कानों देखी: कांग्रेस से दूर और जनता के पास, आखिर राहुल गांधी की मंशा क्या है?
कानों देखी: राहुल गांधी अपनी भारत जोड़ो यात्रा में ही लगे रहे। यही हाल गुजरात विधानसभा चुनाव प्रचार को लेकर भी है। दूसरा सवाल यह है कि हिमाचल और गुजरात के नतीजे क्या राहुल की छवि पर असर नहीं डालेंगे? यह बात राहुल गांधी क्यों नहीं समझ पा रहे हैं?
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कांग्रेस से दूर और जनता के पास, आखिर राहुल गांधी की मंशा क्या है?
कांग्रेस पार्टी के तमाम नेता अपने सिर को खुजा रहे हैं। उन्हें कांग्रेस को नया अध्यक्ष मिल जाने के बाद दो बातें समझ में नहीं आ रही हैं। पहली यह कि राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और सोनिया गांधी अध्यक्ष पद का चुनाव संपन्न होने के बाद पार्टी से इतना दूरी क्यों बना रहे हैं। उनके पास जरूर एक उम्मीद जिंदा थी। प्रियंका गांधी ने हिमाचल में चुनाव प्रचार किया, लेकिन उनकी रैलियां घटा दी गईं। राहुल गांधी अपनी भारत जोड़ो यात्रा में ही लगे रहे। यही हाल गुजरात विधानसभा चुनाव प्रचार को लेकर भी है। दूसरा सवाल यह है कि हिमाचल और गुजरात के नतीजे क्या राहुल की छवि पर असर नहीं डालेंगे? यह बात राहुल गांधी क्यों नहीं समझ पा रहे हैं? लेकिन दो बातें सुकून वाली भी हैं। पहला तो यह कि राहुल गांधी की यात्रा से विभिन्न छोटे दलों के क्षेत्रीय नेता भी जुड़ने लगे हैं। पार्टी के एक महासचिव को उम्मीद है कि इससे भाजपा को 2024 में पटखनी देने में मदद मिलेगी। पूर्व सांसद कमल किशोर कमांडो को भी यही लग रहा है कि थोड़ी देर से ही राहुल गांधी ने सही राजनीति शुरू कर दी है।
डंडे से 'बादल खोदकर' पानी बरसाने में लगी है 'आप'
गुजरात में चुनाव प्रचार जोरों पर है और इस बार आम आदमी पार्टी बदलाव का दावा कर रही है। लेकिन उसका यह दावा न तो कांग्रेस के नेता शक्ति सिंह गोहिल को हजम हो रहा है और न ही भाजपा की आईटी सेल के नेता को। यह बात जरूर है कि कांग्रेस के नेताओं में 2017 वाला जुनून भी नहीं दिखाई दे रहा है। मजे की बात है कि जब आम आदमी पार्टी के खेमे में चले जाइए, तो उनके नेता कांग्रेस को पस्त और भाजपा सरकार को जुमलों की सरकार बता देते हैं। वहीं गुजरात चुनाव के बाबत भाजपा के नेता अरुण शुक्ला कहते हैं कि आम आदमी पार्टी वाले डंडे से बादल खोदकर पानी बरसाने की कला में माहिर हैं। इन्होंने दिल्ली में भी यही किया है। अब गुजरात विधानसभा और दिल्ली के एमसीडी चुनाव में भी यही दोहरा रही है।
यूपी में अब केवल बुलडोजर बाबा
पुरानी कहावत है। लाइन छोटी करनी हो तो अपनी लाइन बड़ी कर लीजिए। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यही करके अपने विरोधियों को पस्त कर दिया है। हालत यह है कि उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या ने जहां अपनी महत्वाकांक्षा को खूंटी पर टांग दिया है, वहीं दूसरे उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक भी अब थोड़ा संभलने लगे हैं। लखनऊ के राजनीतिक गलियारे तो यहां तक कहते हैं कि दिल्ली ने भी बिना वजह पंख फैलाने का इरादा छोड़ दिया है। बात पूरी बाबा और बुलडोजर बाबा पर आ गई है। बताते हैं नेपथ्य में इसके कई आयाम थे। 2024 का आम चुनाव तो है ही, उससे पहले के तमाम विधानसभा चुनाव भी हैं। दूसरे बाबा की हर राज्य में मांग बढ़ती जा रही है। पार्टी के संगठन ने भी मान लिया है कि बस 50 साल की उम्र को पार करने वाले योगी आदित्यनाथ का अब राज्य में भी कोई मुकाबला नहीं है।
शिवपाल सिंह यादव लौटकर घर को आए
समाजवादी पार्टी के संस्थापक दिवंगत नेता मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक विरासत संभालने का ख्याब पालने वाले शिवपाल यादव को हर बार मन मसोस कर रह जाना पड़ जाता है। बड़े भाई के छोड़कर जाने के बाद वह हर रस्म रिवाज को निभाने में साए की तरह सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और परिवार के साथ थे। दरअसल उनके पास एक उम्मीद जिंदा थी। लेकिन इस बीच भतीजे तेजू का नाम प्रत्याशी के तौर पर उभरने लगा। पता चला है कि इस दौरान उनके पास एक अहम फोन आया। उन्हें मैनपुरी से चुनाव लड़ने के लिए कहा गया। यह प्रस्ताव अच्छा था। वह मन बना ही रहे थे कि अखिलेश ने पत्नी डिंपल यादव के नाम का एलान कर दिया। एलान ही नहीं किया, बल्कि फोन करके चाचा के ऊपर अपनी बहू को जिताने का दारोमदार भी डाल दिया। उधर, शिवपाल पर मैनपुरी लोकसभा से ही चुनाव लड़ने के लिए दबाव बनने लगा। अब शिवपाल के सामने बड़ी मुसीबत खड़ी हो गई कि आखिर गुरु और गोविंद में किसे चुनें। बताते हैं इसमें बड़ी भूमिका फिर उनकी पत्नी ने निभाई। और उनकी समझदारी भरी ये सलाह वह मान गए। बहू का प्रचार करने उतर गए। अब जो लोग उन्हें चुनाव लड़वाने में लगे थे, वह घूम-घूमकर कह रहे हैं कि मुलायम परिवार वालों पर भरोसा करना ही बेवकूफी है।
क्या प्रशांत किशोर करेंगे नीतीश के शामियाने में छेद?
देश के नेता यात्रा पर चल रहे हैं। एक हैं राहुल गांधी और दूसरे प्रशांत किशोर। राहुल गांधी भारत जोड़ो यात्रा पर हैं, तो प्रशांत किशोर बिहार के कोने-कोने की यात्रा पर हैं। वह जनता को खुद से जोड़ रहे हैं। पीके की इस यात्रा पर सबसे ज्यादा निगाह भाजपा की टिकी हुई है। नीतीश कुमार की पिछली गठबंधन सरकार के एक मंत्री को साफ लग रहा है कि मुख्यमंत्री की नैय्या उनके करीबी ही डुबो देंगे। इनमें से एक आरसीपी सिंह हैं, तो दूसरे प्रशांत किशोर। फोन पर वह बताते हैं कि बिहार यात्रा का दौर खत्म होने के बाद पीके अपनी पार्टी की घोषणा करने वाले हैं। इसके बाद से बिहार में असली राजनीति शुरू होगी। तब तक तेजस्वी यादव भी अपने पत्ते खोलने शुरू कर देंगे। हालांकि पीके अपनी यात्रा के दौरान भाजपा और भाजपा विरोधी दलों से बराबर की दूरी बनाकर चल रहे हैं। लेकिन इसे बिहार के ही राजनीतिक हलके में हाथी के दिखाने वाले दांत की तरह ही माना जा रहा है।
अब दिल्ली में कांग्रेस के लिए बचा ही क्या है?
दिल्ली में एमसीडी चुनावों की सरगर्मियां हैं। चुनाव में कांग्रेस ने चमकती दिल्ली का विजन डाक्यूमेंट पेश किया है। पार्टी बड़ी है, पुरानी है। लेकिन नेता गायब हैं। हां, सपना जरूर बड़ा है। एमसीडी में पार्टी की उम्मीद पर पूछिए, तो प्रदेश मुख्यालय में एक नेता जी भड़क गए। बोले बचा ही क्या है? पिछले दो चुनाव से हम विधानसभा में नहीं हैं। खाता भी नहीं खुला। एमसीडी में 15 साल से भाजपा का दबदबा है। ज्यादा पूछने पर बोले माकन जी से पूछ लीजिए। पिछली बार 30 सीटें जितवाए थे और इस बार भी जैसा टिकट बंटे हैं, उसमें भगवान ही मालिक है। यहां तो हाल यह है कि पहले हम (कांग्रेस) हाफ होते हैं और फिर साफ (0) होते हैं। हमें वोट करने वाले भी विरोधी नहीं, बल्कि हमारे अपने ही होते हैं। आप चाहे तो चुनाव प्रचार के माड्यूल को ही देख लीजिए। चुनाव सिर पर है और सन्नाटा पसरा है।