Politics: I.N.D.I.A गठबंधन में अखिलेश और ममता ने लगाई यह शर्त! इसीलिए बैठक में नहीं आ रहे थे ये बड़े नेता
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आखिरकार वही हुआ जिसकी चर्चा विधानसभा चुनाव के परिणामों से पहले I.N.D.I.A गठबंधन के लिए की जा रही थी। विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के लचर प्रदर्शन के बाद समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव और तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी ने ऐसी शर्ते लगा दी, जिससे कांग्रेस पार्टी को अब बैक फुट पर आना पड़ सकता है। हालांकि दिल्ली में होने वाली गठबंधन के नेताओं की अनौपचारिक बैठक में अखिलेश, ममता और नीतीश कुमार जैसे नेताओं के शामिल न होने से फिलहाल बैठक को टाल दिया गया है। गठबंधन में शामिल एक महत्वपूर्ण सहयोगी दल के नेता का कहना है, जिस राज्य में जिस दल की सबसे बड़ी ताकत होगी, वही इस राज्य में गठबंधन को लीड करेगा। इस पर आधिकारिक रूप से आम सहमति होनी है।
विधानसभा के चुनावों के बाद इंडिया गठबंधन की महत्वपूर्ण बैठक होनी पहले से तय मानी जा रही थी। कयास यह भी लगाए जा रहे थे कि जिस तरीके के परिणाम कांग्रेस के लिए आए हैं, उसे लेकर अब बड़ी चुनौतियां भी आने वाली हैं। सियासी जानकारों का कहना है कि ठीक उसी अनुमान के आधार पर गठबंधन की बैठक से पहले ही अन्य दलों के नेताओं के अंदरूनी नाराजगी और आक्रामकता खुलकर सामने आने लगी है। बुधवार को दिल्ली में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के साथ होने वाली गठबंधन के नेताओं की बैठक में अखिलेश यादव, ममता बनर्जी और नीतीश कुमार जैसे कद्दावर नेता शामिल नहीं हो रहे थे।
गठबंधन में शामिल एक महत्वपूर्ण दल से जुड़े वरिष्ठ नेता कहते हैं कि बैठक में नेताओँ के शरीक न होने के पीछे वजह है कि कुछ ऐसी शर्तें रखी गई हैं, जिसकी गठबंधन के फोरम पर आम सहमति के साथ स्वीकार्यता होना जरूरी है। गठबंधन में शामिल एक अहम पार्टी से जुड़े वरिष्ठ नेता का कहना है कि अखिलेश यादव और ममता बनर्जी समेत एमके स्टालिन की शर्तों में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी गठबंधन में उनके राज्य में उनको मिलनी चाहिए। जबकि विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस इन राज्यों में अधिक सीटों की मांग कर रही थी। वह कहते हैं अब जब विधानसभा चुनाव के परिणाम सामने हैं, तो यह तय होना भी इसी वक्त जरूरी है कि जिस राज्य में जिसकी सीटें ज्यादा हैं, उसे ही गठबंधन का नेतृत्व करने दिया जाए।
इस तरीके की शर्त के मुताबिक समाजवादी पार्टी जहां उत्तर प्रदेश में अपनी दावेदारी कर रही है, वहीं पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की दावेदारी सबसे ऊपर है। तमिलनाडु में डीएमके ऊपर है। इंडिया गठबंधन में शामिल एक महत्वपूर्ण राजनीतिक दल के वरिष्ठ नेता कहते हैं कि इस तरह की व्यवस्था पर गठबंधन की शुरुआती बैठकों में पहले ही चर्चा हो चुकी है। लेकिन अब तक उस पर आपसी सहमति के साथ आधिकारिक मुहर नहीं लगी है। सियासी जानकार भी मानते हैं कि चुनाव परिणाम में तीन राज्यों को हारने के बाद कांग्रेस की अब गठबंधन में सबसे ऊपर बने रहने की मंशा को क्षेत्रीय दल दबाने की तैयारी में लगे हैं। राजनीतिक विश्लेषक जटाशंकर सिंह कहते हैं कि यह अब दबाव काम भी कर रहा है। क्योंकि उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड समेत दक्षिण के राज्यों में गठबंधन के दलों की यह मांग शुरुआत से बनी हुई थी।
सियासी जानकारों का मानना है कि गठबंधन के सियासी दलों में सबसे ज्यादा लड़ाई पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश को लेकर ही फंसी हुई है। वरिष्ठ पत्रकार बृजेंद्र शुक्ला कहते हैं कि यूपी में समाजवादी पार्टी बड़ी विपक्षी पार्टी है और वह अपने मुताबिक की कांग्रेस को सीटें देना चाहती है। जबकि पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस भी कांग्रेस को ज्यादा सीटों को देने के पक्ष में नहीं है। महाराष्ट्र में पहले से महाअघाड़ी गठबंधन में कांग्रेस शामिल रही है। इसलिए सीट बंटवारे को लेकर उतना ज्यादा मंथन नहीं करना पड़ेगा। लेकिन दिल्ली और पंजाब में आम आदमी पार्टी भी इसी तर्ज पर अपनी दावेदारी ठोंक रही है। हालांकि बृजेंद्र शुक्ला का मानना है कि विपक्षी दलों का गठबंधन के साथ चुनाव लड़ना मजबूरी भी बनता जा रहा है।
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व कैबिनेट मंत्री राजेंद्र चौधरी कहते हैं कि गठबंधन में शामिल सभी राजनीतिक दल पहले की बैठकों के एजेंडे के मुताबिक ही आगे की रणनीति बनाएंगे। उसके आधार पर ही अगली बड़ी बैठकों में शिरकत करने की तैयारियां की जाएगी। उनका कहना है कि फिलहाल समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में मजबूती से लोकसभा चुनाव की तैयारी कर रही है। गठबंधन की नीतियों के तहत जो व्यवस्था चुनाव में टिकट बंटवारे की लागू होगी उसको ही आगे बढ़ाया जाएगा।