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नक्सल में राजनीतिक घुसपैठ: किसी की भर रही झोली तो कोई खा रहा गोली!

Wed, 07 Apr 2021 02:32 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Wed, 07 Apr 2021 02:32 PM IST
सार

एक अधिकारी के मुताबिक, राजनेता, बड़े व्यापारिक घरानों और नक्सलियों के बीच की कड़ी बने हुए हैं। अभी तक नक्सलियों की सप्लाई चेन न टूटने का सबसे बड़ा कारण राजनेता और स्थानीय प्रशासन है। कुछ इलाकों में नक्सली इतने शक्तिशाली हैं कि वे सुरक्षा बलों के ऑपरेशन तक रुकवा देते हैं...

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Politicians have strong connection with naxalites, many time this nexus became threat for security forces
नक्सलियों के पास सुरक्षा बलों से लूटे हथियार - फोटो : Agency

विस्तार

नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर 'राजनीतिक घुसपैठ' होती रही है। ये बात किसी से छिपी नहीं है। केंद्रीय सुरक्षा एवं जांच एजेंसियां इस तथ्य से परिचित हैं। स्थानीय पुलिस के पास तो ऐसे सभी नेताओं की कुंडली है, जो इस नापाक घुसपैठ को बढ़ावा दे रहे हैं। यह राजनीतिक घुसपैठ, किसी की 'झोली' भर रही है, तो कोई गोली खाकर शांत हो जाता है। बीजापुर के हमले में कोबरा का एक जवान नक्सलियों के कब्जे में है। सीआरपीएफ डीजी कुलदीप सिंह ने कहा है कि स्थानीय स्तर पर प्रयास चल रहे हैं।

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विभिन्न राजनीति एवं सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि इस मामले को सुलझाने में लगे हैं। यह बयान उसी अपवित्र गठजोड़ की कहानी की तरफ एक इशारा कर रहा है। 'झोली' और 'गोली' का ये रिश्ता, सुरक्षा बलों को भारी नुकसान पहुंचा रहा है। दर्जनों बड़े ऑपरेशनों की सूचना लीक हो चुकी है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण तो यही है कि इतने दशकों बाद भी घने जंगल में नक्सलियों की सप्लाई चेन को बाधित नहीं किया जा सका।
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नक्सलियों का हर स्तर पर राजनीतिक रिश्ता काम है  

एक दशक से माओवादी ऑपरेशनों में हिस्सा ले रहे सीआरपीएफ के एक जांबाज कमांडर ने 'राजनीतिक घुसपैठ' को लेकर अमर उजाला डॉट कॉम के साथ खास बातचीत में कई राज खोल दिए। उनका कहना है कि छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र, तेलंगाना, बिहार और पश्चिम बंगाल सहित दूसरे राज्यों में जहां नक्सली घटनाएं होती हैं, वहां स्थानीय सांसद और विधायक किसी न किसी तरह उनके साथ जुड़े रहते हैं। उन्हें नक्सलियों के साथ बातचीत करने में कोई दिक्कत नहीं होती। 'हम उन्हें मुख्यधारा में लाना चाहते हैं', इसके सहारे में वे नक्सलियों के साथ बैठक कर लेते हैं। ऐसे में उनके नापाक गठजोड़ पर किसी को शक भी नहीं होता। किसी चुनाव में नक्सली कांग्रेस को स्पोर्ट कर देते हैं तो कभी भाजपा के पाले में मतदान कराते हैं।

उक्त अधिकारी के मुताबिक, ये बहुत कड़वा सच है कि नक्सलियों से बिगाड़ कर राजनेता जीवित नहीं बने रह सकते हैं। इन परिस्थितियों के लिए सरकार, लोकल पुलिस और राजनीतिक दल, ये तीनों जिम्मेदार हैं।

बड़े व्यापारिक घरानों और नक्सलियों के बीच की कड़ी बने हैं राजनेता

अधिकारी का दावा है कि राजनेता, बड़े व्यापारिक घरानों और नक्सलियों के बीच की कड़ी बने हुए हैं। जहां से नियमित पैसा मिल जाता है, वहां नक्सली कोई हमला नहीं करते। जो मना कर देता है, उसे गोली मिलती है या कारोबार को आग के हवाले कर दिया जाता है। कारखाने से उपकरण उठा ले जाते हैं। अभी तक नक्सलियों की सप्लाई चेन न टूटने का सबसे बड़ा कारण राजनेता और स्थानीय प्रशासन है। एक बड़ी बात यह है कि कुछ इलाकों में नक्सली इतने शक्तिशाली हैं कि वे कम समय के लिए सुरक्षा बलों के ऑपरेशन तक रुकवा देते हैं।

अगर नक्सली न चाहें तो स्थानीय नेता चुनाव प्रचार और उद्घाटन समारोह में नहीं जा सकते। बीजापुर हमले के बाद 2020 की एक खबर सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। इसमें पुलिस ने नक्सलियों को मदद पहुंचाने के आरोप में दंतेवाड़ा जिले के भाजपा उपाध्यक्ष रहे जगत पुजारी और उसके साथी रमेश उसेंडी को गिरफ्तार था। सीआरपीएफ के पूर्व आईजी एसएस संधू कहते हैं कि जब भी कोई बड़ा हमला होता है तो सरकार उसकी जांच से पीछे हट जाती है। कई अहम ऑपरेशनों के फेल होने की वजह सूचना लीक होना रही है। राजनेता, मध्यस्थ बनकर अपनी झोली भर लेते हैं। चुनाव खर्च भी यहीं से निकल जाता है।

आईबी, रॉ, सीआरपीएफ और लोकल पुलिस, सभी के पास है रिपोर्ट

राजनेताओं और नक्सलियों के बीच जो कुछ चल रहा है, उसकी रिपोर्ट केंद्रीय एवं स्थानीय एजेंसियों के पास है। एक बार नहीं, बल्कि अनेक मौकों पर यह रिपोर्ट नॉर्थ ब्लॉक तक पहुंचाई गई है। विभिन्न अंतराल पर भेजी जाने वाली रिपोर्ट में सांसदों, विधायकों और पार्टी के दूसरे पदाधिकारियों का जिक्र रहता है, मगर कार्रवाई न के बराबर है। ऑपरेशनों की सभी सूचनाएं लोकल स्तर पर लीक होती हैं, इससे सभी वाकिफ हैं। नक्सलियों को ऑपरेशन के हर मूवमेंट पता चल जाता है।

वजह, स्थानीय पुलिस से वह सूचना राज्य सरकार के बड़े अधिकारियों के पास भी पहुंचती है। सुरक्षा एजेंसियों ने कई बार नेताओं और नक्सलियों की बातचीत इंटरसेप्ट की है। हथियारों का सौदा कराने के चक्कर में एक विधायक को पकड़ लिया गया था। पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बल के अधिकारी भी इस गठजोड़ के चक्कर में जेल जा चुके हैं। कई ऑपरेशन की कमान सम्भालने वाले पूर्व आईजी वीपीएस पवार कहते हैं, ये लोकल गठजोड़ सुरक्षा बलों को भारी नुकसान पहुंचा रहा है। अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति मजबूत है तो नक्सल समस्या को चंद महीनों में खत्म की जा सकती है।

जिन्होंने नक्सलियों की बात नहीं मानी, उन्हें मिली गोली...

साल 2013 में नक्सलियों ने कांग्रेस पार्टी की परिवर्तन रैली पर हमला किया था। पार्टी के राज्य प्रमुख नंद कुमार पटेल, पूर्व विपक्षी नेता महेंद्र कर्मा और पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल सहित 29 लोग मारे गए थे। साल 2012 में नक्सलियों ने महाराष्ट्र गढ़चिरोली में एनसीपी नेता केवल अतकाम्वर की हत्या कर दी थी। इससे पहले ब्रहमगढ़ तालुका कांग्रेस कमेटी के बहादुर शाह आलम को मार दिया गया था। साल 2018 में नक्सलियों ने टीडीपी के एमएलए किदराई सरवेश्वरा राव की हत्या कर दी।

इनके साथ पूर्व एमएलए सिवेरी सोमा को भी मार दिया। ये दोनों नेता नक्सलियों के खिलाफ दूबरीगुडा मंडल में पहुंचे थे। सांसद सुनील महतो, जिनकी 4 मार्च 2007 को घाटशिला के बाघुडिया फुटबाल मैदान में हत्या कर दी गई थी। पूर्व मंत्री रमेश सिंह मुंडा को तमर विधानसभा क्षेत्र में मार दिया गया। पिछले साल बस्तर में स्थानीय भाजपा नेता धनीराम और जेसीसी नेता कोरसा बारडेला की हत्या कर दी गई। खास बात है कि कई मामलों में राजनेताओं ने नक्सलियों से अपने विरोधियों को ही खत्म करा दिया। रमेश मुंडा की हत्या इसी तरीके से हुई बताई जा रही है। एनआईए जांच में भी ये बात सामने आई है।

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