपक्ष के गठबंधन के नाम से पैदा हो रहा है। इन पूरे हमलों पर विपक्षी दलों के गठबंधन का नाम इंडिया भारी पड़ता दिख रहा है। यही कारण है कि भाजपा अभी भी इसका विकल्प खोजने की कोशिश कर रही है।
इसी बीच प्रधानमंत्री मोदी ने विपक्षी दलों के गठबंधन को 'घमंडिया' करार दिया है। भाजपा सूत्रों के अनुसार, मंगलवार को सांसदों की बैठक में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्षी दलों के गठबंधन को 'घमंडिया' कहने का सुझाव दिया है। उनका इशारा है कि विपक्षी दलों की एकता का मूल आधार राजनीतिक और पारिवारिक स्वार्थ है, उनके गठबंधन में भी आपसी मतभेद खुलकर सामने आए हैं, भाजपा को इस स्थिति का लाभ उठाते हुए विपक्षी दलों की राजनीति पर हमला करना चाहिए।
सहज देशी भाषा से निकला शब्द 'घमंडिया' अपने मूल रूप में पहले से लोगों की जुबान पर है और आपसी बोलचाल में एक-दूसरे पर हमला करने के लिए उपयोग किया जाता है। कहा जा रहा है कि यह शब्द न केवल लोगों की जुबान पर चढ़ पायेगा, बल्कि यह INDIA के उस असर को भी कमजोर कर पायेगा, जो विपक्षी दलों की एकता के बाद उत्पन्न हुई है। लेकिन क्या यह विपक्ष के इंडिया शब्द के असर को कुंद कर पाएगा?
सही समय नहीं
भारतीय भाषाओं के विद्वान और 'हिंदी भाषा सहोदरी' के संस्थापकों में से एक दीपक शुक्ला ने अमर उजाला से कहा कि कोई भी शब्द लोगों की जुबान पर तभी चढ़ता है, जब आम लोग उससे स्वयं को जोड़ पाते हैं। यदि किसी शब्द से आम लोग स्वयं को जोड़ नहीं पाते हैं, तो वह प्रचलन में नहीं आ पाता है। यदि कोई शब्द किसी व्यक्ति से जोड़ा जाता है, तो सकारात्मक अर्थ में, या व्यंग्यात्मक रूप में उसे व्यक्ति से जुड़ना चाहिए, तभी वह असरदार होता है। कोई जुड़ाव न पैदा कर पाने पर शब्द अपना असर नहीं छोड़ पाते हैं। यह बात किसी शब्द को किसी संगठन या संस्था से जोड़ने के मामले में भी होता है।
उन्होंने कहा कि इंडिया को विदेशी या अंग्रेजी भाषा का शब्द कहने से भी इसका वजन कम नहीं होता दिखाई पड़ रहा है। इसका बड़ा कारण है कि जिस तरह 'स्टेशन', 'डॉक्टर' और 'कलेक्टर' शब्द लोगों की जुबान पर चढ़कर देशी हो गए हैं, सोशल मीडिया के असर से अब इंडिया शब्द भी लगभग उतना ही लोकप्रिय हो गया है। कम पढ़े लिखे लोग भी इंडिया को उसी अर्थ में उपयोग करते हैं। ऐसे में इसे विदेशी कहने से इस शब्द की लोकप्रियता पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा।
सत्ता पक्ष ने विपक्ष पर हमला करने के लिए सहज देशी भाषा का 'घमंडिया' शब्द का उपयोग किया है। यह लोगों को जुबान पर चढ़ा हुआ शब्द है, लेकिन यह तभी कारगर होगा जब इसे किसी तरह विपक्षी दलों पर चिपकाया जा सके। उदाहरण के लिए, यदि विपक्षी दलों के नेता आपसी अहंकार के कारण आपस में एकजुट होकर, बेहतर तालमेल से न लड़ पाएं और उनके आपसी मतभेद लगातार सामने आते रहें तब यह शब्द कारगर हो सकता है। हालांकि, जिस तरह विपक्षी दलों में बेहतर तालमेल दिखाई पड़ रही है, इसकी दूर-दूर तक संभावना नहीं दिखाई पड़ती।