Politics: "पप्पू" से "पनौती" और "मूर्खों के सरदार" से लेकर RSS की "चड्डी", क्या ऐसे शब्दों से सधती है सियासत?
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विस्तार
देश में पांच राज्यों के विधानसभा के चुनाव अब अपने अंतिम चरण में हैं। लेकिन सियासत में बोले जाने वाले शब्दों की मर्यादा भी इस दौरान खूब तार-तार हुई। शब्दों के मायाजाल में जहां "पनौती" से लेकर "मूर्खों के सरदार" और ''आरएसएस की चड्डी" से लेकर "खाकी निक्कर" जैसे शब्दों का इस्तेमाल हुआ। फिलहाल ताजा हालात में सियासत "पनौती" पर जाकर अटक गई है। भारतीय जनता पार्टी जहां प्रधानमंत्री के लिए बोले गए शब्द के तौर पर कांग्रेस पर हमलावर हुई है। वहीं कांग्रेस भी भारतीय जनता पार्टी की ओर से "पप्पू", "मूर्खों के सरदार" और "राहुकाल" जैसे बोले गए शब्दों पर हमलावर है। भाषा के जानकारों का मानना है कि ऐसी शब्दावलियों से सियासी तौर पर तो कोई फायदा किसी राजनीतिक दल को नहीं होता है, लेकिन इससे राजनीति की गरिमा पर जरूर एक बड़ा दुष्प्रभाव पड़ता है।
दरअसल देश की सियासत में "पनौती" शब्द पर तब सबसे ज्यादा सियासत गर्म हुई, जब भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच हुए फाइनल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जाते हैं। वर्ल्ड कप के फाइनल वाले दिन और उसके अगले दिन तक "पनौती" शब्द सोशल मीडिया पर भी ट्रेंड करने लगा। स्थितियां तब ज्यादा सियासी रूप से गर्म हो गईं, जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक जनसभा के दौरान बीते कुछ दिनों से ट्रेंड हुए "पनौती" शब्द का जिक्र कर दिया। इस पूरे मामले में जब भारतीय जनता पार्टी हमलावर हुई, तो कांग्रेस ने भी इस पूरे मामले में भारतीय जनता पार्टी को घेरना शुरू कर दिया। कांग्रेस के प्रवक्ता पवन खेड़ा कहते हैं कि भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की ओर से मूर्खों के सरदार और राहुकाल समेत पप्पू जैसे शब्दों का इस्तेमाल कांग्रेस के नेताओं के लिए किया जा रहा था, तब भाषा की मर्यादा कहां पर थी।
दरअसल लंबे समय से सियासत को समझने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहला दौर नहीं है जब सियासत में भाषा की मर्यादा का ख्याल नहीं रखा गया। वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक रमेश शाक्य कहते हैं कि इसी सियासी दौर में अगर देखा जाए तो भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के नेताओं के साथ-साथ कई अन्य सियासी दलों के नेताओं की ओर से ऐसे शब्दों का चयन किया गया है, जिसे कह पाना और बोल पाना भी मुश्किल है। वह कहते हैं कि तेलंगाना में कांग्रेस और एआईएमआईएम के नेताओं की ओर से अमर्यादित शब्दों का इस्तेमाल किया गया। कांग्रेस के नेता पी रेवंत रेड्डी ने जहां असदुद्दीन ओवैसी को शेरवानी के नीचे खाकी निक्कर पहनने वाला बताया। वहीं इस बयान के बाद ओवैसी ने रेड्डी पर हमला करते हुए कहा कि वह तो आरएसएस की चड्डी पहनकर लट्ठ चलाते हैं। वरिष्ठ पत्रकार रमेश शाक्य कहते हैं कि अमर्यादित शब्दों की आग तब ज्यादा तल्ख होती है, जब बड़े नेताओं पर आरोप प्रत्यारोप लगते हैं। लेकिन सियासत की पिच पर ऐसे शब्द चुनावी दौर में खूब बोले जाते हैं।
सियासी जानकार बताते हैं कि यह पहला मौका नहीं है जब सियासत में ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया गया हो। इससे पहले भी कई तल्ख शब्दों का राजनीतिक मंचों से लेकर अलग-अलग कार्यक्रमों में जमकर इस्तेमाल किया जाता रहा है। वरिष्ठ पत्रकार जफर अहमद कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह के लिए मुल्ला मुलायम जैसे शब्दों का चुनावी दौर में इस्तेमाल किया जाता रहा था। इसी तरह नेताओं के लिए जोकर जैसे शब्द भी खुलकर इस्तेमाल होते थे। वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक बृजेश शुक्ला कहते हैं कि सियासत में शब्दों का चयन बहुत महत्वपूर्ण होता है। कई बार ऐसे शब्दों का इस्तेमाल राजनीति में किया जाता है, जिसका सियासी तौर पर तो कोई फायदा नहीं होता है, लेकिन राजनीति में चर्चा का विषय है अवश्य बन जाते हैं। उनका मानना है कि सियासत में इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल सभी राजनीतिक दल लंबे अरसे से करते आए हैं।
उनका कहना है कि सिर्फ राजनीति में अक्सर ऐसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं होता है, बल्कि कई नारे भी इसी तरह से तैयार किए जाते हैं जिनका राजनीति में जमकर इस्तेमाल होता है। आजादी के बाद से लेकर अब तक सियासत में जिस तरीके से नारों का चलन बढ़ा और उन नारों से सियासत की गई, वह एक अलग दौर रहा। सेंटर फॉर लिंग्विस्टिक एंड इट्स इंपैक्ट के नेशनल कन्वीनर जेपी लोढ़ा कहते हैं कि सियासत में भाषा, भाषा शैली और बॉडी लैंग्वेज का बहुत महत्व होता है। बॉडी लैंग्वेज और भाषा के माध्यम से आप बहुत हद तक लोगों को प्रभावित करते हैं। जब यह कई बार नकारात्मक रूप से सामने आती है, तो भी सियासत में इसकी चर्चा खूब होती है। उनका मानना है कि इस तरीके की भाषा शैली से सियासत में कितना असर पड़ता है या उसका चुनाव के हारने-जीतने पर कितना असर पड़ता है, इसका तो कोई आकलन नहीं हुआ है।